कैसे 1800% बढ़त के साथ मैन ऑफ द मैच बने चिराग पासवान, 2030 में तेजस्वी से सीधी टक्कर?
एलजेपी (आरवी) की यह सफलता न केवल वर्तमान चुनाव में एनडीए की जीत की कुंजी बनी है, बल्कि 2030 के विधानसभा चुनावों के लिए बिहार की राजनीति में एक नई प्रतिद्वंद्विता का संकेत भी देती है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति में गठबंधन की ताकत और व्यक्तिगत करिश्मे का संयोजन ही जीत का असली राजा होता है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में 202 सीटों के साथ भारी बहुमत हासिल कर लिया है, जिसमें भाजपा को 89 सीटें, जनता दल (यूनाइटेड) को 85 और अन्य सहयोगी दलों को शेष सीटें मिलीं। लेकिन इस भव्य जीत के बीच एक नाम जो सबसे ज्यादा चमका, वह हैं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान। उनकी लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा और 19 पर जीत हासिल की। भाजपा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल (यू) ने अपने दम पर मजबूत प्रदर्शन किया है, लेकिन असली ‘किंगमेकर’ और ‘गेमचेंजर’ के रूप में केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास)।
एलजेपी (राम विलास) का शानदार उभार
गठबंधन की रणनीति के तहत 29 विधानसभा क्षेत्रों में एलजेपी (आरवी) को टिकट दिया गया था, जिसने शुरू से ही राजनैतिक हलकों में उत्सुकता और चिंता दोनों पैदा की थी। विपक्ष ही नहीं, एनडीए के भीतर भी सवाल उठ रहे थे कि चिराग पासवान को इतने बड़े पैमाने पर मौका देना क्या जोखिमभरा कदम साबित होगा?
लेकिन मतगणना के बाद आए नतीजों ने इस सवाल का जवाब दे दिया है- एलजेपी (आरवी) ने 19 सीटों पर जीत दर्ज कर ली है। इस लिहाज से पार्टी का स्ट्राइक रेट 68% से अधिक रहा और 2020 की तुलना में सीटों में 1800% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह प्रदर्शन न केवल चिराग पासवान की रणनीति को सही साबित करता है, बल्कि उन्हें एनडीए में एक मजबूत शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित भी करता है।
एलजेपी (आरवी) को जिन 29 सीटों पर टिकट मिला था, उनमें शामिल हैं- गोविंदगंज, सिमरी बख्तियारपुर, दरौली, गड़खा, साहेबपुर कमाल, बखरी, परबत्ता, नाथनगर, पालीगंज, ब्रह्मपुर, डिहरी, बलरामपुर, मखदुमपुर, ओबरा, सुगौली, बेलसंड, मरहौड़ा, शेरघाटी, बोधगया, रजौली, गोविंदपुर, बोछा, बख्तियारपुर, फतुहा, बहादुरगंज, महुआ, चेनारी, मनेर और कसबा। हालांकि, मरहौड़ा सीट पर उम्मीदवार सीमा सिंह का नामांकन निरस्त हो गया, जिसके बाद पार्टी ने नया उम्मीदवार उतारने के बजाय गठबंधन में सहमति से निर्दलीय प्रत्याशी अंकित कुमार को समर्थन देने का फैसला किया।
एक विभाजन से उभरी नई ताकत
2021 में लोक जनशक्ति पार्टी के टूटने के बाद चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति कुमार पारस के बीच खींचतान खुलकर सामने आई। पार्टी दो हिस्सों में बंट गई- चिराग के नेतृत्व वाली पार्टी का नाम रखा गया लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास), जबकि पारस गुट बना राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी। चिराग पासवान ने अपने पिता राम विलास पासवान की राजनीतिक विरासत को जिस तरह संभाला, उसने धीरे-धीरे उन्हें बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया है।
एलजेपी का इतिहास और गिरावट के बाद वापसी
मूल लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना वर्ष 2000 में राम विलास पासवान ने की थी। 2005 के फरवरी चुनाव में पार्टी ने 178 सीटों पर लड़कर 29 सीटों की शानदार जीत दर्ज की थी। लेकिन यही सफलता दोबारा दोहराई नहीं जा सकी और अक्टूबर 2005 में वह केवल 10 सीटों पर सिमट गई। 2010 में प्रदर्शन और नीचे गया और तीन सीटें मिलीं, 2015 में केवल दो। 2020 में एलजेपी ने एनडीए से अलग 134 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल एक सीट जीती- हालांकि उसने जेडीयू को गंभीर नुकसान पहुंचाया था।
एनडीए में मजबूत हुआ चिराग पासवान का कद
इस बार एनडीए ने उन पर जो भरोसा जताया, वह न केवल सही साबित हुआ बल्कि चिराग की राजनीतिक ताकत को और बढ़ा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी नजदीकी को उन्होंने स्वयं एक बार “मैं मोदी जी का हनुमान हूं” कहकर व्यक्त किया था और चुनावी नतीजे बताते हैं कि एनडीए ने उन पर जो दांव खेला, वह पूरी तरह सफल रहा है। एनडीए के भीतर अब उनका कद और मजबूत हुआ है और माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में चिराग पासवान बिहार की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
2030 में तेजस्वी बनाम चिराग?
एलजेपी (आरवी) की यह सफलता न केवल वर्तमान चुनाव में एनडीए की जीत की कुंजी बनी है, बल्कि 2030 के विधानसभा चुनावों के लिए बिहार की राजनीति में एक नई प्रतिद्वंद्विता का संकेत भी देती है। राजद नेता तेजस्वी यादव और चिराग पासवान- दोनों ही युवा चेहरे हैं, दोनों का अपना जनाधार है, और दोनों ही बिहार की भावी राजनीति में शीर्ष पद के दावेदार माने जाते हैं।





