रसोइयों की मांग- योजनाओं का लाभ, पेंशन व सम्मान संग और बढ़े मानदेय
मधुबनी में रसोइयां अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रही हैं। वे 1500 रुपये मासिक मानदेय को बढ़ाकर 3300 रुपये करने की मांग कर रही हैं। रसोइयों को नियमित और पर्याप्त मानदेय नहीं मिल रहा है। इसके अलावा,...
मधुबनी । मधुबनी के स्कूलों में काम करने वाली रसोइया अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रही है। इनका कहना है कि ये स्कूलों में खाना बनाने का काम करती हैं, इसके एवज में सरकार द्वारा 15 सौ रुपए मासिक मानदेय दिया जाता है, जो बहुत ही कम है। अगस्त से इसे बढ़ाकर 3300 किया गया, जो अबतक मिलना शुरू नहीं हुआ। इस पैसे में परिवार चलाना भी मुश्किल हो जाता है। रसोइयों के सामने सबसे बड़ा संकट उनका मानदेय का है। उन्हें नियमित और पर्याप्त मानदेय नहीं दिया जा रहा है। महीनों तक मानदेय लंबित रहने से घर चलाना कठिन हो जाता है।
रसोइयों का कहना है कि न्यूनतम वेतनमान लागू होना चाहिए और कम से कम 10,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाए। रसोइयों से साल में 12 महीने काम कराया जाता है, लेकिन भुगतान केवल 10 महीनों का किया जाता है। यह उनके अन्याय है। इनकी मांग है कि जैसे शिक्षक और अन्य कर्मचारी पूरे साल का वेतन पाते हैं, वैसे ही रसोइयों को भी 12 महीने का मानदेय दिया जाए। रसोइयों की ड्यूटी केवल बच्चों के लिए भोजन बनाने और परोसने की है। लेकिन जमीनी स्तर पर उनसे झाड़ू लगाने, सफाई कराने और कभी-कभी चौकीदारी तक का काम लिया जाता है। इससे उनका शोषण और मानसिक दबाव बढ़ता है। चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी का दर्जा मिले: पार्वती देवी, अनीता, पींकी, संजीता आदि का कहना है कि रसोई और बच्चों को भोजन कराने के अलावा उनसे कोई भी अतिरिक्त काम न लिया जाए। इन्हें आज भी एक संविदा कर्मचारी की तरह देखा जाता है। उनके पास नियुक्ति पत्र तक नहीं होता। वे चाहती हैं कि उन्हें चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी का दर्जा मिले ताकि सामाजिक सुरक्षा और सम्मान मिल सके। काम करते-करते कई रसोइयों की मृत्यु हो जाती है, लेकिन उनके परिवार को कोई सहायता नहीं मिलती। रसोइयों की मांग है कि मृतक के आश्रितों को कम से कम चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि मिले और अनुकम्पा नियुक्ति दी जाए। यूनिफाॅर्म के लिए सरकार दे पोशाक: रसोइयों को साल में एक बार भी यूनिफॉर्म या कपड़ा नहीं दिया जाता। वे मांग करती हैं कि कम से कम साल में एक जोड़ा सूती पोशाक मिले। वहीं, रात्रि प्रहरी की बहाली में भी उन्हें प्राथमिकता दी जाए, ताकि उन्हें अतिरिक्त रोजगार का अवसर मिल सके। सेवानिवृत्ति के बाद रसोइयों के पास पेंशन या अनुकम्पा नियुक्ति जैसी कोई सुविधा नहीं है। वे बुजुर्गावस्था में आर्थिक तंगी से गुजरती हैं। उनकी मांग है कि सरकार उन्हें पेंशन सुविधा दे। पैकेट भोजन से बच्चों को होती समस्याएं: सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील योजना के तहत बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन अब यह व्यवस्था बदलती नजर आ रही है। रसोइया महिलाओं का कहना है कि पहले वे स्कूलों में ही बच्चों के लिए ताजा और पौष्टिक खाना बनाकर परोसती थीं। इससे बच्चों को स्वादिष्ट और सुरक्षित भोजन मिलता था। हालांकि, अब कई जगहों पर एनजीओ को भोजन बनाने और पैक कर स्कूलों में भेजने की जिम्मेदारी दे दी गई है। रसोइया महिलाओं का आरोप है कि बाहर से पैक होकर आने वाला खाना कई बार खराब हो जाता है, जिससे बच्चे उसे खाने से इंकार कर देते हैं। इससे बच्चों की सेहत और पोषण दोनों प्रभावित होते हैं।र सोइयों का कहना है कि यह निर्णय बच्चों के हित में नहीं है। पैक्ड भोजन में ताजगी और पोषण का अभाव रहता है। वहीं, जब वे स्कूल में ही ताजा खाना बनाती थीं, तो बच्चों की पसंद-नापसंद और स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाता था। रसोइया महिलाएं सरकार से मांग कर रही हैं कि बच्चों के लिए भोजन बनाने का काम फिर से उन्हीं को सौंपा जाए। उनका कहना है कि यह न केवल बच्चों की सेहत और शिक्षा के लिए जरूरी है, बल्कि हजारों रसोइयों के रोजगार का भी सवाल है।
बोले जिम्मेदार-रसोइया महिलाओं की वेतन वृद्धि समेत अन्य मांगे उचित है। इन्हे स्कूलों में काम करने की जो वेतन मिलते हैं वह बहुत ही कम है। महिलाओं को घर चलाना भी मुश्किल हो जाता है, इसीलिए रसोईया महिलाओं का मानदेय बढ़ाकर कम से कम 10 हजार रुपए करना चाहिए, ताकि महिलाएं परिवार का अच्छे तरीके से भरण पोषण कर सके। -समीर महासेठ,नगर विधायक , मधुबनी
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