कुपोषण के खिलाफ जंग में वैशाली जिला का मॉडल बेहतर

Jan 06, 2026 09:47 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, हाजीपुर
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हमारा फॉलो-अप मॉड्यूल यह सुनिश्चित करना है कि डिस्चार्ज के बाद भी बच्चा सुरक्षित रहे अभिभावकों ने कहा कि बच्चा स्वस्थ है और मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं

कुपोषण के खिलाफ जंग में वैशाली जिला का मॉडल बेहतर

हाजीपुर । एक प्रतिनिधि वैशाली जिला कुपोषण के खिलाफ जंग में बना पथप्रदर्शक। सदर अस्पताल में सिर्फ चिकित्सीय परामर्श और दवा की उपलब्धता नहीं, बल्कि कुपोषण के खिलाफ जंग सफलता से आगे बढ़ रहा है। पोषण पुनर्वास केन्द्र में कुपोषित बच्चों के लिए दवा, पौष्टिक आहार के साथ खेलने तक का ध्यान रखा गया है। चिकित्सकों ने कुपोषित बच्चों को घर के चीजों से घर के चूल्हे पर ही पौष्टिक आहार कैसे तैयार होता है। अभिभावकों ने कहा कि बच्चा स्वस्थ है और मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं। लालगंज जलालपुर की रहने वाली चंचल कुमारी ने बताया कि बिहार के उन हजारों परिवारों की उम्मीद बन गई, जिनके मासूम कुपोषण से ग्रसित है।

चिकित्सकों का कहना है कि राज्य स्वास्थ्य समिति की हालिया प्रदर्शन में वैशाली जिला पोषण पुनर्वास केन्द्र को पूरे सूबे में प्रथम स्थान मिलना एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह बिहार राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में आए एक क्रांतिकारी बदलाव बताया गया है। राज्य स्वास्थ्य समिति के शिशु स्वास्थ्य के उप निदेशक विमलेश कुमार का कहना है कि वैशाली जिला ने साबित किया है कि कुपोषण जैसी सामाजिक आर्थिक समस्या से लड़ने के लिए बजट काफी नहीं, बल्कि संवेदना और माइक्रो-प्लानिंग की जरूरत है। यहां की 93 प्रतिशत के साथ उच्च रिकवरी दर राज्य के अन्य जिलों के लिए एक मानक स्थापित करती है। डाइट और डेटा की जुगलबंदी एनआरसी के भीतर का वातावरण किसी मेडिकल वार्ड से कहीं अधिक लनिंग हब जैसा दिखता है। यहां कार्यरत पोषण विशेषज्ञ केशव कुमार और अर्चना कुमारी बताती है कि अंति कुपोषित बच्चों की रिकवरी के लिए वैज्ञानिक तकनीक का पालन अनिवार्य है। यहां एफ-75 और एफ-100 जैसे चिकित्सीय आहार को बच्चे की तत्कालीन मेटाबॉलिक स्थिति के अनुसार दिया जाता है। डीपीएस विकास कुमार का कहना है कि वैशाली सफलता दर अधिक होने का कारण यहां का फॉलो अप मौड्यूल है। डिस्चार्ज के बाद भी बच्चे की सेहत का डेटा ट्रैक किया जाता है और समय समय पर उसे पुन: जांच के लिए पुनर्वास केन्द्र बुलाया जाता है, जिससे दुबारा कुपोषित होने की संभावना न्यूनतम हो गई है। गांव लौटकर माताएं बन रही पोषण दूत सिविल सर्जन डॉ. श्याम नंदन प्रसाद कहते है कि कुपोषण से लड़ना एक वैज्ञानिक चुनौती भी है और सामाजिक भी। वैशाली में डाइट प्रोटोकॉल के साथ-साथ कम्यूनिटी एम्पावरमेंट पर ध्यान केन्द्रित किया। हमारा फॉलो-अप मॉड्यूल यह सुनिश्चित करना है कि डिस्चार्ज के बाद भी बच्चा सुरक्षित रहे। वैशाली का एनआरसी मौडल साबित करता है कि संसाधनों का सही प्रबंधन और निरंतर निगरानी बड़े बदलाव ला सकती है। उन्होंने कहा कि यह केन्द्र केवल बच्चों का वजन ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि उन माताओं को प्रशिक्षित कर रहा है, जो अपने गांव लौटकर पोषण दूत की भूमिका निभा रही है। प्रशासनिक विजन के साथ जंग जारी वैशाली जिला में कुपोषण के खात्मे में मिल रही सफलता आईसीडीएस और स्वास्थ्य विभाग के समन्वय हो रही है। इस संबंध में डीसीएम निभा रानी सिन्हा का कहना है कि आशा और आंगनबाड़ी सेविका के माध्यम से एक ऐसा रेफरल रणनीति तैयार किया जिससे कुपोषित बच्चों की पहचान और भर्ती की प्रक्रिया पारदर्शी हो गई। स्वास्थ्य विभाग ने सुनिश्चित किया कि भर्ती रहने के दौरान माताओं की मजदूरी के नुकसान की भरपाई के लिए प्रोत्साहन राशि के रूप में 100 रुपये का भुगतान समय हो, ताकि गरीबी इलाज के आड़े न आए। उन्होंने कहा कि एनआरसी नीति निर्माताओं के लिए वैशाली आज एक केस स्टडी बन चुका है। राज्य स्तर पर इस मॉडल की तीन बड़ी खुबियां भी चर्चा में है। हाजीपुर - 01- सदर अस्पताल के पोषण पुनर्वास केन्द्र में भर्ती बच्चे। हाजीपुर -02 - सदर अस्पताल के पोषण पुर्नवास केन्द्र में भर्ती बच्चों के खेलने के लिए रखा खिलौना।

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