जब महादलित टोला में पहुँची साईिकल यात्रा, बच्चों की मुस्कान से खिल उठा होली का त्योहार

Mar 02, 2026 12:49 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, जमुई
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जब महादलित टोला में पहुँची साईिकल यात्रा, बच्चों की मुस्कान से खिल उठा होली का त्योहार जब महादलित टोला में पहुँची साईिकल यात्रा, बच्चों की मुस्कान से

जब महादलित टोला में पहुँची साईिकल यात्रा, बच्चों की मुस्कान से खिल उठा होली का त्योहार

जमुई, एक प्रतिनिधि होली का त्योहार खुशियों, प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है, लेकिन जब यही खुशियां समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े बच्चों तक पहुंचती हैं तो त्योहार का अर्थ और भी बड़ा हो जाता है। साईिकल यात्रा एक विचार, जमुई की 530वीं रविवारीय साईिकल यात्रा के क्रम में इस बार खैरा प्रखंड के गोपालपुर पंचायत अंतर्गत कस्बा गिद्धौर स्थित महादलित टोला में ऐसा ही भावनात्मक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। मंच के सदस्यों द्वारा सामूहिक रूप से आर्थिक सहयोग से किया गया होली के इस अनोखे कार्यकम में जब महादलित टोला पहुंचे तो बच्चों की आंखों में उत्सुकता और चेहरे पर मुस्कान साफ दिखाई दे रही थी।

सदस्यों ने बच्चों के साथ बैठकर होली मनाई और लगभग 50 बच्चों के बीच अबीर-गुलाल, पिचकारी, कॉपी-पेंसिल, शैक्षणिक सामग्री और मिठाई का वितरण किया। इस अवसर पर निजी जमीन पर एक दर्जन पौधारोपण भी किया गया। मौके पर उपस्थित गोपालपुर के मुखिया प्रतिनिधि पुरुषोत्तम सिंह ने कहा कि होली का रंग केवल गुलाल से नहीं, बल्कि खुशियों से चढ़ता है। और जब यह खुशी समाज के उस हिस्से तक पहुँचे जहां त्योहार अक्सर साधारण दिनों जैसा गुजर जाता है, तब उसका महत्व और बढ़ जाता है। वही सदस्य गोलू कुमार और राजा कुमार ने बताया कि त्योहार तभी सार्थक है जब खुशी उन लोगों तक पहुंचे, जिनके पास खुशियां कम हैं। सदस्यों ने बच्चों को पढ़ाई करने, स्कूल जाने, पेड़ पौधे की देखभाल करने, स्वच्छ रहने और बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया। ग्रामीणों से अपील की गई कि हर बच्चा पढ़े, आगे बढ़े और समाज मजबूत बने। इस अवसर पर परवरिश संस्था के सदस्य सहित मंच के सदस्यों में सचिराज पद्माकर, गोलू कुमार, सनोज कुमार, सोनी कुमारी सत्यम कुमार, हर्ष कुमार सिन्हा, राकेश कुमार, रामप्रवेश कुमार, अभिनय दुबे, शुभम कुमार, विशाल सिंह, राजा सिंह, पंकज कुमार, सिंटू कुमार, पुरुषोत्तम कुमार सिंह, सोनी कुमारी, पूनम कुमारी, मुस्कान कुमारी, अमृता कुमारी, दिव्या कुमारी, गुंजन कुमारी, स्वीटी कुमारी, संजना कुमारी, प्रिया कुमारी, वर्षा कुमारी, गायत्री कुमारी, शैलेश कुमार सिंह, शैलेश भारद्वाज, बरखा कुमारी, रेशम कुमारी, मुन्नी कुमारी, अजीत कुमार, दीपेश, अमर, अमन, चिंटू, सुमित, दिवांशु कुमार सहित कई बच्चे और ग्रामीण उपस्थित थे। ऐसी मस्ती कहां मिलेगी,श्याम नाम रस पी ले..... फागन मेलो के समापन की रात खूब जमा भजनों व होली के धमाल का रंग,पूरी रात जमकर झूमे श्याम दीवाने समापन की घड़ी में भावुक हो गए थे तमाम श्यामभक्त फोटो- 08 : फागन मेलो महोत्सव के दौरान झाझा के श्रीश्याम मंदिर में भजनों की लय पर नाचते-झूमते महिला-पुरूष फोटो- 09 : भगवान कृष्ण के जन्म पर उन्हें कंस के कारा से नंद बाबा के घर ले जाते बासुदेव की झांकी फोटो- 10 : महोत्सव में सुमधुर भजनों की रसधारा बहाते गायक झाझा, निज संवाददाता ऐसी मस्ती कहां मिलेगी,श्याम नाम रस पी ले..... व लो झोली भर लो भक्तों रंग ओ गुलाल से,होली खेलंगा आपा गिरिधर गोपाल स और....