मक्के की खेती में बढ़ी मुश्किलें, किसानों के लिए लागत निकालना भी चुनौती
- तेज हवा और बारिश से गिरी फसल, उत्पादन पर पड़ा असर - KISHAN - KISHAN

मनीष कुमार, लखीसराय। जिले में इस वर्ष मक्के की खेती करने वाले किसानों की स्थिति चिंताजनक हो गई है। सूर्यगढ़ा, पिपरिया प्रखंड और टाल क्षेत्र के गिने-चुने किसान ही मक्के की खेती करते हैं, लेकिन इस बार मौसम की मार ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है। फसल तैयार होने के समय हुई बारिश और तेज हवा के कारण खेतों में खड़ी मक्के की फसल गिर गई, जिससे पैदावार पर सीधा असर पड़ा है। किसानों का कहना है कि मक्के की खेती में बीज से लेकर खाद, सिंचाई और मजदूरी तक काफी खर्च होता है। फसल तैयार होने तक लगातार देखभाल करनी पड़ती है, लेकिन इस बार जब फसल कटाई के करीब थी, तभी मौसम ने करवट ले ली।
तेज हवा के कारण पौधे जमीन पर गिर गए और खेतों में नमी बढ़ने से दाने भी ठीक से विकसित नहीं हो पाए। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि किसान अब मुनाफा तो दूर, अपनी लागत निकालने को लेकर भी चिंतित हैं। कई किसानों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो वे अगले वर्ष मक्के की खेती से दूरी बना सकते हैं। कृषि विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बदलते मौसम के कारण खेती का जोखिम लगातार बढ़ रहा है, जिससे किसानों की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। किसानों ने सरकार से मुआवजा और सहायता की मांग की है। उनका कहना है कि प्राकृतिक आपदा के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए उचित कदम उठाए जाएं, ताकि वे अगली फसल के लिए तैयार हो सकें।किसानों ने कहा-इस साल मक्के की फसल से हमें काफी उम्मीद थी, लेकिन मौसम ने सब बिगाड़ दिया। जब फसल तैयार होने वाली थी, तभी तेज हवा और बारिश ने खेत में खड़ी फसल को गिरा दिया। इससे दाने सही से नहीं भर पाए और उत्पादन घट गया। हमने बीज, खाद और मजदूरी में काफी पैसा लगाया था, लेकिन अब लगता है कि लागत निकालना भी मुश्किल हो जाएगा। अगर सरकार से कोई मदद नहीं मिली तो आगे मक्के की खेती करना कठिन हो जाएगा। - शिव पार्वती नंदन, किसान।मक्के की खेती आसान नहीं होती। शुरुआत से लेकर अंत तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है। इस बार हमने अच्छी तैयारी की थी, लेकिन मौसम ने धोखा दे दिया। फसल गिरने के कारण बहुत नुकसान हुआ है। खेत में नमी ज्यादा हो जाने से फसल सड़ने भी लगी है। अब जो पैदावार होगी, उससे लागत निकलना भी मुश्किल है। हम चाहते हैं कि सरकार इस नुकसान का आकलन कर हमें राहत दे। - चंद्रेश्वर सिंहहम हर साल थोड़ी-बहुत मक्के की खेती करते हैं, लेकिन इस बार का नुकसान सबसे ज्यादा है। तेज हवा के कारण पौधे जमीन पर गिर गए और कई जगह टूट भी गए। इससे दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए। बाजार में भी सही कीमत नहीं मिलती है। ऐसे में खेती घाटे का सौदा बन गई है। अगर यही हाल रहा तो हमें मक्के की खेती छोड़नी पड़ सकती है। - नित्यानंद शर्माइस बार मौसम पूरी तरह से किसानों के खिलाफ रहा है। पहले गर्मी कम थी और फिर अचानक बारिश और तेज हवा आ गई। इससे फसल पर बुरा असर पड़ा। हमने काफी मेहनत और पैसा लगाया था, लेकिन अब लग रहा है कि कुछ भी हाथ नहीं आएगा। सरकार को चाहिए कि ऐसे किसानों की मदद करे, ताकि हम आगे खेती जारी रख सकें। - रजनीश कुमारमक्के की फसल गिरने से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। खेत में पानी जमा हो गया, जिससे दाने खराब हो गए। हमने सोचा था कि इस बार अच्छी कमाई होगी, लेकिन अब हालत उलट हो गई है। लागत निकालना भी मुश्किल लग रहा है। सरकार अगर मुआवजा दे दे तो कुछ राहत मिल सकती है। - रामकिशोर कुमार- हम छोटे किसान हैं और मक्के की खेती से ही उम्मीद रखते हैं। इस बार मौसम ने हमारी पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। फसल गिरने से उत्पादन आधा रह गया है। बाजार में भी भाव अच्छा नहीं मिल रहा है। ऐसे में हम कर्ज में डूब सकते हैं। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। - सुबोध सिंहमक्के की खेती में खर्च बहुत होता है। बीज, खाद और मजदूरी में काफी पैसा लगाना पड़ता है। इस बार जब फसल तैयार थी, तभी तेज हवा और बारिश ने सब बिगाड़ दिया। अब खेत में गिरी फसल को संभालना भी मुश्किल है। हम चाहते हैं कि सरकार सर्वे कराकर हमें उचित मुआवजा दे। - उदेश्वर शर्माइस साल की मक्के की फसल से हमें काफी उम्मीद थी, लेकिन मौसम ने सब खराब कर दिया। फसल गिरने से दाने ठीक से नहीं बने और पैदावार कम हो गई। अब लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। अगर सरकार मदद नहीं करेगी तो हम अगले साल मक्के की खेती नहीं करेंगे। - नरेश यादव
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