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गया

आमस के चंडीस्थान में चवन्नी-अठन्नी से शुरू हुई थी दुर्गा पूजा आमस के चंडीस्थान में चवन्नी-अठन्नी से शुरू हुई थी आमस के चंडीस्थान में चवन्नी-अठन्नी से शुरू हुई थी दुर्गा पूजा

हिन्दुस्तान टीम,गयाPublished By: Newswrap
Mon, 11 Oct 2021 08:01 PM
आमस के चंडीस्थान में चवन्नी-अठन्नी से शुरू हुई थी दुर्गा पूजा आमस के चंडीस्थान में चवन्नी-अठन्नी से शुरू हुई थी आमस के चंडीस्थान में चवन्नी-अठन्नी से शुरू हुई थी दुर्गा पूजा

आमस। धर्मेन्द्र कुमार सिंह

आमस के चंडीस्थान बाजार में करीब सौ वर्षों से दुर्गा पूजा हो रही है। आश्विन मास चढ़ते ही यहां के युवा पूजा की तैयारियों में जुट जाते हैं। कोलकाता की तर्ज पर पूजा पंडाल को आधुनिक तरीके से सजाया जाता है। जिसे देखने के लिए दूर-दराज के लोग आते हैं। खूब धूमधाम से मां दुर्गे की पूजा की जाती है। वयोवृद्ध सुरेश सिंह व महेशी साव कहते हैं कि स्थानीय लोगों से चवन्नी-अठन्नी चंदा कर पूजा शुरू किये थे।

तब पूजा में सिहुली व दरिऔरा के तेजाम खां, डॉ मोईन अंसारी, एकराम खां आदि मुस्लिम युवकों की भी अहम भूमिका होती थी। सांस्कृतिक कार्यक्रम (नाच-ड्रामा) में भी वे भाग लिया करते थे। पूजा में हिन्दू-मुस्लिम एकता का मिशाल दिखता था। किन्तु आज की पूजा में इसकी कमी दिखती है। आज की पूजा-पाठ सामुदायिक होकर रह गया है। नाच-ड्रामे की प्रथा उठती जा जा रही है। ड्रामे के माध्यम से युवाओं को भारतीय संस्कार सिखाया जाता था।

झारखंड तक जाती है यहां की बनी मूर्तियां

चंडीस्थान के कुंहकारों के हाथों बनी मां दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सीता-पार्वती, सूर्य भगवान आदि देवी-देवताओं की मूर्तियां झारखंड तक जाती हैं। यहां के मूर्तिकार सौ सालों से भी अधिक समय से मूर्तियां बनाते आ रहे हैं। इनके हाथ की बनी आकर्षक मूर्तियों की मांग गया-औरंगाबाद जिले के अलावा झारखंड तक है। इनके द्वारा हर वर्ष पांच सौ अधिक मूर्तियां बनायी जाती है। यहां के मूर्तिकार अंबा, मदनपुर, कुटुंबा, इमामगंज, डुमरिया, करहारा, महुआवां आदि जगहों पर जाकर मूर्तियां बनाते हैं। हालांकि कम आमदनी की वजह युवा पीढ़ियों का इस ओर दिलचस्पी नहीं है। इन्हें मूर्ती बनाने के वजाय प्रदेश में नौकरी करने में दिलचस्पी है।

सरकारी मद्द की है आस

जामुन प्रजापत, हरदेव प्रजापत, राहुल, गिरजा देवी, संतन प्रजापत, उपेन्द्र, रविन्द्र, रूपेश, रीता देवी, फेकनी आदि मूर्तिकारों ने कहा कि दुर्गा मां की एक मूर्ती बनाने में 3-4 हजार रुपये खर्च आते हैं। जबकि 4-5 हजार रुपये में बेंचना पड़ता है। जिस वजह उनकी मजदूरी भी नहीं निकल पाता है। किन्तु घर चलाने के लिए उनके पास इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। कहा सुतरी, बांस, पटरा, रंग, साज-सज्जा, श्रृंगार आदि सभी समाग्रियों की कीमत काफी बढ़ गई है। मूर्ती बनाने के लिए मिट्टी भी खरीदना पड़ता है। इन्होंने बताया कि केन्द्र व राज्य की सरकारें कौशल विकास की बात करती है। किन्तु उनकी कौशल की कोई पूछ नहीं है। सरकारी तौर पर उन्हें आर्थिक मद्द मिले तो धंधे में चार-चांद लग सकता है।

बंगाल की तर्ज पर बन रहा पूजा पंडाल

इस बार के पूजा में करीब देढ़ लाख रुपये के खर्च का टारगेट है। मोनू वर्णसाल, सोनू गुप्ता, रवि, प्रवेश, चुन्नू, आशीष पाठक, उमेश वर्णवाल, सुरेन्द्र विश्वकर्मा, गोलू सिंह, बाबू गुप्ता, रमेश आदि युवाओं ने बताया कि बंगाल के तर्ज पर इस बार पूजा पंडाल बनाया जा रहा है। कोरोना गाइडलान का पालन करते हुये पूजा की लगभग पूरी तैयारी कर ली गई है। कहा पूजा में हिन्दू-मुस्लिम एकता पूरा ध्यान रखा जाता है।

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