न गोरे का ना काले का,घनश्याम मुरली वाले का मैं लाडला....भागलपुर की तान्या अग्रवाल के इन रंगारंग मस्ती भरे धमालों और उधर विभिन्न प्रदेशों से आए रास कलाकारों द्वारा जन्म के बाद कृष्ण को ले यमुना के रास्ते मां यशोदा व नंद बाबा के घर जाते बासुदेव की भावप्रवण झांकी के अलावा राधा-कृष्ण की मनोहारी रास पर फूलों की बरसात के बीच बीते तीन दिनों से जारी श्री श्याम प्रभु का सुप्रसिद्ध ‘फागण मेलो’ महोत्सव शनिवार की देर रात संपन्न हो गया। संपन्न होने के पूर्व आठ वर्ष के लड्डू गोपालों से ले 80 वर्ष तक के बुजुर्ग श्याम दीवानों व ‘मीराओं’ ने भी अबीर-गुलाल की बरसात के बीच सांवरे के दरबार में ही जमकर होली खेली। उक्त धमाल में मंदिर अध्यक्ष गुड्डू बंका,मंत्री चप्पू सुल्तानियां,संयोजक आयुष बंका,अजय छापड़िया,संजय,मनोज व अरूण बंका,पीयूष व नरेश सुल्तानियां,सौरभ गोयल,निर्णय,मनोज व अजय बोहरा आदि समेत अन्य तमाम सदस्य भी शामिल हो,फागण मेलो के महा-उत्सव की सफलता पूर्ण संपन्नता को ले मानों सांवरिए का साधुवाद व आभार प्रकट कर रहे थे। समापन की इस रात की अंतिम घड़ियों में कई बार माहौल काफी भावप्रवण भी हो गया था। बराकर के शिवम पंसारी के ‘रास्ते उठाकर तूने सीने से लगाया है....तथा ‘हारे के सहारे आ जा....व अपने दिल का हाल सुनाने आया हां,म्है तो म्हारे श्याम ने रिझाने आया हां और अंत में....मैं रहूं न रहूं इस दुनियां में,तेरा कीर्त्तन यूं ही चलता रहे’ जैसे भावप्रवण भजनों के साथ यूपी के शिवांग शर्मा ने भी मनमोहक भजनों से श्याम दीवानों को वाकई दीवाना बना दिया था। इसके अलावा रास कलाकारों के जीवंत अभिनय ने मौके पर मौजूद अनेकों श्रद्धालुओं की आंखें नम कर दी थी। वैसे फिर ‘राधा तेरी चुनड़ी व सुन ले रे नंदलाल,तेरी मुरली की धुन मुझे गई रे खटक’ जैसे मस्ती भरे गीतों पर रास रचैयों के रूमानी नृत्य ने श्याम दीवानों को मदमस्त भी कर दिया था। उधर गायक जोड़ी ने भी ‘आएगा,आएगा,आएगा,लीले चढ़ सांवरा आएगा एवं बज गए ढोल-नगाड़े ओऽए क्या बात हो गई,खाटू वाले से अपनी मुलाकात हो गई....’ जैसे मस्ती भरे कई गीतों की सुरा से श्रोताओं को मदमस्त किए रखा था। गायकों की ललकार पर श्याम दीवाने व श्याम की बावरी ‘मीराएं’ भी जोश में भर गई थीं। और फिर श्याम प्रेम में बिल्कुल बेसुध व बिंदास होकर खूब नाचीं। इनके अलावा स्थानीय सुर सम्राट रंजीत केशरी,अमित व सुनील केशरी,संजय जालान,अनुप व लालो केशरी व मुरली मनोहर पांडेय आदि ने लगातार तीसरे दिन भी समां बांधे रखा था। वैसे तो महोत्सव की हर रात ही निराली-मतवाली थी,किंतु समापन वाली यह अंतिम रात तो मानों कयामत ही ढहा रही थी। नशीली-रंगीली हुई इस रात की मस्ती व मादकता का असर श्रद्धालुओं से लेकर सुर सम्राटों तक,सभी के सिर चढ़ा दिख रहा था। इसे सांवरे की भक्ति की पराकाष्ठा कहें या उसके नाम की शक्ति का असर। या फिर.....