
हाहा बंगला के जीर्णोद्धार का कार्य तेज, ऐतिहासिक स्वरूप को संरक्षित रखने पर विशेष जोर
किसी पेज पर इसे लीड ले सकते हैं। हाहा बंगला के जीर्णोद्धार का कार्य तेज, ऐतिहासिक स्वरूप को संरक्षित रखने पर विशेष जोर
बड़हिया, निज प्रतिनिधि । नगर स्थित ऐतिहासिक हाहा बंगला के संरक्षण व जीर्णोद्धार की दिशा में कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। मंगलवार को पुराने दीवारों के ऊपर लिल्टर ढालकर नवनिर्माण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया शुरू की गई। इसके ऊपर नई दीवारें खड़ी की जाएंगी तथा आगामी दिनों में छत ढलाई का काम भी पूरा किया जाएगा। निर्माण कार्य के दौरान विशेष ध्यान इस बात पर रखा जा रहा है कि इमारत के मूल स्वरूप और दशकों पुरानी ऐतिहासिकता को हर हाल में सुरक्षित रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी भी इसकी प्राचीनता को नए रूप में महसूस कर सके। ज्ञात हो कि देश की आजादी से कई दशक पूर्व निर्मित यह इमारत स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधाओं की गतिविधियों का अहम केंद्र रहा है।

महात्मा गांधी, डॉ राजेंद्र प्रसाद, बाल गंगाधर तिलक सहित अनेक अग्रणी नेताओं के आगमन का यह स्थल साक्षी रहा है। चारों कोनों पर छोटे-छोटे कमरों और मध्य में विशाल हॉल से सुसज्जित यह भवन समय की मार झेलते हुए काफी क्षतिग्रस्त हो गया था। छत के धराशायी हो जाने के बाद इसके संरक्षण को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता बढ़ गई थी। पूर्व में सुर्खी-चूना और लकड़ी के बीम पर आधारित निर्माण को अब आधुनिक तकनीक के तहत छड़, गिट्टी, बालू एवं सीमेंट के सहारे पुनर्जीवित किया जा रहा है। हालांकि बाहरी रूप-रंग को पूर्ववत रखने की दिशा में पूरा ध्यान दिया जा रहा है। बाहरी दीवारें जस की तस संरक्षित रहेगी। वहीं अंदरूनी हिस्से में प्लास्टर सहित अन्य मरम्मत कार्य किए जाने हैं। क्षतिग्रस्त ईंटों के स्थान पर नए ईंटों का उपयोग भी पुराने स्वरूप को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। स्थानीय युवा राजेश कुमार, काजू कुमार, सुजीत कुमार आदि इस संरक्षण कार्य का नेतृत्व कर रहे हैं। सामाजिक सहयोग से चल रहे जीर्णोद्धार कार्य में क्षेत्र के लोग उत्साहपूर्वक योगदान दे रहे हैं। जीर्णोद्धार कार्य की निगरानी कर रहे राजेश कुमार ने बताया कि भले ही छत का निर्माण आधुनिक ढलाई से किया जा रहा है, लेकिन डेंटिंग, पेंटिंग और बनावट के स्तर पर पुरानी शैली को पुनर्जीवित करने की हरसंभव कोशिश होगी। उन्होंने कहा कि पूर्वजों की इस धरोहर को नए आयाम के साथ संरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। ज्ञात हो कि नगर स्थित और अनवरत संचालित श्री जगदम्बा हिंदी पुस्तकालय की शुरुआत वर्ष 1923 में इसी हाहा बंगला के एक कमरे से हुई थी। अंग्रेजी शासन काल के दौरान जहां यह भवन स्वतंत्रता आंदोलन की बैठकों का केंद्र था, वहीं पुस्तकालय की किताबों ने युवा क्रांतिकारियों में नई चेतना जगाने का काम किया। अंग्रेजों द्वारा पुस्तकालय को नष्ट करने के प्रयासों के बावजूद ग्रामीणों ने पुस्तकों को पशुचारे एवं अन्यत्र स्थानों में छिपाकर सुरक्षित रखा था।

लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


