
पहले शिक्षक केंद्रित व्यवस्था थी, अब व्यवस्था छात्र केंद्रित
स्कूलों का लक्ष्य ज्ञान, कौशल और मूल्य प्रदान करना है, जो विकासशील देश में सफल होने के लिए आवश्यक है पहले अनुशासन था, गुरु शिष्य परंपरा थी। इससे शिक्षकों को सम्मान मिलता था अब व्यवसायिक शिक्षण...
हाजीपुर । संवाद सूत्र शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मानव और समाज का निर्माण करना है। हालांकि इस संबंध में नागरिकों और शैक्षणिक रूप जुड़े लोगों के अलग विचार हैं। पहले और वर्तमान की शिक्षा में काफी अंतर आया है। शिक्षकों का मानना है कि छात्रों को उत्पादक जीवन के लिए तैयार करना, आलोचनात्मक सोच, सामाजिक कौशल विकसित करना और छात्रों में सांस्कृतिक जागरूकता को प्रोत्साहित करना है। स्कूलों का लक्ष्य ज्ञान, कौशल और मूल्य प्रदान करना है, जो विकासशील देश में सफल होने के लिए आवश्यक है। हालांकि शिक्षा की अवधारणा हर व्यक्ति में अलग-अलग होती है। डायट प्राध्यापक हिंदी शिक्षक राजेन्द्र कुमार कहते हैं कि पहले आदर्शवादी व्यवस्था थी।

छात्र केंद्रित व्यवस्था नहीं थी। अनुशासन था, गुरु शिष्य परंपरा थी। जिसके कारण शिक्षकों को सम्मान मिलता था। पहले शिक्षक केंद्रित व्यवस्था थी, अब छात्र केंद्रित व्यवस्था है। नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है पहले बच्चे व्यवहारिक भी थे और अभिभावक भी। अब बिल्कुल व्यवसायिक शिक्षण व्यवस्था हो गई है। वर्तमान में सरकार तो ध्यान दे रही है, लेकिन न अभिभावक रुचि दिखाते हैं न बच्चे। शिक्षक अरविंद कुमार बताते हैं कि पहले शिक्षकों का जितना सम्मान होता था। अब नहीं रह गया है। अनुशासन में बच्चे रहते थे, शिक्षक अभिभावकों के साथ अच्छा व्यवहार रखते थे। वर्तमान में अगर कोई शिक्षक किसी बच्चे को दंड दिया तो अभिभावक शिक्षकों पर ही बरस पड़ते हैं। इसके कारण शिक्षक भी उन बच्चों से ध्यान हटा लेते हैं। विज्ञान शिक्षक राकेश श्रीवास्तव बताते हैं कि बच्चे में आत्मविश्वास पैदा करना तथा सामाजिक एवं पर्यावरणीय जिम्मेदारी की भावना प्रदान करना। शैक्षणिक उत्कृष्टता के उच्च मानक प्राप्त करना। प्रत्येक बच्चे को उसकी विशिष्टता खोजने में मदद करना तथा उसके कौशल को बढ़ाने के अवसर प्रदान करना है, लेकिन वर्तमान में सब नगण्य है। अब बच्चों और अध्यापकों का ध्यान सरकार की योजनाओं पर रहता है, जो आर्थिक मदद कर रहा हो। प्रधानाध्यापक डॉ पंकज कुमार कहते हैं कि शिक्षा का उद्देश्यपूर्ण प्रयास का शैक्षणिक माहौल को बनाना है, ताकि वे अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना सीखें। निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करना होगा शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि एक व्यक्ति अपने परिवेश से परिचित हो सके। शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक बहुत ही आवश्यक साधन है। वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार विभिन्न योजनाओं के साथ आधुनिक शिक्षा के लिए प्रयासरत है। प्राध्यापक शम्भू प्रसाद बताते हैं कि आधुनिक समाज में शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य 21वीं सदी में शिक्षा का अंतिम लक्ष्य व्यक्तियों को उनकी अधिकतम क्षमता तक पहुंचने के लिए तैयार करना और समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालना है। तेज़ी से विकसित हो रहे विश्व का सामना करने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और मूल्यों से व्यक्तियों को