
300 फीट तक नीचे चला गया भूजल, बिहार में नदियों के सूखने से हाहाकार; संकट में खेती-पशुपालन
कई इलाकों में भूजल इतना नीचे चला गया है कि बड़ी संख्या में जलस्रोतों का अस्तित्व ही खत्म हो गया है। नदियों के लगातार सिकुड़ने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है। जहां कभी 10-20 फीट पर पानी उपलब्ध हो जाता था, वहां अब 80 से 300 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है।
बिहार में नदियों के संकटग्रस्त होने का सबसे बुरा प्रभाव भूजल स्तर पर पड़ रहा है। पिछले 50 वर्षों में राज्य का भूजल स्तर औसतन तीन गुना तक नीचे गया है। विशेषज्ञों के अनुसार राज्य के कई हिस्सों में भूजल 300 फीट तक नीचे चला गया है। कई इलाकों में भूजल इतना नीचे चला गया है कि बड़ी संख्या में जलस्रोतों का अस्तित्व ही खत्म हो गया है। नदियों के लगातार सिकुड़ने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है। जहां कभी 10-20 फीट पर पानी उपलब्ध हो जाता था, वहां अब 80 से 300 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है।
इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव खेती, पशुपालन, पेयजल व्यवस्था और नदी आधारित पारंपरिक रोजगार पर पड़ा है। नालंदा के बिहारशरीफ और नूरसराय में पहले 30 से 70 फीट पर पानी उपलब्ध था। अब 300 फीट गहरी सबमर्सिबल लगाना पड़ रहा है। नवादा के 80 वर्षीय बुजुर्ग कैलाश प्रसाद सिंह बताते हैं कि 50 साल पहले नवादा में मात्र 15 से 20 फीट पर मीठा पानी मिल जाता था। अब जिले का औसत भूजल स्तर 80 से 100 फीट पर है।
बक्सर में काव नदी के सूख जाने का असर भूजल पर पड़ा है। 50 साल पहले 70 फीट पर पानी मिलता था। अब 150 फीट से अधिक बोरिंग करनी पड़ रही है। गर्मी में काव नदी किनारे छठिया पोखरा की पानी टंकी भरने में तीन–चार घंटे अतिरिक्त समय लग रहा है।
भोजपुर जिले में पिछले दो दशकों में भूगर्भ जलस्तर लगभग छह फीट नीचे चला गया है। सहार के 90 वर्षीय देव कुमार सिंह बताते हैं कि फरवरी के बाद चापाकल जवाब देने लगते हैं। कैमूर जिले में 1970-80 के दशक में 30-35 फीट पर पानी मिल जाता था। अब 150 फीट पर पानी मिलता है। सीवान जिले में भूजल स्तर 15-20 फीट से गिरकर 80 फीट तक चला गया है।
मधुबनी : हैंडपंप, कुएं और नलकूप सूख रहे
दरभंगा में पिछले 50 वर्षों में जलस्तर छह फीट तक गिर चुका है। सीतामढ़ी की जीवनदायिनी लखनदेई अतिक्रमण के कारण नाले का रूप ले चुकी है, जिससे कृषि और पेयजल दोनों प्रभावित हुए हैं। मधुबनी में भी भूजल स्तर 15 फीट से अधिक नीचे चला गया है। जिले के बाबूबरही, खुटौना, लौकही आदि प्रखंड सर्वाधिक प्रभावित हैं। इसके कारण हैंडपंप, कुएं और नलकूप सूख रहे हैं, जिससे पेयजल आपूर्ति और कृषि कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
किशनगंज में क्या है स्थिति
किशनगंज के सेवानिवृत शिक्षक श्यामनन्द ने कहा कि जिले में नदियों का जलस्तर तेजी से गिरा है। जहां 30 वर्ष पहले 20-25 फीट पर पानी मिल जाता था, आज कम से कम 50 फीट तक बोरिंग करनी पड़ती है। भूजल स्तर का नीचे जाना हर साल बढ़ जाता है।
बुजुर्ग किसान रामजीवन सिंह ने कहा कि पहले बारिश के कुछ ही दिनों में पानी भर जाता था। अब पूरी बरसात के बाद भी जलस्तर ऊपर नहीं आता। नदियों के सूखने से भूजल पुनर्भरण कम हुआ है। जिससे पेयजल और सिंचाई संकट बढ़ा है।
भागलपुर : कई इलाकों में जलस्तर 130 फीट नीचे
भागलपुर के शहरी इलाकों में भूजल स्तर 130 फीट तक नीचे चला जाता है। सुल्तानगंज, नाथनगर, सबौर, कहलगांव, पीरपैंती, नारायणपुर, बिहपुर, खरीक, इस्माईलपुर, रंगरा आदि प्रखंडों की कई पंचायतों में भूजल स्तर 50 फीट से नीचे है। सहरसा जिले में पानी 70 फीट से अधिक गहराई पर चला गया है। सुपौल के पिपरा प्रखंड के लालपट्टी निवासी 104 वर्षीय लेखनारायण मंडल और रतोली की 102 वर्षीय चन्द्रकला देवी बताती हैं कि 1960-70 के दशक में जिले में 10 से 12 फीट की गहराई पर ही पानी निकल आता था।
चंपारण में पहले छह फीट पर मिल जाता था पानी
पूर्वी व पश्चिमी चंपारण के कई प्रखंडों में जलस्तर 20 से 22 फीट तक नीचे चला गया है। इससे बड़ी संख्या में हैंडपंप बेकार हो गए हैं। पश्चिम चंपारण में चंद्रावत, कोहड़ा और बांसी जैसी नदियां सिकुड़ चुकी हैं। बेतिया में भूजल स्तर 15-20 फीट तक गिर गया है। गोपालगंज में 50 वर्ष पहले नदियों में सालों भर बहाव रहता था और 6 फीट पर पानी मिल जाता था।
दरभंग के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी, गजानन मिश्र ने कहा कि नदियों को बांधों में समेटने और जल भगाओ नीति के कारण जमीन रिचार्ज नहीं हो रहा है। छोटी नदियों को समेटकर उसका पानी बड़ी नदियों में मिलाया जा रहा है। पहले नदियों का पानी छितराया रहता था तो उनसे किसानों को सिंचाई में सुविधा होती थी और जलस्तर बना रहता था।





