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नारी शक्ति का अद्भुत मिसाल पेश कर रहीं ममता

नारी शक्ति का अद्भुत मिसाल पेश कर रहीं ममता

ताइक्वांडों में नौनिहालों का भविष्य गढ़ रही ममता नारी शक्ति का अद्भुत मिसाल पेश कर रहीं हैं। खुद स्टेट चैंपियन रहने वाली ममता आज दो दर्जन से अधिक ऐसे गरीब बच्चे हैं, जिन्हें चैंपियन बना चुकी है। एक हादसे के बाद ममता को राष्ट्रीय ताइक्वांडों का हिस्सा न बन पाने का भले ही मलाल रहा हो, लेकिन गरीब बच्चों को राष्ट्रीय खेलों में मेडल दिलाकर उन्होंने अपने इस सपने को भी पूरा कर लिया। ममता हनुमान नगर वार्ड 29 निवासी जयनाथ पंडित व गृहिणी करूणा देवी की पुत्री हैं। पिता मजदूर हैं, पर बेटी की ख्वाहिशों के लिए वे हर जरूरतों को पूरा करते हैं। ब्लैक-बेल्ट फर्स्ट डन कर चुकी ममता फिलहाल 40 से 50 बच्चों को नि:शुल्क ताइक्वांडो का प्रशिक्षण दे रही हैं। 2014 में मजह 12 वर्ष की उम्र में नौवीं में पढ़ाई के दौरान उसने कराटे सीखने का संकल्प लिया था। छह माह के अभ्यास से जिला स्तरीय प्रतियोगिता के लिए चुनी गई। पहली दफा निराशा हाथ लगी। ममता ने हार नहीं मानी और अभ्यास जारी रखा। एकबार फिर स्कूल का प्रतिनिधत्व करने के लिए शेखपुरा भेजी गई। ममता ने अपने जीवन का पहला मेडल सिलवर के रूप में पाया। पहली बार 2015 में जिला स्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीत कर, राज्यस्तरीय के लिए चयनित हुई। 2015 जून के अंतिम सप्ताह में पटना में आयोजित प्रतियोगिता में ममता ने गोल्ड जीत कर नेशनल लेवल पर खेलने के लिए अपनी जगह पक्की की। हादसे के बाद ममता का टूट गया सपना: ममता का नेशनल गेम खेलने का सपना उस वक्त टूट गया, गेम से ठीक दो-तीन दिन पहले ममता को घर में ही काम के दौरान सांप ने काट लिया। सांप के विष ने ममता को शारीरिक रूप से भले ही हरा दिया, लेकिन उनका जज्बा आज भी जीतता आ रहा है। ममता ने कहा हादसे के बाद दो-तीन फाइट के बाद शरीर जवाब देने लगता है। आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई के साथ प्रतियोगिता में भाग लेने में परेशानी होती है। इंट्री फी नहीं होने से प्रतियोगिता में भाग नहीं ले पाती हूं। ममता सीआईएसएफ में जाना चाहती है।

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  • Web Title:Mamta presenting a wonderful example of women power