अलौली प्रखंड में 70 हजार पशुओं की देख रेख के लिए मात्र तीन तीन पशु अस्पताल संचालित
अलौली प्रखंड में 70 हजार पशुओं की देख रेख के लिए मात्र तीन तीन पशु अस्पताल संचालित अलौली प्रखंड में 70 हजार पशुओं की देख रेख के लिए मात्र तीन तीन पशु
अलौली। एक प्रतिनिधि समय के साथ पशुपालन की सोच में भी बदलाव देखा जा रहा है। जिस कारण क्षेत्र में बदहाल जीवन जी रहे पशुपालकों के समक्ष पशु के लिए कोई ठोस कोई योजना देखने को नहंी मिल रही है। पशुओं का रख रखाव भी काफी कठिनाई हो रही है। बाढ़ व बारिश के दौरान जानवर को तीन चार माह पलायन करना पड़ता है। ठंड के समय में पशु को सुरक्षित रख पाना सब के वश की बात नहीं होती है। इस मौसम में बड़े जानवर भी देखते ही देखते मर जाते हैं। छोटे पशु जैसे बकरी भी सुरक्षित नहीं रख पाते हैं।
गर्मी के मौसम में अधिकांश जानवर पानी की खोज करते रहते हैं। बताया जाता है कि क्षेत्र में नदियों का जल स्तर काफी नीचे जा रहा है। कुछ नदियों तो कछ माह सूख ही जाती है। वहीं पुराने सभी तालाब अब नष्ट हो गए हैं। कुंआ नाम मात्र का ही रहा है। अधिकांश पशु पालक चापानल के भरोसे ही जानवर की सुरक्षा करते हैं। पहले चारागाह क्षेत्र हुआ करता था। जहां जानवर चारा खा कर समय काटते थे। गांव की आबादी जिस अनुपात में बढ़ रही है। उसी अनुपात में चास और बास की जमीन भी घटती जा रही है। सरकारी जमीन या तो पूर्व से अतिक्रमित है या फिर उसपर दबंगों का बोलवाला कहा जाता है। सरकार स्तर से नहीं मिल रही सुविधाएं : पशुपालन के लिए सरकारी चारागाह की व्यवस्था होनी चाहिए। जिसमें पशुपालक अपने पशु को कुछ माह के लिए सुरक्षित कर पाते। पहले पशुओं के चारा के लिए कई तरह के साधन उपलब्ध रहते हैं। कोशी तरटबंध पर भी चारा की व्यवस्था थी। कुछ निर्धारित दर पर लोग कुछ भाग खरीदकर पशु की चारा व्यवस्था कर लिया करते थे। सरकारी जमीन या चौवालीस की विादित परती जमीन का लाभ लोग ले लेते थे। इतना ही नहीं पशु की सुरक्षा को लेकर प्रखंड स्तर से धूप, ठंड से बचाव के लिए पॉलिथिन सीट पशुपालकों को उपलब्ध करायी जाती थी। जिससे पशुपालक स्वयं और अपने जानवर को सुरक्षित कर लेते थे। पशुपालकों को पशु अस्पताल की ओर से चारा के लिए घास के कुछ बीज भी उपलब्ध हो जाया करता था। अस्पताल में मिलती थी सुविधाएं : अस्पताल में जानवर को पाल कराने के लिए व्यवस्था पूरी रहती थी। 10 से 12 भैंसा एवं सांड़ उपलब्ध रहता था। जो कई दशक से बंद हो गया है। अस्पताल में डॉक्टर, कम्पाउंडर परिचारी हुआ करते थे। अब अस्पताल में डॉक्टर है तो कंपाउंडर नहीं। एक डॉक्टर कई अस्पताल की देखरेख करते हैं। जानवर मर जाता है तो उसे व्यवस्थित करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं हो पायी है। पशुपालक को अपनी सुविधा अनुसार मरे हुए जानवर को व्यवस्था करनी पड़ती है। धीरे-धीरे पशुपालक पशु अस्पताल को भूलने लगे। इनके भवन भी जर्जर होकर या तो गिरने लगे या फिर अतिक्रमित हो गए हैं। जिसकी निगरानी