
200 रुपए पर जीविका दीदियों से लिया जा रहा 8 घंटे काम
-मॉडल अस्पताल में साफ-सफाई की जिम्मेदारी संभाल रहे 40 से अधिक जीविका कर्मीगोपालगंज, नगर संवाददाता अस्पताल नए भवन में शिफ्ट हो चुका है। मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही साफ-सफाई का दबाव...
गोपालगंज, नगर संवाददाता अस्पताल नए भवन में शिफ्ट हो चुका है। मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही साफ-सफाई का दबाव भी बढ़ा है। इन सबके बीच सबसे अधिक मार पड़ रही है उन 40 से ज्यादा जीविका कर्मियों पर जिन्हें प्रतिदिन मात्र 200 रुपए देकर आठ-आठ घंटे काम कराया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि उन्हें एक भी साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता। यदि किसी दिन छुट्टी लेनी पड़ जाए तो उस दिन की मजदूरी सीधे काट ली जाती है। इससे उनका आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है। अक्टूबर तक अस्पताल में 32 सफाईकर्मी काम कर रहे थे, जिनमें 27 महिलाएं और 5 पुरुष शामिल थे।

लेकिन नए भवन में शिफ्टिंग शुरू होते ही संख्या बढ़ाकर 42 कर दी गई। नवंबर में 42 और दिसंबर में अब तक 41 लोग इस कार्य में जुटे हैं। अस्पताल के बढ़ते क्षेत्रफल और भीड़ को देखते हुए जीविका के सुपरवाइजर रमेश कुमार का कहना है कि कम से कम 50 कर्मियों की आवश्यकता पड़ेगी। बताते हैं कि नई महिला अभ्यर्थियों के आवेदन लगातार मिल रहे हैं, लेकिन पुरुषों की रुचि कम है। पुरुष कर्मी अधिक मानदेय की मांग करते हैं। हम उनकी मांग पूरी नहीं कर सकते, इसलिए वे काम करने नहीं आते। तीन शिफ्टो में होता है काम यहां तीन शिफ्टों में काम होता है। सुबह 6 से दोपहर 2 बजे तक, दोपहर 2 से रात 10 बजे तक और रात 10 से सुबह 6 बजे तक। यानी पूरे 24 घंटे अस्पताल की सफाई की जिम्मेदारी इन्हीं कर्मियों के कंधे पर है। प्रभु राम, चुन्नी राम, हीरा लाल, मनोज रावत, सुनील राम, कांति देवी, आशा देवी समेत कई कर्मियों ने बताया कि नियुक्ति के समय मासिक 6000 रुपए मानदेय की बात कही गई थी। लेकिन वास्तव में भुगतान प्रतिदिन 200 रुपए के हिसाब से किया जा रहा है। महीने में एक दिन की भी छुट्टी नहीं है। छुट्टी लेने पर पैसा काट दिए जाते हैं। काम के अनुसार मिले मानदेय महिला कर्मियों ने बताया कि इस आय में घर कैसे चले, यह सबसे बड़ी चुनौती है। 200 रुपए रोज में क्या-क्या चलेगा? घर का राशन, बच्चों की पढ़ाई, इलाज… कुछ भी पूरा नहीं हो पाता। आठ घंटे काम, सफाई का जोखिम, अस्पताल का माहौल सब झेलते हैं। ऊपर से छुट्टी भी नहीं मिलती। कुछ महिला कर्मियों ने कहा कि पति और पत्नी दोनों काम करें, तब भी दो लोगों की पूरी कमाई मिलाकर मुश्किल से घर का खर्च चलता है। प्रतिदिन न्यूनतम 500 रुपए मिले कर्मी बताते हैं कि काम का बोझ पहले से ज्यादा हो गया है। नए भवन में वार्ड बड़े हैं। मरीजों की संख्या बढ़ रही है। ओपीडी व इमरजेंसी दोनों जगह लगातार सफाई की जरूरत पड़ती है। लेकिन, इतनी जिम्मेदारी और जोखिम के बावजूद उनकी मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। उन्होंने सरकार और जिला प्रशासन से दैनिक मजदूरी को कम से कम 500 रुपए करने, सप्ताह में एक निश्चित अवकाश देने, बीमारी या जरूरी पारिवारिक कारणों पर पेड लीव का विकल्प देने तथा रात की ड्यूटी करने वाली महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा और सुविधा की व्यवस्था करने की मांग की।

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