पूरे एक साल के लिए अपने सांवरे से विछोह की विरह-वेदना के मद्देनजर,उसे रिझाने-मनाने को आज की रात हर चीज दांव पर लगा देने की कसम। रंगीले-रसीले श्यामदीवानों ने समापन की रात की मादकता को पूरे शबाब पर ला दिया था। मनमोहक झांकियों के जरिए रास कलाकारों ने भी खूब बांधा समां: मस्ती के इस तड़के के बीच फिर वृंदावन व कोलकाता के अलावा हरियाणा के रास कलाकारों की रंगारंग झांकियों के छौंक ने तो फिर श्रोताओं की दीवानगी को जैसे और मादक बना डाला था। पौराणिक धार्मिक प्रसंगों पर दिल को छू जाने वाले गीतों के साथ विभिन्न झांकियों के जरिए कलाकारों ने भक्तों के दिलों में भी रोमांच भर दिया था। ऐसे में रास कलाकार दर्शकों की वाहवाही बटोरने में भी अव्वल रहे। व्यवस्था संचालन में मुस्तैद रही पूरी टीम: उक्त विराट आयोजन को सुव्यवस्थित व सुचारू ढंग से मंजिल तक पहुंचाने को ले गुड्डूू बंका,चप्पू सुल्तानियां,आयुष बंका,संजीव सिंघानियां,पीयूष सुल्तानियां,अरूण बंका,कमल डालमिया,सौरभ गोयल अमन व अजय छापड़िया,अशोक उर्फ बब्लू व संजय बंका,संजय जालान,निर्णय व अजय बोहरा,दीपक शर्मा,अशोक खंडेलवाल,सुरेश अग्रवाल,कैलाश अडुकिया,राजन केजरीवाल आदि समेत युवा,महिला व बुजुर्गों से भरी श्याम दीवानों की एक बड़ी फौज दिन-रात समर्पित रही थी। सवामणि भंडारे में भी हजारों की तादाद में उमड़े थे श्रद्धालु: शनिवार के दिन में बाबा के सवामणि महाप्रसाद के रसास्वादन को भी सैकड़ों की भीड़ उमड़ी थी। इसके पूर्व सुबह भक्तों ने बाबा के दरबार में बारस की धोक लगाई थी। श्रीश्याम प्रभु का पूरा मंदिर मंदिर परिसर उनके दीवानों की भीड़ से खचाखच भरा था। उधर,श्रीश्याम मंडल के पदाधिकारियों व सदस्यों के लिए भी यह घड़ी खासी परीक्षा की घड़ी बनी थी। पर,प्रभु कृपा से पदाधिकारी से लेकर सदस्य तक सभी अपनी-अपने कर्त्तव्य की कसौटी पर सौ फीसदी खरे उतरते प्रतीत हुए। महोत्सव की शानदार व सफलतापूर्ण संपन्नता को ले सभी ने प्रभु श्रीश्याम का आभार प्रकट किया। जानें कहां गए वो दिन......बुजुर्ग महिलाओं ने सुनाए अपने जमाने की होली के संस्मरण नहीं रही अब वो बात....बीते जमाने की होकर रह गई हैं होली की मस्ती व परंपराएं फोटो-03 : लक्ष्मी देवी की फोटो फोटो-04 : नीना त्रिवेदी की फोटो फोटो-05 : प्रभावती देवी की फोटो झाझा, निज संवाददाता रंगों का पर्व माने जाने वाले या कहें एक-दूसरे के रंग में रंग जाने वाली होली में अब वह बात नहीं रह गई हैं। तब और अब की होली के बीच लोगों के तौर-तरीकों व अंदाज-मिजाज में क्या,कैसा कितना बदलाव आ गया है,ये बता रही हैं जीवन के 70-80 बसंत या होली देख चूकीं बुजुर्ग महिलाएं। निष्कर्षीय तौर सब की जुबानी बस एक ही कहानी सामने आती मिली है कि.....नहीं रह गई हैं अब वे बातें। होली की मस्ती,परंपराएं,हर शख्स के साथ अपने परिवार जैसी समरसता व भाईचारा और वह उत्साह व उमंग आदि सारी बातें बस अब केवल गुजरे जमाने के किस्से की बात बन कर रह गई हैं। आइए आपको बताते हैं,क्या कहना था इन बुजुर्ग माताओं का। श्रीमति प्रभावती शरण (87): समरसता व भाईचारे का माहौल हुआ करता था,नहीं देखने को मिलती थी कोई जोर-जबर्दस्ती वाली बात: 87 वर्षीया श्रीमति प्रभावती शरण से होली को ले सवाल पर उन बुढ़ी हड्डियों में भी एक बार फिर उत्साह भरी वह चमक व जोश ताजा हो जाता दिखा। बताती हैं कि होली में पहले हर उम्र वर्ग के लोगों की कई टोलियां कई दिन पूर्व से ही विभिन्न मोहल्लों में होली का धमाल मचाए रहती थी। और...