बेमौसम बारिश से मकई की फसल को हुआ है नुकसान

हिन्दुस्तान, किशनगंज
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बेमौसम बारिश से मकई की फसल को हुआ है नुकसान

किशनगंज। हिन्दुस्तान टीम किशनगंज जिले में पहले की तुलना मकई की खेती किसानों की पसंद बन रही है। जिस कारण जिले में मकई की खेती का रकवा प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। जिले के सभी 7 प्रखंडों में मकई की खेती हो रही है। वहीं दूसरी ओर खेती-किसानी में दिन-प्रतिदिन चुनौती बढ़ती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम की अनिश्चितता बढ़ी है। बाढ़, सुखाड़, ओलावृष्टि से फसलों का नुकसान बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ खाद-बीज के दाम बढ़े हैं। मौसम में बदलाव से पंपिंग सेट से सिंचाई करनी पड़ रही है। मजदूरों की कमी से रोपनी, निकाई-गुड़ाई महंगी होती जा रही है।

किसानों के पास संसाधन का अभाव है। उन्हें किराए पर कृषि उपकरण लेकर खेती करनी पड़ रही है। कर्ज लेकर खाद-बीज खरीदना पड़ रहा है। उसके बाद भी तैयार फसल को बेचने में पापड़ बेलने पड़ते हैं। धान-गेहूं, मक्का से लेकर दलहन-तेलहन, सब्जी मंडी में बिचौलिए हावी हैं। कर्ज चुकाने के लिए किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं।बदलते मौसम में उन्नत और मौसम अनुकूल बीज का प्रयोग भी किसानों के लिए चुनौती है। बीज के दर में बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसे में किसानों पर बीज का खर्च बढ़ा है।भविष्य तलाश रहे टेढ़ागाछ के किसान :टेढ़ागाछ प्रखंड में कृषि ही आजीविका का मुख्य आधार है। इस वर्ष क्षेत्र के किसानों ने अधिक मुनाफे की आश में बड़ी उम्मीदों के साथ मक्के की खेती की थी, लेकिन आज उनकी उम्मीदें बाजार की अनिश्चितता और मौसम की बेरुखी की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। डाकपोखर पंचायत स्थित हरहरिया गांव के स्थानीय किसान बसंत सिन्हा बताते हैं कि एक एकड़ मक्के की खेती में बीज, जुताई, पटवन और खाद मिलाकर लगभग 30 हजार रुपये का खर्च आता है। मक्के की फसल तैयार होने में 5 से 6 महीने का समय लगता है। वर्तमान में बाजार में मक्के का भाव लगभग 1900 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बना हुआ है। इस भाव पर बेचने से किसानों को केवल उनकी लागत पूंजी ही वापस मिल पा रही है, मेहनत का मूल्य शून्य साबित हो रहा है। इस साल बेमौसम बारिश ने किसानों की कमर तोड़ दी है। बारिश के कारण कई जगह फसल बर्बाद हुई, जिसका सीधा असर मक्के के दानों की गुणवत्ता पर पड़ा है। इसके अलावा, खेती के समय डीएपी खाद की कमी और उसकी कालाबाजारी किसानों की मुश्किलें और बढ़ा देती हैं । मजबूरी में किसानों को निर्धारित दर से अधिक कीमत चुकाकर खाद खरीदनी पड़ती हैं, जिससे उत्पादन लागत और अधिक हो जाती हैं।टेढ़ागाछ के अधिकांश किसान साहुकारों और महाजनों से ऊंचे ब्याज दर पर कर्ज लेकर खेती करते हैं। उनकी योजना होती है कि फसल बेचकर वे सूद समेत कर्ज चुकता कर देंगे। लेकिन अब जब फसल तैयार है और बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल रहा, तो वे 'औने-पौने' दाम पर अपनी उपज बेचने को मजबूर हैं। इससे उनके सामने न केवल कर्ज चुकाने का संकट खड़ा हो गया है, बल्कि अगली फसल की बुवाई के लिए भी पूंजी का अभाव दिख रहा है।किसानों का मानना है कि यदि टेढ़ागाछ प्रखंड में सरकारी बाजार समिति या उचित भंडारण की व्यवस्था होती, तो उन्हें बिचौलियों के हाथों नहीं लुटना पड़ता। बाजार समिति होने से न्यूनतम समर्थन मूल्य या एक निश्चित बेहतर भाव की उम्मीद रहती, जिससे किसानों को उनकी मेहनत का फल मिल पाता। टेढ़ागाछ के किसानों की यह व्यथा शासन और प्रशासन के लिए एक गंभीर संदेश है। जब तक स्थानीय स्तर पर बाजार की व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी और प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई का ठोस तंत्र नहीं बनेगा, तब तक अन्नदाता इसी तरह कर्ज और घाटे के बोझ तले दबता रहेगा।

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