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परबत्ता: अंग्रेजी हुकूमत में क्षेत्र के लोगों क़ो आर्थिक मजबूती प्रदान करने वाला खादी ग्रामोद्योग के अस्तित्व पर संकट

परबत्ता: अंग्रेजी हुकूमत में क्षेत्र के लोगों क़ो आर्थिक मजबूती प्रदान करने वाला खादी ग्रामोद्योग के अस्तित्व पर संकट

संक्षेप:

2. बोले :परबत्ता: अंग्रेजी हुकूमत में क्षेत्र के लोगों क़ो आर्थिक मजबूती प्रदान करने वाला खादी ग्रामोद्योग के अस्तित्व पर संकटपरबत्ता: अंग्रेजी हुकूमत

Sep 15, 2025 04:05 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, खगडि़या
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परबत्ता । एक प्रतिनिधि अंग्रेजी हुकूमत निरंकुश शासक में क्षेत्र के लोगो क़ो आर्थिक मजबूती प्रदान करने वाला खादी ग्रामोद्योग आज उनके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पर, सरकार व विभाग इसके प्रति उदासीन बने हुए हैं। इसे पुनर्जीवित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं। बुजुर्गो की माने तो इस क्षेत्र के लोग आजादी के पूर्व से ही बापू के चरखे के दीवाने थे लेकिन आज बापू के चरखे की संगीत सुनाई नहीं पर रही है क प्राप्त जानकारी के अनुसार अंग्रेजी हुकूमत निरंकुश शासनकल में आजादी के पूर्व वर्ष 1927 में ही प्रखंड के कन्हैयाचक, डुमरिया बुजुर्ग खजरैठा, माधवपुर, कबेला आदि में खादी भंडार की स्थापना की जा चुकी थी।

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स्थापना के बाद प्रखंड के दर्जनों गांवों की महिला व पुरुष गांधी के चरखे की संगीत की धुन के दीवाने हो गए थे। गांव की हजारों महिलाओं को रोटी व रोजगार के अवसर मिल गए थे। प्रखंड के विभिन्न पंचायतों के लोग खादी ग्रामोद्योग के दीवाने हो गए थे। यही कारण था कि स्वतंत्रता आंदोलन में पुराने जिला मुंगेर में खासकर परबत्ता प्रखंड के करीब 450 स्वतंत्रता सेनानी का नाम सरकार के दस्तावेजों के स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। आजादी के बाद पता नहीं किसी की कुदृष्टि लगी उक्त खादी भंडार का धीरे-धीरे स्तर गिरता चला गया और चरखे की संगीत की लौ मंद होते चला गया। वर्ष 1980 से दिन प्रतिदिन विकास का ग्राफ गिरता गया। वर्ष 2007 से 2008 में पूर्णरूपेण बंद हो गया। खादी ग्रामोद्योग को पुनर्जीवित करने का प्रयास : खादी ग्रामोद्योग भागलपुर अंतर्गत सुल्तानगंज के नेतृत्व में वर्ष 2014-15 में पुन: राजकोट चरखे की संगीत शुरू की गई। प्रखंड की कुछ साहसिक महिलाओ ने खादी भंडार डुमरिया बुजुर्ग के प्रांगण में दशकों बाद एक बार फिर बापू के चरखे की संगीत की धुन शुरू की। साथ ही इस कार्यक्रम के शुरू होने से पंचायत के दर्जनों महिलाएं व रोटी रोजगार के लिए आत्मनिर्भर हो रही थी। इस संस्था के नेतृत्व में काम कर रही स्थानीय महिलाएं जोगा देवी, सुगनी देवी, रूपकला देवी, कमोजा देवी, लीला देवी, संगीता देवी, चुना देवी, रेणु देवी, रूपकला देवी, अंजनी देवी आदि ने बताया कि कई दशकों से बंद पड़े खादी ग्राम उद्योग को पूर्ण जीवित कर गांव की महिलाओं को रोटी रोजगार से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास जारी है। इधर उन्होंने बताया कि इन लोगों को खादी भंडार सुल्तानगंज द्वारा कच्चे माल उपलब्ध कराए जाते थे। करीब 25 महिलाओं द्वारा चरखे चलाए जाते थे तथा धागे तैयार कर उन्हें वापस कर दिए जाते थे। बदले में उक्त महिलाओं को मजदूरी के रूप में मोटा सूट तैयार करने पर सौ रुपए प्रति किलो एवं महीन सूत्र तैयार करने पर डेढ़ सौ रुपए प्रति किलो दिए जाते हैं। प्रत्येक महिलाएं प्रतिदिन डेढ़ सें दो किलो तक सूट तैयार कर लेते थे। हालांकि यह सब महिलाओं के लिए छोटे सा प्रयास का प्रतिफल था। काश! प्रखंड में मृतप्राय खादी भंडार को पुन: संचालित किया जाता तो प्रखंड की महिलाओं को रोटी व रोजगार से जुड़ने का अवसर मिल पाता। खादी आज के भारतीय समाज में आर्थिक और राजनीतिक जीवन में सम्मान की दृष्टि से जाने जाते हैं। आत्मनिर्भर योजना से जगी थी नई आस : कोरोना काल में केन्द्र सरकार ने आत्मनिर्भर योजना के तहत सभी क्षेत्रो में पैकेज की घोषणा की थी। खादी ग्रामोद्योग से जुडे़ लोगों का मानना है कि इस योजना से एक नई आस जगी थी। स्वदेशी वस्तु को बढ़ावा देने के खादी ग्रामोद्योग महत्वपूर्ण कड़ी है। खादी भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में आज भी प्रासंगिक है। इसके माध्यम से न केवल देश प्रदेश की छिपी हुई बेरोजगारी को दूर कर लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है, बल्कि यह देश की आर्थिक समृद्धि के लिये भी महत्वपूर्ण है। बस जरूरत हैं खादी ग्रामोद्योग को अमलीजामा पहनाया जाए। सूत काटने में यहां की महिलाएं हैं कुशल : भागलपुर जिला खादी ग्राम उद्योग के सचिव वरुण कुमार एवं समृद्ध खादी भंडार डुमरिया बुजुर्ग केन्द्र के मैनेजर पंचानंद शर्मा ने बताया कि इस केन्द्र की महिलाएं चरखा से सूत काटने में काफी माहिर है। यदि पुन: बराबर उपलब्ध कराया जाए तो महीने की मजदूरी इस केन्द्र से 50 हजार से आधिक है. समय के हिसाब से आज सभी सूत काटने वाली महिलाओं की मजदूरी सीधे खाते में दी जाती थी। आजादी में थी चरखे की अहम भूमिका : आजादी के आन्दोलन के दौरान चरखा की अहम् भूमिका रही थी। अमूमन सभी जागरूक घरों के पुरुष स्वतंत्रता संग्राम में व्यस्त रहते थे और घर की महिलाएंं चरखा काटकर अपने घर का संचालन करती थी। चरखा न केवल आत्मनिर्भर होने में सहयोग करता था, बल्कि देश को भी विदेशी कपड़ों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंग्रेजी कब्जे से मुक्ति का माध्यम भी था। बोले अधिकारी : सहयोग नहीं मिलने के कारण खादी ग्रामोद्योग की शाखाएं बंद पड़ी हैं। आर्थिक सहयोग मिलते ही सभी सेंटर को पुन: संचालित किया जाएगा। अभय चौधरी, अध्यक्ष, खादी ग्रामोद्योग, भागलपुर।