खास होली के दिन की तो बात ही निराली हुआ करती थी। इस दिन जो सड़कों पर निकल गए तो फिर उनकी खैर नहीं रहा करती थी। लोग भी बुरा नहीं मानते थे। बल्कि कुछ क्षण का बनावटी गुस्सा दिखाने के बाद फिर खुद ही हंसी-खुशी खुद को रंगों से पुतवा लिया करते थे। टोलियां भी इस कामयाबी पर तालियां बजाकर अगले टार्गेट के लिए उक्त ताजा पुते शख्स को भी शामिल कर लिया करती थी। जोर-जबर्दस्ती जैसी कोई बात ही नहीं हुआ करती थी। शाम में विभिन्न घरों में शर्बत,ठंडई आदि का सार्वजनिक कार्यक्रम रहा करता था जहां गांव-मोहल्ले के लोग सामाजिक समरसता के माहौल में होली के मनभावन गीतों के बीच सादी या भांग वाली ठंडई का आनंद लिया करते थे। पर,अब अधिकांश लोग अपने घर-परिवार तक ही सिमट कर रह गए हैं। न जल्दी कोई रंग लगवाना चाहते हैं और न ही कोई उन्हें जबर्दस्ती लगाकर बखेड़ा लेना चाहता है। लक्ष्मी देवी (85): एक अन्य बुजुर्ग लक्ष्मी देवी का भी कहना था कि अब बेटे पहले वाली कोई भी बात ही रह गई है। परंपराओं के निर्वहन के नाम पर भी सिर्फ मानों खानापू्त्तित भर रह गई है। कहीं वह उत्साह,उमंग या चाव भी अब कहां देखने को मिलता है। अपने जमाने की बातें याद करते हुए बताती हैं कि उस जमाने में तो परिवार के मुखिया के हमजोली बड़े-बूढ़े भी छिछोरे देवर बने लोगों के घरों में धमक जाया करते थे,तो घर की बड़ी-बूढ़ी महिलाएं भी छत से ही रंगों से भरी बाल्टी उझलकर उनकी सारी मस्ती की हवा निकाल दिया करती थीं। इसके पीछे भावना सिर्फ होली की मस्ती की हुआ करती थी,मन में अन्य कोई विकार या दुर्भावना नहीं होती थी। ऐसे में उन मुंहबोले देवर-भाभी की उक्त उधम मस्ती का परिवार के लोग भी बुरा नहीं माना करते थे। कहा,पूजा व परंपराओं को भी हमलोग वैसा ही निभाया करते थे जैसा की उस वक्त हमारी सास बताया करती थी। पर,आज की पीढ़ी,चाहे वह तुम्हारे परिवार की हो या हमारे परिवार की,बड़ों से सीखने या उनका कहा मानने को कहां तैयार दिखती है। हमारे जमाने में होली के दस-बीस दिन पूर्व से ही मस्तानों,मतवालों की टोलियां डफली पर थाप देते हुए हर मोहल्ले में होली का माहौल बनाने में मशगुल हुआ करती थी। मानों लोगों को यह याद दिला रही हो कि अब होली आने वाली है। और...होली के दिन तो बड़े बुजुर्गों तक पर भी मानों जवानी छायी रहती थी। अपने जिन दोस्तों के घर के दरवाजे जान बूझकर बंद किए हुए मिलते थे उनके यहां दूसरे के घरों के छत की ओर से उतरकर फिर रूम के दरवाजे को तब तक पीटा करते थे जब तक कि विवश होकर वह खुद नहीं खोल दे। इसके चंद मिनट में तो फिर सारे मिलकर ऐसी दुर्गत बना डालत थे कि घर वालों के लिए भी उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता था। नीना बहन त्रिवेदी (68): सदियों से मनाए जा रहे इस पर्व के बीते दशकों के दौरान कई रूप देखने को मिले हैं। हमारे जमाने या उससे पहले के लोग भी होली का मतलब इतना ही समझते थे कि यह पर्व सारे विद्वेष भूलाकर प्रेम,भाइचारे,आध्यात्मिक प्रेरणा एवं सनातनी नववर्ष के आगमन की उमंगो का पर्व है। बुरे विचारों पर सत्य सनातन की विजय वाला पर्व है। होली की अनुभूति महीनों पूर्व से ही होने लगती थी। गलियों में ढोल की थाप पर मनोरंजक फगुआ गीत के अलावा हास-परिहास व स्वस्थ व्यंग्य का माहौल हुआ करता था। पर,गुजरे सालों में सामाजिक वातावरण व लोगों के विचारों में खासा बदलाव देखने को मिला है। कहीं न कहीं लोगों की व्यस्तताओं के कारण इस पर्व का स्वरूप भी काफी सिमट गया है।

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