विशौल में मिथिलाबिहारी व किशोरी जी के डोला का हुआ आगमन, दर्शन को उमड़ी भीड़
मिथिला की 15 दिवसीय मध्यमा परक्रिमा यात्रा के चौदहवें दिन विशौल गांव में प्रभु श्रीराम और माता किशोरीजी का डोला आया। श्रद्धालुओं ने भव्य स्वागत किया और परंपरागत भोग अर्पित किए। यात्रा जनकपुरधाम में समाप्त होगी, जहां होली पर्व मनाने की परंपरा भी है।

हरलाखी। मिथिला की 15 दिवसीय मध्यमा परक्रिमा यात्रा के चौदहवें दिन रविवार को विशौल गांव में मिथिलाबिहारी व किशोरीजी के डोला का आगमन हुआ। विशौल गांव स्थित गुरु वश्विामत्रि के आश्रम में प्रभु श्रीराम संग माता किशोरी जी के डोला के दर्शन को भीड़ उमड़ पड़ी। रविवार की अहले सुबह करुणा स्थान से प्रभु श्रीराम व माता किशोरी का डोला वश्विामत्रि स्थान के लिए प्रस्थान किया। डोला निकलते ही सबसे पहले कल्याणेश्वर महादेव स्थान का परक्रिमा किया। जहां श्रद्धालुओं के द्वारा 14 दिन पूर्व परक्रिमा यात्रा की शुरुआत करने से पहले बनाए गए अपने निशान को मिटाया गया। डोला के साथ सभी श्रद्धालु विशौल गांव स्थित वश्विामत्रि आश्रम में पहुंचे।
प्रभु श्रीराम व माता किशोरी की वश्रिाम स्थल के नजदीक श्रद्धालु भजन, कीर्तन व नृत्य संगीत में लीन होकर दिन बिताए। इस स्थान का माहात्म है कि मिथिला के तत्कालीन राजा जनक के द्वारा आयोजित माता सीता के स्वयंवर में शामिल होने के लिए प्रभु श्रीराम अपने गुरु वश्विामित व अनुज लक्ष्मण के साथ जनकपुरधाम पहुंचने से पूर्व यहां वश्रिाम किए थे। तब से यह स्थान वश्विामत्रि आश्रम के नाम से वख्यिात है। मध्यमा परक्रिमा के दौरान प्रभु श्रीराम व माता किशोरी के यहां पहुंचते ही ग्रामीणों ने जय सियाराम के जयघोष के साथ भव्य स्वागत किया और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। महंत ब्रजमोहन दास के नेतृत्व में मिथिला की बेटी माता सीता व दामाद प्रभु श्रीराम का स्वागत जोर शोर से किया गया। मिथिला परंपरा के अनुसार बेटी दामाद को खाने के लिए बड़ी भात सहित अन्य पकवान बनाए गए। महंत ने बताया कि मायके आने पर बेटी को बड़ी भात खिलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसलिए बेटी दामाद को बड़ी भात सहित अन्य पकवान से भोग लगाया जाता है। तदुपरांत श्रद्धालुओं को भोजन कराया जाता है। कल ही जनकपुरधाम के लिए रवाना हो गए परक्रिमावासी, जनकपुरधाम के धर्मशाला में हुआ रात्रि वश्रिाम: परक्रिमावासी विशौल से कल रविवार को ही जनकपुरधाम के लिए रवाना हो गए। जहां धर्मशाला में रात्रि वश्रिाम हुआ। सोमवार को अन्तरगृह व पांच कोसी परक्रिमा के उपरांत जनकपुरधाम में यात्रा का समापन होगा। यह परक्रिमा मेला यात्रा प्राचीन काल से चलती आ रही दोनो देशों में विभाजित मिथिला की पौराणिक परंपरा को जीवंत करती है। भारत से शुरू होकर यह परक्रिमा मेला जनकपुरधाम नेपाल में जाकर संपन्न होता है। मिथिलांचल में सदियों से चले आ रहे परक्रिमा मेला सम्पन्न होने के अगले दिन होली पर्व मनाने की परंपरा चलती आ रही है। इस परक्रिमा मेला यात्रा से आज भी पौराणिक काल के सदियों पुराने रश्मों की झलकियां देखी जा सकती है। परक्रिमा सम्पन्न होने के बाद मिथिला में होली मनाने की है परंपरा: दो मार्च को जनकपुरधाम पहुंचकर गंगासागर पर क्षेत्र विकास परिषद् के द्वारा बनवाया गया मंडप में रात्रि वश्रिाम करेंगे। अगले दिन पूर्णिमा यानि तीन मार्च को विधिवार अंतरगृह व पांच कोसी परक्रिमा कर यह यात्रा समाप्त होगी। पौराणिक परंपरा के अनुसार उसी दिन होलिका दहन के उपरांत नेपाल के जनकपुरधाम से होली की शुरुआत होती है।
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