
सहायक नदियों के सूखने से टूट रही स्थानीय अर्थव्यवस्था की नींव
कभी जिन नदियों से आसपास के कई समुदायों की आजीविका चलती थी, वह आज सूख गई हैं मछली पकड़ने के जाल बनाने और मरम्मत करने वाले कारीगरों को भी अब काम नहीं मिल रहा नदी में पानी नहीं रहने से मछली पकड़ना लगभग...
महनार/बेलसर। सं.सू. महनार क्षेत्र में घाघरा, पटेढ़ी बेलसर इलाके की झाझा नदियों के सूखने का असर अब केवल पर्यावरण या खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी टूटने लगी है। कभी जिन नदियों से आसपास के कई समुदायों की आजीविका चलती थी, आज उनके सूखने से सैकड़ों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। स्थानीय मछुआरे रामेश्वर साह, विजय निषाद, सुनील निषाद और बबलू निषाद बताते हैं कि नदी में पानी नहीं रहने से मछली पकड़ना लगभग बंद हो गया है। पहले रोजाना होने वाली आमदनी पूरी तरह खत्म हो चुकी है। मछली पकड़ने के जाल बनाने और मरम्मत करने वाले कारीगरों को भी अब काम नहीं मिल रहा है।
धोबी समुदाय के लखन धोबी, शंकर धोबी और किशोर धोबी कहते हैं कि पहले नदी में कपड़े धोना आसान था, लेकिन अब उन्हें मोटर चलाकर पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है। इससे खर्च बढ़ गया है और आमदनी घट रही है। कई परिवार अब वैकल्पिक रोजगार की तलाश में जुट गए हैं। नदी में नौका संचालन बंद होने से नाविकों का रोजगार भी प्रभावित हुआ है। नाविक रामदेव सहनी, मोहन सहनी और भोला सहनी बताते हैं कि पहले नदी के रास्ते लोगों और सामान की आवाजाही होती थी, लेकिन अब यह पूरी तरह ठप हो चुकी है। मजबूरी में उन्हें मजदूरी या अन्य छोटे काम करने पड़ रहे हैं। प्रभावित लोगों का कहना है कि यदि समय रहते नदियों का संरक्षण, उड़ाही और पुनर्जीवन नहीं किया गया, तो आने वाले समय में स्थानीय अर्थव्यवस्था और अधिक कमजोर हो जाएगी। पटेढ़ी बेलसर इलाके में झाझा नदी के सूख जाने से आसपास के गांव के किसान के आर्थिक सेहत पर भी असर दिखा है। आज से 10 वर्ष पहले यहां नदी के आसपास के किसान अपनी सिंचाई के लिए इसी झाझा नदी के पानी पर निर्भर रहते थे। पटेढा जयराम निवासी नरेश सिंह, पटेढ़ी खुर्द गांव निवासी बैधनाथ कुंवर, दिलीप कुंवर, नवल सिंह, बीबीपुर के राजेश सिंह आदि ने बताया कि झाझा नदी का पानी सूख जाने से अब पटवन के लिए काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। समूह बनाकर मछली पकड़ते थे वहीं झाझा नदी के किनारे बसे लोगों द्वारा मछली पकड़ने का भी काम किया जाता था। नदी में रोहू, कतला, टेंगरी, डेरवा-पोठिया जैसी मछलियां बरसात के दिनों में दूसरे जगह से बहकर नदी में आ जाती थी तथा जब पानी कम हो जाता था तो गांव के लोग समूह बनाकर मछली पकड़ते थे। काफी मात्रा में मछली पकड़ने के बाद उसे बेच कर गांव के सामूहिक कार्य में पैसा लगाते थे। ग्रामीण एवं पूर्व उप प्रमुख मुकेश सिंह ,शत्रुघ्न सिंह,उपेंद्र सिंह,भूषण सिंह,आदि ने बताया कि वह एक जमाना था जब ग्रामीणों के द्वारा झाझा नदी में मछली पकड़ने का काम दिसंबर से मार्च तक चलता था। और आसपास के लोग मछली बेचकर अपनी जीविका चलाया करते थे, लेकिन अब वो दिन लद गये। अब सरकार ऐसे छोटी नदियों के उत्थान के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठा रही है। झाझा नदी में पहले बरसात के समय लबालब पानी रहता था। वो पानी दूसरे बरसात आने तक बना रहता था। लेकिन विगत चार वर्षों से यह नदी अब विलुप्त होने के कगार पर है। महनार - 05- महनार में सूख चुकी घाघरा नदी की जमीन पर उग आए हैं खर-पतवार।

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