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महनार, बेलसर में सूखी नदियों से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर संकट

महनार, बेलसर में सूखी नदियों से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर संकट

संक्षेप:

जलीय जीव-मछलियां विलुप्ति की कगार पर, हरियाली भी घटी नदियों में पानी नहीं होने से बढ़ते तापमान से लोगों की सेहत पर असर जलीय जीव-जंतुओं और मछलियों की कई प्रजातियां अब लगभग विलुप्त

Jan 06, 2026 09:47 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, हाजीपुर
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महनार। बेलसर । हि.टी. महनार क्षेत्र में नदियों पर गहराते संकट का प्रभाव अब केवल खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा असर दिखाई देने लगा है। नदियों में पानी नहीं रहने के कारण नदी किनारे बसे लोग खुलेआम उसमें कचरा फेंक रहे हैं और गंदा पानी बहाया जा रहा है, जिससे प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। स्थानीय पर्यावरण जानकारों के अनुसार, नदी के सूखने से जलीय जीव-जंतुओं और मछलियों की कई प्रजातियां अब लगभग विलुप्त हो चुकी हैं। पहले जिन नदियों में विविध प्रकार की मछलियां पाई जाती थीं, अब वहां जीवन के संकेत बेहद सीमित रह गए हैं।

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इससे पूरे क्षेत्र की जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंचा है। नदियों के अविरल बहाव के रुकने से आसपास के इलाकों की हरियाली में भारी कमी आई है। मिट्टी में नमी घटने और तापमान में वृद्धि से पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है। स्थानीय लोग बढ़ती गर्मी, त्वचा रोग, सांस और जलजनित बीमारियों की शिकायत कर रहे हैं, जिसे विशेषज्ञ नदी संकट से जोड़कर देख रहे हैं। खेती पर भी इसका असर स्पष्ट है। क्षेत्र में जहां पहले धान की खेती प्रमुख थी, वहां अब गेहूं का रकबा बढ़ गया है। सिंचाई के लिए किसान महंगे निजी नलकूपों पर निर्भर हो गए हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में पर्यावरण और स्वास्थ्य संकट और गहराएगा। पटेढ़ी बेलसर संवादसूत्र के अनुसार झाझा नदी के किनारे आज से 10 वर्ष पहले तक नदी के किनारे रहने वाले लोग इसमें मछली मारकर अपनी जीविका चलाते थे। नदी सूखी तो उन्होंने अपनी आजीविका का साधन भी बदल लिया। प्रखंड के दर्जनों गांवों से होकर गुजरने वाली झाझा नदी आज पूरी तरह सूख चुकी है। चार वर्षों से यह नदी जलविहीन है। कभी किसानों की सिंचाई का मुख्य साधन हुआ करती थी। लगभग 13 किमी लंबी यह नदी आज जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा के कारण सूख चुकी है। झाझा नदी मौना गांव के पास जाकर वाया नदी में मिल जाती है। इसलिए इसे वाया नदी की सहायक नदी भी कहते हैं। पटेढ़ी गांव निवासी विनय सिंह ने बताया कि इस नदी के सूखने से अब नदी की पेटी में लोग खेती करना शुरू कर दिए हैं। हाजीपुर - 11- महनार से होकर गुजरने वाली घाघरा और नून नदी में कहीं-कहीं छिटपुट पानी दिखता है। हाजीपुर - 12 - पटेढ़ी बेलसर में सूखी झाझा नदी की पेटी में हो रही सरसो की खेती।