दिन-दोपहर पेड़ की छांव और रात में झोपड़ी के बाहर कटती है जिंदगी

Newswrap हिन्दुस्तान, हाजीपुर
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गर्मी के बीच बच्चों के साथ दिन में खाना खाकर पेड़ की छाया में चले जाते हैं दोपहर में झोपड़ियों के अंदर इतनी गर्मी हो जाती है कि बैठना हो जाता है मुश्किल

दिन-दोपहर पेड़ की छांव और रात में झोपड़ी के बाहर कटती है जिंदगी

सहदेई बुजुर्ग। सं.सू. सहदेई और देसरी क्षेत्र के आसपास की गरीब बस्तियों में निवास करने वाले लोगों की जिंदगी को प्रचंड गर्मी ने मुश्किल बना दिया है। चिलचिलाती धूप और लू के थपेड़ों के बीच करकट की झोपड़ियों में रहना सजा से कम नहीं। सहदेई बुजुर्ग प्रखंड क्षेत्र के चैनपुर बघेल के मांझी टोला में लगी झोपड़ियां न सिर्फ दोपहर बल्कि रात में भी खाली ही रह जा रही हैं। ऐसा क्यों के सवाल पर संजय मुसहर ने बताया कि उनकी झोपड़ी टाट और प्लास्टिक से तैयार है। कुछ लोग रहर की बाती (डंठल) से और कुछ बोरी से घेर दिए हैं, लेकिन, तपिश ऐसी है कि टाट-प्लास्टिक की झोपड़ी तपने लग रही है।

इसलिए वह और उनके बच्चे दिन में खाना खाकर पेड़ की छाया में चले जाते हैं। गर्म हवा तो वहां भी सताती है, पर तपती झोपड़ी से तो ठीक ही रहता है। रात में दरवाजे पर खाट डाल सो जाते हैं। बहू-बेटी झोपड़ी या उसके पीछे खटिया लगा लेती हैं। शनिवार को जब बस्ती में पहुंचा तो दोपहर की वजह से गलियां सूनी नजर आईं। अधिकांश लोग अपनी झोपड़ी में दुबके थे और कुछ लोग शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए पेड़ के नीचे बैठे दिखे। बस्ती के अनिल मांझी, जयचंद मांझी, सुधीर मांझी, रघुनाथ मांझी, विंदेश्वर मांझी, अजय मांझी ने बताया कि सुबह 8 बजे के बाद ही धूप तीखी हो जा रही है और 9 बजे से लू चलने लगती है। झोपड़ियों के अंदर इतनी गर्मी हो जाती है कि बैठना मुश्किल हो जाता है। बाहर निकलने पर लू से हालत खराब हो जाती है। छोटे बच्चों की तबीयत बिगड़ने का डर बना रहता है। बस्ती में पानी डालकर बनाते हैं ठंडक बस्ती के छोटू मांझी, अरुण मांझी, शर्मिला देवी, सुधा देवी और मुन्ना मांझी ने बताया कि वह नहर के तटबंध पर झोपड़ी बनाकर जीवन गुजार रहे हैं। दिन में झोपड़ी के अंदर रहना मुश्किल होता है। इसलिए जमीन पर पानी डालकर ठंडा करने की कोशिश की जाती है। रात में भी गर्मी और मच्छर परेशान करते हैं। अभी बहुत कम लोग भवन निर्माण का काम करा रहे हैं। पोलदारी का भी काम बड़ी मुश्किल से मिल पाता है। दिन चढ़ने पर काम करने की इच्छा नहीं करती, लेकिन, मजबूरी है बच्चों-परिवार का पेट पालना है। खाने के लिए अनाज मिल जाता है, यही काफी है। जब कमाई होती है तब थाली में हरी सब्जी दिखती है।

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