सामा चकेवा के गीतों से गूंज रहा सरायरंजन बाजार
सरायरंजन में भाई-बहनों का त्योहार शाम चकेवा मनाया जा रहा है। यह त्योहार छठ पर्व के समापन से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। प्रतिदिन सामा चकेवा की मूर्ति को दरवाजे पर रखकर लोक गीत गाए जाते हैं और लोकनृत्य किया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा को मूर्ति की विदाई के साथ विशेष पकवान बनाए जाते हैं।

सरायरंजन। भाई बहनों का त्योहार शाम चकेवा के अवसर पर सामा चकेवा की मूर्ति से सरायरंजन बाजार सज गया है। भाई बहन का यह त्योहार छठ पर्व के समापन दिन से शुरू होकर कार्तिक माह के पूर्णिमा तक चलता है। प्रत्येक दिन शाम को डाला दौरी में इस प्रतिमा को रखकर उसे दरवाजे पर रखकर मुहल्ले की माता बहनें बिहार की लोक गीत सोहर गाती है। लड़के तथा लड़कियां अलग अलग टोली बनाकर जट्ट जट्टीन जो बिहार का लोकनृत्य है खेलती है। प्रत्येक दिन लोकनृत्य करने के बाद डाला फेरा जाता है। कार्तिक के पूर्णिमा के दिन सामा चकेबा की विदाई की जाती है।
उसके लिए मिट्टी के तरह तरह के पकवान बनाए जाते हैं फिर डोली बनाई जाती है। बहनें इसे नदी, पोखर या तालाब के किनारे तक लोग गीत गाते हुए ले जाती हैं फिर किनारे पर रखकर खोइंछा भराई रस्म होती है। इसके बाद पटशन के डांट और छाल तथा मिट्टी से बने चुगला को जलाया जाता है। फिर सामा चकेबा को विदाई गीत के साथ जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। इस सामा चकेवा को लेकर सम चक सम चक अइह हे, जोतला खेत में बैठिह हे। ढेला चुन चुन खैह हे ... आदि गीतों से सरायरंजन का वातावरण गूंज रहा है। वहीं दिवंगत शारदा सिन्हा द्वारा गाये गये लोक गीत "सामा खेले चलली, भौजी संग सहेली हो, भैया जिह हो, हो जुग जुग जीह हो आदि गीत दिन भर बजते रहे।

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