
कानून मौजूद पर सुविधा नदारद, दिव्यागों के लिए सुगमता सिर्फ फाइलों तक सिमित
लखीसराय में दिव्यांगजनों के लिए स्टेशन, बैंक और सार्वजनिक स्थानों पर आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। दिव्यांग यात्रियों को प्लेटफार्म पर चढ़ने में कठिनाई होती है और बैंकों में लंबी कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। बैटरी चालित ट्रायसाइकिल योजना अधूरी है और सर्विस सेंटर की कमी से दिव्यांगों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
लखीसराय। सरकार एक ओर दिव्यांगजनों को सशक्त बनाने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की बात करती है तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। लखीसराय जिला इसका जीवंत उदाहरण है, जहां स्टेशन, बैंक, सरकारी कार्यालय और भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर दिव्यांगजनों के लिए मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है। स्टेशन पर रैप, व्हीलचेयर, अलग काउंटर और सहायक कर्मी जैसी सुविधाएं कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन व्यवहार में दिव्यांग आज भी दूसरों की दया और मदद पर निर्भर हैं। स्टेशन पर सफर आज भी चुनौती: लखीसराय रेलवे स्टेशन जिले का प्रमुख और अत्यंत व्यस्त स्टेशन है।
रोजाना हजारों यात्री यहां से सफर करते हैं लेकिन स्टेशन परिसर में दिव्यांगों के लिए समुचित रैंप की व्यवस्था नहीं है। प्लेटफॉर्म पर चढ़ने-उतरने के लिए सीढ़ियां ही एकमात्र विकल्प हैं। व्हीलचेयर उपयोग करने वाले दिव्यांग यात्री या तो परिजनों के सहारे उठाए जाते हैं या फिर सफर से ही परहेज करते हैं। स्टेशन पर व्हीलचेयर की स्थायी व्यवस्था नहीं है। पूछने पर कर्मचारी उपलब्ध नही कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता हैं। टिकट काउंटर, पूछताछ कक्ष और शौचालय तक पहुंचना भी दिव्यांगों के लिए किसी संघर्ष से कम नहीं है। स्टेशन के बाहर ऑटो या वाहन तक पहुंचने में भी उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। भीड़-भाड़ वाले इलाकों में भी वही हाल : केवल स्टेशन ही नहीं, बल्कि बस स्टैंड, बाजार, अस्पताल और कलेक्ट्रेट जैसे भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर भी दिव्यांगों के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। कई जगहों पर ऊंचे-नीचे फुटपाथ, खुले नाले दिव्यांगों की राह में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। दिव्यांगो के लिये व्हीलचेयर या ट्रायसाइकिल से चलना लगभग असंभव हो जाता है। दिव्यांगों का कहना है कि यदि रैंप और समतल रास्ते बनाए जाएं तो वे आत्मनिर्भर होकर अपने काम स्वयं कर सकते हैं। लेकिन सुविधाओं के अभाव में उन्हें हर कदम पर दूसरों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। बैंकों में समान अधिकार की अनदेखी : सरकार द्वारा सुगम्य भारत अभियान के तहत बैंकों में दिव्यांगों के लिए अलग काउंटर और प्राथमिकता सेवा की बात कही गई है, लेकिन अधिकांश बैंकों में यह व्यवस्था नदारद है। दिव्यांग ग्राहकों को लंबी कतारों में घंटों खड़ा रहना पड़ता है। कई बैंक शाखाओं में प्रवेश द्वार पर रैंप तक नहीं है। पेंशन, छात्रवृत्ति या अन्य सरकारी सहायता राशि निकालने के लिए उन्हें बार-बार बैंक जाना पड़ता है। बैंक में न तो बैठने की उचित व्यवस्था है और न ही कोई अलग काउंटर। मजबूरी में वे किसी परिचित या परिजन की मदद लेते हैं जिससे गोपनीयता और स्वतंत्रता दोनों प्रभावित होती हैं। बैटरी चालित ट्रायसाइकिल योजना अधूरी : दिव्यांगजनों की गतिशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा बैटरी चालित ट्रायसाइकिल वितरित की गई। शुरुआत में यह योजना दिव्यांगों के लिए उम्मीद की किरण बनी लेकिन समय के साथ इसकी खामियां सामने आने लगीं है। सबसे बड़ी समस्या बैटरी की है। दिव्यांग लाभार्थियों का कहना है कि बैटरी खराब होने या उसकी क्षमता खत्म होने पर नई बैटरी स्वयं के खर्च से खरीदनी पड़ती है, जो अधिकांश दिव्यांगों के लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं है। ट्रायसाइकिल तो सरकार ने दे दी, लेकिन उसके रख-रखाव और सर्विस की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की गई। सर्विस सेंटर