सुसज्जित करने में शिक्षा सर्वोपरि है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम या आरटीई अधिनियम, एक क्रांतिकारी कानून है जो 6 से 14 वर्ष की आयु के भारतीय बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करता है, लेकिन आज भी इससे लोग वंचित हैं। इन्सेट... शिक्षा में नवाचार का प्रयोग कर बच्चों दे सकते हैं नई दिशा शिक्षक उमेश कुमार प्रसाद सिंह ने कहा कि शिक्षा में नवाचार, विशेष नामांकन अभियान अंतर्गत नामांकन बढ़ाने एवं ड्राप आउट कम करने के लिए कई गतिविधियों का आयोजन कराया गया है। इसके अंतर्गत डोर-टू-डोर अभियान नुक्कड़ नाटक, संवाद, अभिभावक शिक्षक संगोष्ठी के अंतर्गत सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी। उमेश कुमार प्रसाद सिंह गणित विषय के शिक्षक हैं। गणित क्लब के माध्यम से बच्चों को विभिन्न गतिविधियों के द्वारा गणित की बारीकियों को समझाया है। गणितीय कंटेंट पर आधारित सरल भाषा में गणित मंजरी लिखी है। इसके अलावा सामाजिक कुरीतियों को दूर करने हेतु बेटी बचाओ बेटी बचाओ, सर्वश्रेष्ठ भारत ,ऊर्जा संकट, स्वस्थ्य बिहार समृद्ध बिहार सहित 10 किताबें लिखी है। वेस्ट मैटेरियल का उपयोग करके टीएलएम का निर्माण बच्चों के माध्यम से कराया गया है। जिसके द्वारा बच्चे आसानी से गणित के तत्वों को समझ पाते हैं। नई शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत शैक्षणिक कार्य के अलावा कला, खेल एवं अन्य गतिविधियों में बच्चों के विकास के लिए उनके द्वारा निरंतर कार्य किया गया है। इसके कारण बच्चें इन क्षेत्रों में भी राज्य स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। इन्होंने राष्ट्र निर्माण एवं राष्ट्र एकता के लिए भारत स्काउट एवं गाइड, वैशाली से जुड़कर एकल यूज प्लास्टिक के बहिष्कार हेतु कार्य किया है। कोरोना काल में बच्चे घर में रहा करते थे। वैसी स्थिति में इन्होंने ऑनलाइन क्विज प्रतियोगिता, प्रशिक्षण कार्यक्रम ,सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से न केवल बच्चों का मनोरंजन कराया बल्कि बच्चों को पढ़ाई के प्रति रुचि जगाई है। इसके लिए इन्हें कोरोना योद्धा सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। शिक्षा के क्षेत्र किया विशिष्ट कार्य बिदुपुर प्रखंड के खजवत्ता सुल्तानपुर के स्व. रामदेव राय के पौत्र, विन्देश्वरी राथ (सेवानिवृत प्रथानाध्यापक) के पुत्र त्रिवेणी कुमार की प्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई और वे ग्रामिण परिवेश में पले बढ़े। उन्होंने एमए तक शिक्षा प्राप्त की। बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित शिक्षक परीक्षा उत्तीर्ण कर वर्ष 1994 में राजकीय मध्य विद्यालय डुमरी, महुआ से सहायक शिक्षक के रूप में अपना सफर शुरू किया। वर्तमान में हाजीपुर प्रखंड अंतर्गत उत्क्रमित मध्य विद्यालय सपहां में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्य कर रहे हैं। 31 वर्षों की तपस्या और लगन का परिणाम है कि उन्हें बिहार सरकार ने राजकीय सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इन्होंने अपने पुत्र के साथ विद्यालय के बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित ही नहीं किया बल्कि जब भी उन जरूरत हुई आगे बढ़कर मदद की। व्यवहार कुशल त्रिवेणी कुमार के पुत्र आज आईएएस की परीक्षा पास कर ट्रेनिंग में हैं। पूरा परिवार शिक्षा के लिए समर्पित है।

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