बज्जिकांचल की विशेषता रही है होली के समय स्वांग रचाना
नेपाल की तराई से लेकर वैशाली जिले के सीमांचल तक का क्षेत्र कहलाता है बज्जिकांचल घर-घर पहुंच कर रंग रसियाओं की टोली का होली मिलन संस्कृति की पहचान कराता है आधुनिकता ने पर्व त्योहारों को प्रभावित तो...

हाजीपुर । संवाद सूत्र बिहार में वैशाली जिला बज्जिकांचल का एक ऐसा क्षेत्र है, जहां की परंपराएं भारतीय संस्कृति को पल्लविल पुष्वित करती रही हैं। रंगों की होली को लेकर कई भारतीय परंपराएं हमें आज भी उत्साह और उमंग से भर देती हैं। नेपाल की तराई से लेकर वैशाली जिले के सीमांचल तक बज्जिकांचल का क्षेत्र वैदिक काल से पल्लवित पुष्पित होता रहा है। कई परंपराएं आज भी जिंदा हैं। वहीं कई परंपराएं धूमिल होने के कगार पर हैं। होली में पूरे बज्जिकांचल में फगुआ गीतों की गूंज से उत्साह और उमंग बना रहता था। वहीं प्रेम सौहार्द पूर्ण मिलन इस क्षेत्र को अन्य से अलग बनाता रहा है।
सांस्कृतिक संरक्षक, शिक्षक, वरिष्ठ साहित्यकार एवं बज्जिकांचल विकास समिति के अखौरी चंद्रशेखर ने बताया कि होली के एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। जिसे बज्जिकांचल में सम्बत जलाना कहा जाता है। फिर लोग खूब होली का गीत गाते हैं। सबेरे दोपहर तक गरदा माटी एक दूसरे को आपस में सराबोर हो जाते हैं। इसे बज्जिकांचल में लोग धुरखेल कहते हैं। उसके बाद नहा धोकर नया वस्त्र पहनकर घर-घर जाकर रंग-अबीर खेलते हैं और बड़े लोगों से आशीर्वाद प्राप्त करते है। फिर लोगों के दरवाजे पर जा-जा कर सामूहिक होली गायन किया जाता था। अंत में गांव के अंतिम घर पर चैता गायन और सदा आनंद रहे यही द्वारे मोहन खेले होली हो.... के बाद ही होली संपन्न होती है। परंपरानुरूप गांव और मोहल्ले में लोग माटी का हौज बनाते थे जिसमें माटी का घोल तैयार किया जाता था और लोग बुरा न मानो होली का जयघोष करते हुए जो भी व्यक्ति दिखता उसे मिट्टी वाले घोल में डूबा देते थे। लोग भी बुरा नहीं मानते थे। महिलाओं बच्चों युवाओं की टोली निकलती थी और प्रेम और शौहार्द से रंग खेलते थे। पुन: शुरू की गई मशान की होली बीते समय के साथ ये परंपरा समाप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है। उसकी जगह अश्लील हरकतों ने ले ली। जिसके कारण अब लोग होली के रंग और गुलाल से बचने लगे। लेकिन पुनः ऐसी परंपरा को जिले के सांस्कृतिक कर्मी बनाने की कोशिश में है। होली की शुरुआत हरिहरक्षेत्र होने के कारण बाबा हरिहर नाथ मंदिर से शुरू होती है। वैदिक परंपरा में हाजीपुर में पांच नदियों का संगम स्थल ऐतिहासिक कोनहारा मोक्ष धाम पर मसान की होली खेली जाती थी,जो समय के साथ समाप्त हो गई थी। जिसे पुनः शुरू की गई है। वर्तमान में इस आयोजन में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। मानवीय संवेदनशीलता को आधुनिकता ने किया समाप्त मनो वैज्ञानिक डॉ रमन कुमार बताते हैं कि आधुनिकता ने मानवीय संवेदनशीलता को समाप्त कर दिया है। बज्जिकांचल की होली प्रेम और शौहार्द की होली होती है। होली के समय स्वांग रचाना इस क्षेत्र की विशेषता थी। लोगों का रंग गुलाल के साथ परस्पर एक दूसरे से मिलना और घर आए लोगों का स्वागत करना हमारे परंपरा में शामिल था। लेकिन बीते समय ने इसका स्वरूप बिगाड़ दिया है। लेकिन अब पुनः इसकी वापसी हो रही है जो अत्यंत खुशी की बात है। घर-घर पहुंच कर रंग रसियाओं की टोली का होली मिलन संस्कृति की पहचान कराता है। शहर के वरिष्ठ नागरिक 80 वर्षीय अशोक कुमार बताते है कि आधुनिकता ने पर्व त्योहारों को प्रभावित तो किया ही है परंपराओं पर भी असर डाला है। हालांकि वर्तमान समय युवाओं का है जिनका कर्तव्य है कि समाज की परंपराओं का संरक्षण करे तभी जम भारतीय संस्कृति को बचा सकते हैं और हमारी पहचान कायम रह सकती है। फोटो : होली गायन की थोड़ी देर में..।
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