कभी भी वरीय पदाधिकारी द्वारा नहीं हो पा रही है। पूर्व जैसे सुविधा का भी अभाव देखा जा रहा है। पंचायत प्रतिनिधि नहीं दे पाते ध्यान : जहां के अधिकांश लोग खेती वं पशुपालन के काम से जुड़े है वहां के जन प्रतिनिधि अब तक किसान एवं पशुपालक के हित में एक भी प्रस्ताव पारित करते नहीं सुना गया है। दो दशक में ग्राम सभा से पशु के प्रति कोई प्रस्ताव की बात नहीं बतायी जा रही है। गव्य विभाग कार्यरत रहते हुए भी पशुपालक को यह पता नहीं कि इनके लिए कौन सी योजना चलायी जा रही है? बताया जाता है कि समाज के चाटुकार लोग या पहुंच वाले व्यक्ति तक ही गव्य विकास एवं मनरेगा शेड का लाभ उपलब्ध हो पाया। मूल रूप से पशुपालक सरकारी योजना के लाभ से आज भी वंचित ही बताया जा रहा है। तीन पशु अस्पताल संचालित : अलौली, बहादुरपुर एवं शुंभा गांव में पशु अस्पताल का संचालन हो रहा है। हरिपुर पशु अस्पताल भवन 1987 की बाढ़ में टूटकर गिर गया। जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पायी है। आवश्यकता है पशु अस्पतालओं को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना, समय परिस्थिति अनुसार दवा का भंडारण, जानवर के सीमेन की पुख्ता वं उपलब्धता सुलभ कीमत पर उपलब्ध कराना जो नहीं हो पाता है। बोले अधिकारी : अलौली एवं शुंभा अस्पताल में देखरेख में चलता है। 37 तरह की दवा अस्पताल में उपलब्ध है। समय-समय पर पशु का टीकाकरण किया जाता है। ग्रामीण स्तर पर शिविर आयोजित कर पशुपालकों को जाग्न६क किया जाता है। स्टाफ की कमी है। कंपाउंडर तो है ही नहंी। भ्रमणशील चिकित्सा दी जाती है। डॉ प्रभात कुमार, चिकित्सा पदाधिकारी, प्रथम श्रेणी पशु चिकित्सालय, अलौली। बोले लोग : 1. पशुओं का पालन अब धीरे-धीरे कठिन होता जा रहा है। नया जेनरेशन अब इस पेशे से दूर हो रहा है। सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। विनोदी यादव, पशुपालक। 2. पशुपालन की विपरीत समय परिस्थिति हो गई है। पहले आम लो पशुपालन कर लेते थे। अब वैसा नहीं रहा। मृत्युंजय कुमार, पशुपालक। 3. किसान एवं पशुपालक के लिए सरकारी स्तर से कोई सहायता नहीं मिलती है। जानवर मरने पर भी परेशानी रहती है। रामबहादुर यादव, पशुपालक। 4. जानवर का रखरखाव भी सही से नहीं हो पाता है। जिस कारण लाभ की जगह काफी नुकसान झेलना पड़ता है। मुकेश कुमार, पशुपालक। 5. पूर्व में चारागाह का क्षेत्र होता था। जलाशय की व्यवस्था रहती थी। अब वैसा कुछ नहीं है। पशु के लिए शेड का निर्माण मनरेगा से भी सभी को नहीं उपलब्ध हो पाता है। कपिलदेव यादव, पशुपालक। 6. झोलाछाप डॉक्टर से भरोसे पशु का इलाज हो पाता है। पहले पशु अस्पताल पशुपालक का भरोसेमंद हुआ करता था। अब वैसा नहीं रहा है। इसके विकास के लिए सरकार को सोचना चाहिए। प्रमोद यादव, पशुपालक। फोटो: 8 कैप्शन: अलौली: किसान के घर पर जैसे तैसे रहते पशु एवं प्रखंड परिसर स्थित पशु चिकित्सालय। प्रस्तुति: सतीश कुमार।

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