40 साल पहले बेहद चर्चित रही झूमटा गया बदल गया स्वरूप, आज भी दो दिन होली
40 साल पहले बेहद चर्चित रही झूमटा गया बदल गया स्वरूप, आज भी दो दिन होली 40 साल पहले बेहद चर्चित रही झूमटा गया बदल गया स्वरूप, आज भी दो दिन होली

मगध के साथ गया जी की होली पूरे सूबे में प्रसिद्ध है। समय के साथ होली का स्वरूप बदला गया। 40-50 सालों में मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध झूमटा का स्वरूप शहर की सड़कों से निकलर गलियों में आ गया है। होली के पर्व पर नयापन और पाश्चात्य संस्कृति की हवा ऐसे छा गई है होली में बहुत कुछ बदल सा गया है। ऐसे भी गया जी की होली अन्य स्थानों की होली से थोड़ी अलग रही और यहां का झूमटा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा। जब हाथी-घोड़े और ढोल-नगाड़ों के साथ भारी भीड़ के बीच जब होली के दूसरे दिन झूमकर झूमटा निकलता तो देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते।
शहर की सड़कों पर लंबी दूरी में रहे झूमटा देखने के लिए छतों पर भारी भीड़ होती। काजू, किशमिश, छुहाड़ा,बादाम,अखरोट,पिस्ता, इलायची,सौंफ आदि से बना हुआ मलाईदार ठंडई झूमटा के रंग दोगुना गाढ़ा कर देता। लेकिन, समय के साथ 40 साल पहले वाला झूमटा यादों में रह गया। अब गली-मुहल्लों में कुछ युवकों को टोली झूमटा के नाम पर हुड़दंग करते नजर आती है। बहुत याद आती है बूढ़वा मंगल होली : साहित्यकार गया जी के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.राकेश कुमार सिन्हा 'रवि' बताते हैं कि सामान्यत: होलिका दहन और दूसरे दिन होली फिर होली की समाप्ति। लेकिन, गया जी में होली के दूसरे दिन झूमटा का मदनोत्सव साथ ही साथ बूढ़वा मंगल का मजेदार दौर लोग आज भी याद करके झूम जाते हैं। गया के गयापालों की बस्ती अंदर गया का झूमटा और वहां से रंग रसीकों की टोली चौक पर सराय आदि तक के और फिर मटका फोड़न का वह आनंद,वह जोश, वह मस्ती...सब कुछ सपना सा हो गया है। अब पर्व में भी आनंद नहीं डर की बात बन गई है। अब तो झूमटा के नाम पर बस हुड़दंग देखने को मिलता है। अब तो झूमटा में निकलने की जगह घरों में रहना लोग पसंद करते हैं। आज भी गया जी मगध में दो दिन खेली जाती है जमकर होली झूमटा को भूल जाए तो आज भी यहां होली दो दिन पूरे उमंग के साथ खेली जाती है। कवि व मगही साहित्यकार सुमंत ने बताया कि संभवत: सूबे या देश में सिर्फ गया जी मगध के पांचों जिलों में होली दो दिन खेली जाती है। मुख्य होली और दूसरे दिन बुढ़वा मंगल होली। दूसरे दिन झूमटा की जगह मटका फोड़ होली ने ले ली है। अब अधिकतर चौक-चौराहों पर दूसरे दिन दोपहर बाद मटका टांगा जाता है। मटकाफोड़ की प्रतियोगिता होती है। जो युवाओं की टोली मटका फोड़ता है उसे ईनाम से नवाजा जाता है। मटका फुटने के साथ ही होली का समापन हो जाता है।
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