का अभाव : लखीसराय जिले में बैटरी चालित ट्रायसाइकिल का कोई अधिकृत सर्विस सेंटर नहीं है। छोटी मोटी खराबी के लिए भी दिव्यांगों को भागलपुर या अन्य जिला के मैकेनिक के पास जाना पड़ता है, जहां न तो सही तकनीकी ज्ञान होता है और न ही सस्ते दर पर मरम्मत होती है। कई बार ट्रायसाइकिल महीनों खराब पड़ी रहती है जिससे दिव्यांग फिर से घर में कैद होकर रह जाते हैं। ट्रायसाइकिल मिलने के बाद दिव्यांग खुद बाजार और बैंक जाने लगे थे लेकिन बैटरी खराब होने के बाद अब फिर से दूसरों पर निर्भर हो गए हैं। यह स्थिति सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है। कानून और हकीकत में अंतर : दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत सार्वजनिक भवनों, परिवहन और सेवाओं को दिव्यांगों के लिए सुलभ बनाना अनिवार्य है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इस कानून का पालन नहीं हो रहा। प्रशासनिक उदासीनता और निगरानी की कमी के कारण योजनाएं केवल फाइलों में सिमट कर रह गई हैं। दिव्यांग संगठनों का कहना है कि यदि समय-समय पर निरीक्षण और जवाबदेही तय की जाए, तो स्थिति में सुधार संभव है। लेकिन अभी तक किसी भी विभाग पर लापरवाही को लेकर ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। दिव्यांगों का कहना है कि योजनाओं की घोषणा के समय बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन क्रियान्वयन के समय जिम्मेदारी तय नहीं होती। जिला स्तर पर यदि एक समन्वय समिति बने और दिव्यांग प्रतिनिधियों को उसमें शामिल किया जाए, तो समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है। - प्रस्तुति: मनोज कुमार बोले जिम्मेदार: बैंक प्रबंधक कों निर्देशित कर दिव्यांगो के लिए अलग से काउंटर खोला जायेगा, व्हीलचेयर की व्यवस्था की जाएगी और जिला में यदि दिव्यांग को किसी ऑफिस में कार्य रहेगा तो उसे प्राथमिकता के तौर पर बिना लाइन के ही उनके कार्य कों तुरंत किया जायेगा। चलित ट्राय साईकिल यदि खराब हो रही है तो उसके लिए भी मेकेनिक की व्यवस्था किया जायेगा। - मिथलेश मिश्र, डीएम लखीसराय इनकी भी सुनें: मैं पिछले दस वर्षों से लखीसराय रेलवे स्टेशन से सफर करता रहा हूं। हर बार स्टेशन पर पहुंचते ही सबसे पहले डर लगता है कि प्लेटफॉर्म तक कैसे पहुंचूंगा। न रैंप है, न व्हीलचेयर उपलब्ध रहती है। कर्मचारियों से पूछने पर बस आश्वासन मिलता है। मजबूरी में लोगों से मदद मांगनी पड़ती है, जो आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है। सरकार दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुविधाएं नदारद हैं। यदि स्टेशन पर रैंप, व्हीलचेयर और सहायक कर्मी उपलब्ध हों तो हम भी सामान्य यात्रियों की तरह सम्मान के साथ यात्रा कर सकेंगे। - नाको यादव लखीसराय जिले में दिव्यांगों की समस्याएं वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं। सुगम्य भारत अभियान केवल बोर्ड और कागजों तक सीमित है। स्टेशन, बैंक और सरकारी कार्यालयों में निरीक्षण की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 का पालन न होना गंभीर चिंता का विषय है। प्रशासन को चाहिए कि नियमित ऑडिट हो और लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई तय की जाए। दिव्यांगों को दया नहीं, अधिकार चाहिए। जब तक योजनाओं के क्रियान्वयन में दिव्यांगों की भागीदारी नहीं होगी, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं है। - गोपाल राम मैं दिव्यांग हूं और बैंक जाना मेरे लिए सबसे बड़ी परेशानी है। बैंक में न रैंप है और न अलग काउंटर। घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। कई बार मजबूरी में किसी दूसरे से काम करवाना पड़ता है, जिससे मेरी गोपनीयता खत्म हो जाती है। सरकार बैंकिंग सुविधाओं में प्राथमिकता की बात करती है, लेकिन शाखा स्तर पर कोई सुनवाई नहीं है। यदि बैंकों में बैठने की व्यवस्था, रैंप और अलग काउंटर हों तो हम आत्मनिर्भर बन सकते हैं। दिव्यांगों को भी समान अधिकार मिलना चाहिए। - ओम प्रकाश स्नेही दिव्यांगों की समस्या केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जब हमारे शहर में फुटपाथ टूटे हों, खुले नाले हों और ऊंचे-नीचे रास्ते हों तो दिव्यांग कैसे चलेंगे। प्रशासन को चाहिए कि शहरी विकास