दुष्प्रभाव: बढ़ती लागत और बदलते मौसम से खेती पर संकट छाया

हिन्दुस्तान, किशनगंज
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किसान कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और मौसम की अनिश्चितता ने खेती को प्रभावित किया है। लागत में वृद्धि, मजदूरों की कमी, और महंगे बीजों के कारण किसान कृषि उपकरण किराए पर लेने को मजबूर हैं। स्थानीय मंडियों की कमी के कारण फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।

दुष्प्रभाव: बढ़ती लागत और बदलते मौसम से खेती पर संकट छाया

किशनगंज, हिन्दुस्तान टीम। खेती-किसानी में दिन-प्रतिदिन चुनौती बढ़ती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम की अनिश्चितता बढ़ी है। बाढ़, सुखाड़, ओलावृष्टि से फसलों का नुकसान बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ खेती कार्य में पहले की तुलना लागत बढ़ गई है। खाद-बीज के दाम बढ़े हैं। मौसम में बदलाव से पंपिंग सेट से सिंचाई करनी पड़ रही है। मजदूरों की कमी से रोपनी, निकाई-गुड़ाई महंगी होती जा रही है। किसानों के पास संसाधन का अभाव है। उन्हें किराए पर कृषि उपकरण लेकर खेती करनी पड़ रही है। कर्ज लेकर खाद-बीज खरीदना पड़ रहा है। उसके बाद भी तैयार फसल को बेचने में पापड़ बेलने पड़ते हैं।

धान-गेहूं, मक्का से लेकर दलहन-तेलहन, सब्जी मंडी में बिचौलिए हावी हैं। कर्ज चुकाने के लिए किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं।बदलते मौसम में उन्नत और मौसम अनुकूल बीज का प्रयोग भी किसानों के लिए चुनौती है। बीज के दर में बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसे में किसानों पर बीज का खर्च बढ़ा है। सभी किसानों तक सरकारी बीज की पहुंच नहीं है। ऐसे में निजी एजेंसियों से बीज खरीदना किसानों को महंगा पड़ रहा है। गेहूं का 20 किलो का पैकेट 1400 से 1500 रुपये के बीच में आ रहा है। पहले यह 1200 से 1300 में मिल जाता था। सबसे जयादा सब्जी बीज के दाम बढ़े हैं। किसानों को खाद भी समय पर नहीं मिल पाती है। बदलते मौसम में कीट-पतंगे और रोग का प्रकोप बढ़ा है। इनसे फसलों को बचाने के लिए किसानों को कीटनाशक का सहारा लेना पड़ता है। एक फसल में दो से तीन बार छिड़काव करना पड़ता है। यह भी खेती की लागत बढ़ने का प्रमुख कारण है। गांव में पलायन के चलते खेतिहर मजदूरों का अभाव है। मुफ्त अनाज योजना से उन्हें राशन मिल जाता है। अतिरिक्त कमाई के लिए वे दूसरे राज्य या शहरों का रुख करते हैं। मजदूरों की कमी के चलते किसानों की कृषि यंत्रों पर निर्भरता बढ़ी है। किसान इमरान कहते हैं कि निकौनी, रोपनी आदि में मजदूरों की जरूरत होती है तो उन्हें ज्यादा मजदूरी देनी पड़ती है। यही कारण है कि फसल खराब होने की स्थिति में लागत भी नहीं निकल पाती है। मजदूरों की ज्यादा जरूरत वाली खेती से किसानों का मोह भंग हो रहा है। ठाकुरगंज क्षेत्र में बड़े पैमाने पर होने वाली अनानास की खेती आज भी स्थानीय मंडी के अभाव में जूझ रही है। गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए पहचान बना चुके इस क्षेत्र के किसान अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने से परेशान हैं और मजबूरन पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल की मंडियों पर निर्भर हैं। क्षेत्र में सैकड़ों एकड़ भूमि पर अनानास की खेती होती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मंडी की व्यवस्था नहीं होने के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए पश्चिम बंगाल के विधाननगर जैसे बाजारों का रुख करना पड़ता है। इससे परिवहन लागत बढ़ जाती है और बिचौलियों के कारण किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता। किसानों का कहना है कि यदि स्थानीय मंडी होती, तो उन्हें बेहतर मूल्य मिलने के साथ समय और खर्च दोनों की बचत होती।

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