Explainer: नीतीश के CM पद छोड़ने से बिहार की सियासत पर क्या असर; तेजस्वी के लिए भी कैसे सुनहरा अवसर?

Mar 30, 2026 07:05 pm ISTPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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Nitish Kumar Resignation: नीतीश कुमार के बिहार के सत्ता से हटने का एक बड़ा और दूरगामी असर यह हो सकता है कि उनका कोर वोटर खासकर अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का सियासी ध्रुवीकरण नए सिरे से हो सकता है।

नीतीश के CM पद छोड़ने से बिहार की सियासत पर क्या असर; तेजस्वी के लिए भी कैसे सुनहरा अवसर?

Nitish Kumar Resignation: बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइडेट (JDU) के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने आज (सोमवार, 30 मार्च को) बिहार विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। बिहार सरकार के मंत्री विजय कुमार चौधरी और JDU के विधान परिषद सदस्य (MLC) संजय कुमार ने नीतीश कुमार का इस्तीफा विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह को सौंपा। सभापति ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। इस माह की शुरुआत में नीतीश कुमार संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। इसके बाद से ही उनके इस्तीफे की अटकलें लग रही थीं। हालांकि, उन्होंने अभी तक राज्य के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा नहीं सौंपा है लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही वह इस पद को भी छोड़ देंगे और दिल्ली के राजनीतिक केंद्र में बैठेंगे।

चर्चा इस बात की भी है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर अपने इकलौते बेटे निशांत को राज्य की सत्ता में बैठाकर जाएंगे। नीतीश के बाद राज्य की कमान किनके हाथ होगी, इस पर अभी मंथन और अटकलों का बाजार गर्म है। बहरहाल, नीतीश के इस कदम से राज्य की राजनीति एक लंबे अंतराल के बाद करवट लेती हुई नजर आ रही है। 2005 से लगातार (कुछ अंतराल को छोड़कर) नीतीश कुमार निर्बाध रूप से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। सियासत से लेकर सत्ता का केंद्र उनके ही ईर्द-गिर्द घूमता रहा है लेकिन दो दशक से ज्यादा समय बाद वह पहली बार इन सबसे दूर होंगे। ऐसे में आने वाले समय में राज्य की राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है और राज्य में कई किस्म के राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

भाजपा का सत्ता पर सीधा कंट्रोल, भाजपाई चेहरा CM:

बिहार भाजपा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले कैलाशपति मिश्र ने कभी अपने दम पर बिहार में भगवा सरकार का सपना देखा था। बाद में सुशील कुमार मोदी ने भी इसी तरह के सपने बुने थे कि भाजपा अपने दम पर सरकार बनाए। बहरहाल, यह तो अभी तक संभव होता नहीं दिख रहा है लेकिन बिहार के बदलते राजनीतिक आयाम ने करीब-करीब यह संभव कर दिया है कि राज्य में भाजपा का कोई चेहरा मुख्यमंत्री बन सकता है।

2005 से, यानी जब से नीतीश कुमार की भाजपा के साथ गठबंधन सरकार रही है, तब से भाजपा छोटे भाई की भूमिका में ही रही है। चाहे विधानसभा में उसकी सीटें जेडीयू से भले ही ज्यादा रही हो लेकिन अब यह इतिहास की बात बनती दिख रही है। अब नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने से भाजपा फ्रंट सीट पर बैठती दिख रही है। इससे आगे कहें तो ऐसा होता दिख रहा है कि अब भाजपा का ही कोई चेहरा राज्य की बागडोर संभालेगा। पिछले साल विधानसभा चुनावों में 89 सीट जीतने वाली भाजपा अब सत्ता पर धीरे-धीरे अपना प्रभुत्व और पकड़ मजबूत कर रही है।

ओबीसी-ईबीसी का नए तरह से ध्रुवीकरण:

नीतीश कुमार के बिहार के सत्ता से हटने का एक बड़ा और दूरगामी असर यह हो सकता है कि उनका कोर वोटर खासकर अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का सियासी ध्रुवीकरण नए सिरे से हो सकता है। चूंकि राज्य की जनसंख्या में ईबीसी की हिस्सेदारी करीब 36 फीसदी है, जो एकमुश्त बड़ा वर्ग है और नीतीश का कोर वोटर रहा है। उसके अंदर विभाजन हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में अन्य राज्यों में ईबीसी जातियां भाजपा के प्रभाव में लामबंद हुई हैं लेकिन बिहार में अब तक यह समुदाय नीतीश कुमार का कोर वोटर रहा है। इनके अलावा माइनस यादव ओबीसी जातियां, महिलाएं और महादलित वर्ग भी नीतीश का समर्थक रहा है। ऐसी संभावना है कि यह वर्ग नीतीश की गैरमौजूदगी में बंट सकता है और एक बड़ा हिस्सा फिर से राजद के पाले में जा सकता है, जबकि कुछ भाजपा की तरफ भी जा सकता है।

कमजोर हो सकती है जेडीयू:

यानी एक तरह से देखें तो नीतीश के बिहार छोड़ने से उनकी पार्टी जेडीयू कमजोर होती दिख रही है। भले ही नीतीश अपने बेटे की ताजपोशी करा रहे हों लेकिन उनके अलावा कोई और बड़ा चेहरा उनकी पार्टी में फ्रंटलाइन में नहीं दिखता है। ललन सिंह हों या विजय चौधरी, संजय झा या अशोक चौधरी हों, सभी दूसरी पंक्ति के नेता हैं। एक बात यह भी सच है कि बिहार की सियासत में दूसरी पंक्ति के नेता ज्यादा सफल नहीं हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में नीतीश की सक्रियता की कमी जेडीयू को अवसान की तरफ धकेल सकती है।

राजनीतिक त्रिकोण से बाहर निकलती राजनीति:

कुल मिलाकर देखें तो राज्य की राजनीति में जो सबसे बड़ा बदलाव होता दिख रहा है, उनमें द्विध्रुवीय राजनीति है। यानी एक तरफ भाजपा तो दूसरी तरफ राजद होगी। अब आगे के चुनावों में इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच मुख्य मुकाबला देखने को मिल सकता है, जबकि इससे पहले तक राज्य की राजनीति त्रिकोणात्मक थी और उसमें नीतीश की अगुवाई वाली जेडीयू प्रमुख खिलाड़ी थी। उसके बिना सत्ता की कल्पना बेमानी थी। संभव है कि यह संकल्पना और कल्पना अब इतिहास की बात हो जाए।

राजद और तेजस्वी के लिए सुनहरा अवसर:

इन सियासी बदलावों और संकेतों के बीच भाजपा और जेडीयू के घोर विरोधी और राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी राजद और खासकर उसके सीएम फेस उम्मीदवार तेजस्वी यादव के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुल सकता है। अब तक बिहार फिर से नीतीशे कुमार के द्वंद्व में फंसा था लेकिन अब राज्य उससे बाहर निकलता जा रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि यह तेजस्वी यादव के लिए भी एक सुनहरा अवसर है कि वह यादव और मुसलमानों के अलावा ईबीसी, अन्य ओबीसी जातियों, कोइरी-कुशवाहा और दलित जातियों को कैसे अपने पिता की तरह अपने पाले में ला सकते हैं। साफ है कि वह अपने पक्ष में जितनी ज्यादा जातीय गोलबंदी करेंगे उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना उतनी ही प्रगाढ़ होगी।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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