खेत की जुताई में निकली ढाई फुट लंबी काले पत्थर की मूर्ति
- जिले के बरौली थाना क्षेत्र के बढ़ेया गांव के सरेह में मिला प्राचीन अवशेष, देखने उमड़ी ग्रामीणों की भीड़ - पालकालीन विष्णु प्रतिमा होने की आशंका,पुलिस प्रशासन ने पुरातत्व विभाग को सूचना देने की कही...

गोपालगंज, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। जिले के बरौली थाना क्षेत्र अंतर्गत बढ़ेया गांव के सरेह में सोमवार की सुबह खेत की जुताई के दौरान करीब ढाई फुट लंबी काले पत्थर की एक प्राचीन मूर्ति मिलने से इलाके में कौतूहल फैल गया। मूर्ति मिलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर जुट गए और देखने वालों की भीड़ लग गई। जानकारों के अनुसार प्रथम दृष्टया यह मूर्ति भगवान विष्णु की प्रतीत हो रही है। मूर्ति की बनावट, सिर पर ऊंचे मुकुट और गले में अलंकरण की शैली को देखकर ग्रामीणों के साथ-साथ जानकार लोग इसे पालकालीन (आठवीं से बारहवीं शताब्दी) कला का नमूना मान रहे हैं।
मूर्ति काले पत्थर की बनी है, जो पूर्वी भारत में पालकालीन प्रतिमाओं की प्रमुख विशेषता रही है। ग्रामीणों ने बताया कि जहां से मूर्ति मिली है, वह स्थान आज भले ही सरेह के रूप में खेत है। लेकिन, बुजुर्गों के अनुसार यह इलाका कभी बस्ती हुआ करता था। गांव में इसे आज भी ‘डीह’ के नाम से जाना जाता है। लोगों का मानना है कि संभवतः प्राचीन काल में यहां मंदिर या आबादी रही होगी, जिसके अवशेष समय के साथ जमीन के नीचे दब गए। --------------- ग्रामीणों में देखी जा रही आस्था मूर्ति मिलने के बाद ग्रामीणों में गहरी आस्था भी देखी जा रही है। कुछ लोगों ने वहीं पूजा-अर्चना शुरू कर दी। फिलहाल मूर्ति को सुरक्षित रखकर उसकी निगरानी की जा रही है। सूचना मिलने पर स्थानीय पुलिस प्रशासन ने भी मामले की जानकारी ली है। पुलिस इंसपेक्टर संतोष कुमार ने बताया कि मूर्ति की प्रामाणिकता और काल निर्धारण के लिए पुरातत्व विभाग को सूचना दी जाएगी, ताकि विशेषज्ञ जांच कर सकें। मूर्ति की खोज से क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व की संभावना बढ़ गई है। यदि यह प्रतिमा पालकालीन साबित होती है तो बढ़ेया गांव का नाम प्राचीन धरोहर स्थल के रूप में भी जाना जा सकता है। ---------------- प्रमाणिकता के वर्तमान आधार यह पत्थर की मूर्ति शैली और बनावट के आधार पर मध्यकालीन भारतीय शिल्पकला की लगती है। ऊपर से देखने पर यह संभवतः भगवान विष्णु की प्रतिमा का ऊपरी भाग (बस्ट) प्रतीत होती है। --------------- पहचान के आधार मुकुट (किरीट) ऊंचा और बेलनाकार है, जिस पर नक्काशी दिख रही है - यह शैली प्रायः 9वीं से 12वीं शताब्दी में मिलती है। चेहरे की बनावट लंबी और शांत भाव वाली है, जो पाल वंश (8वीं-12वीं शताब्दी) या प्रारंभिक सेन काल की मूर्तियों में देखी जाती है। - पत्थर काला- धूसर (संभवतः बेसाल्ट या क्लोराइट) है, जो बिहार-बंगाल क्षेत्र की पालकालीन मूर्तियों में सामान्य है। - गले में आभूषण और कंधों की अलंकरण शैली भी उसी काल से मेल खाती है।
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