योजनाओं में दिव्यांगों की जरूरतों को प्राथमिकता दे। यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि मानवाधिकार का सवाल है। लखीसराय जैसे जिले में यदि बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पा रहीं तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। - कपिल राम मैं एक दिव्यांग महिला हूं और घर से बाहर निकलना मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। बाजार, बैंक या अस्पताल जाने के लिए हर बार किसी पर निर्भर रहना पड़ता है। महिलाओं के लिए सुरक्षा पहले से ही चिंता का विषय है और दिव्यांग महिला होने पर मुश्किल और बढ़ जाती है। बैटरी चालित ट्रायसाइकिल मिली थी, लेकिन बैटरी खराब होने के बाद वह बेकार हो गई। नई बैटरी खरीदना मेरे बस की बात नहीं है। सरकार यदि रखरखाव की जिम्मेदारी ले तो हम भी सम्मान के साथ जीवन जी सकते हैं।- अंजू कुमारी - हमारा संगठन लंबे समय से प्रशासन को ज्ञापन देता आ रहा है, लेकिन सुनवाई नहीं होती। कानून स्पष्ट है कि सार्वजनिक स्थल दिव्यांगों के अनुकूल होने चाहिए। इसके बावजूद स्टेशन और बैंक जैसे स्थानों पर कोई व्यवस्था नहीं है। यदि जिला स्तर पर एक समन्वय समिति बने और उसमें दिव्यांगों को शामिल किया जाए तो समस्याओं का समाधान संभव है। केवल योजनाएं बनाना काफी नहीं, उनका सही क्रियान्वयन जरूरी है। दिव्यांग भी इस समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। - मनोज कुमार गुप्ता - जब बैटरी चालित ट्रायसाइकिल मिली थी, तब लगा था कि जिंदगी बदल जाएगी। मैं खुद बाजार और बैंक जाने लगा था। लेकिन बैटरी खराब होते ही सब कुछ रुक गया। सर्विस सेंटर न होने के कारण ट्रायसाइकिल महीनों से खराब पड़ी है। बाहर जिले में मरम्मत कराना बहुत महंगा है। सरकार ने वाहन दिया, लेकिन उसके रख-रखाव की कोई व्यवस्था नहीं की। इससे फिर से हम घर में कैद होकर रह गए हैं। - मो. सफदर अली - दिव्यांग महिलाओं की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। उन्हें न केवल शारीरिक बल्कि सामाजिक बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है। लखीसराय में सार्वजनिक स्थानों पर दिव्यांग महिलाओं के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं है। शौचालय तक पहुंचना भी कठिन होता है। सरकार यदि महिला और दिव्यांग दोनों दृष्टिकोण से योजनाएं बनाए तो स्थिति में सुधार हो सकता है। केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन से बदलाव आएगा। - मनोज कुमार - हम युवा पीढ़ी को भी दिव्यांगों के अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए। यह शर्म की बात है कि आज भी दिव्यांगों को स्टेशन पर उठाकर ले जाना पड़ता है। यह आधुनिक भारत की तस्वीर नहीं हो सकती। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इस मुद्दे पर गंभीरता दिखानी चाहिए। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो यह सामाजिक अन्याय बना रहेगा। - मनोज साहनी - देश की सेवा करने के बाद भी दिव्यांगों को मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह बेहद दुखद है। कानून होने के बावजूद उसका पालन न होना प्रशासनिक विफलता है। दिव्यांगों को सहानुभूति नहीं, सम्मान चाहिए। यदि सार्वजनिक स्थानों को सुलभ बना दिया जाए तो वे भी आत्मनिर्भर बन सकते हैं। - बिनोद कुमार - हमारे बाजार दिव्यांगों के लिए बिल्कुल अनुकूल नहीं हैं। फुटपाथ टूटे हुए हैं और अतिक्रमण के कारण रास्ता नहीं बचता। व्यापारियों को भी संवेदनशील होना चाहिए। यदि बाजार में रैंप और समतल रास्ते हों तो दिव्यांग भी खरीदारी कर सकेंगे। यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। - मुशो तांती - मैं वर्षों से देख रहा हूं कि योजनाएं आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन दिव्यांगों की स्थिति नहीं बदलती। प्रशासनिक उदासीनता सबसे बड़ी समस्या है। यदि जिम्मेदारी तय हो और निगरानी हो तो हालात बदल सकते हैं। दिव्यांगों को मुख्यधारा से जोड़ना केवल नारा नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य है। यदि चाहें तो मैं इन्हें समाचार प्रारूप, कटिंग बॉक्स या नाम-पद सहित कोटेशन में भी तैयार कर सकता हूं। - धीरज कुमार लहेरी

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