फौजी इंजीनियर के बेटे ने नापा बिहार की सत्ता का शिखर; जो शकुनी ना खेल सके, वो गोल दाग गए सम्राट चौधरी

Apr 16, 2026 06:07 pm ISTRitesh Verma लाइव हिन्दुस्तान, पटना
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CM Samrat Father Shakuni Choudhary: फौजी इंजीनियर से नेता बने पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री बनकर बिहार की राजनीति के सत्ता शिखर को नाप दिया है।

फौजी इंजीनियर के बेटे ने नापा बिहार की सत्ता का शिखर; जो शकुनी ना खेल सके, वो गोल दाग गए सम्राट चौधरी

CM Samrat Father Shakuni Choudhary: भारतीय सेना में 14 साल तक देश की सेवा करने के बाद राजनीति में आए फौजी इंजीनियर शकुनी चौधरी तीन दशक लंबी पारी में जो नहीं कर पाए, उसे बेटे सम्राट चौधरी ने 26 साल के पॉलिटिकल करियर में बिहार की सत्ता के शिखर को नापकर हासिल कर लिया है। शकुनी चौधरी कई दल में रहे, छह बार विधायक चुने गए, सांसद और मंत्री भी बने, पत्नी पार्वती देवी विधायक बनीं, कुशवाहा समाज को नीतीश कुमार के साथ मिलकर ‘लव-कुश’ की राजनीतिक धार दी, लेकिन एक अधूरेपन के साथ 2015 के बाद राजनीति के नेपथ्य में चले गए। फुटबॉल और वॉलीबॉल के खिलाड़ी रहे शकुनी चौधरी कुशवाहा राजनीति से जो खेल नहीं कर पाए, उस खेल का सबसे बेहतरीन गोल उनके बेटे सम्राट ने मार दिया है। बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पहले सीएम सम्राट चौधरी की ताजपोशी के बाद शकुनी के मन की बात जब जुबान पर आई तो उसमें यही दर्द छुपा था- ‘जो बाप नहीं कर पाता है, किसी कारण, उसको अगर बेटा कर दे, ये तो बहुत बड़ा ऐतिहासिक काम हुआ।’

मुंगेर जिले की तारापुर विधानसभा सीट से पहली बार 1985 में निर्दलीय जीते शकुनी चौधरी 1990 में कांग्रेस के टिकट पर जीते। 1994 में जब जॉर्ज फर्नांडीस और नीतीश जनता दल छोड़कर समता पार्टी के बैनर तले गांधी मैदान में लालू यादव के खिलाफ ‘बिहार बचाओ रैली’ कर रहे थे, तब शकुनी भी वहां पहुंच गए। शकुनी उस समय कांग्रेस विधायक और प्रदेश उपाध्यक्ष थे। उसके बाद शकुनी और नीतीश की ‘लव-कुश’ वाली जोड़ी बन गई। 1995 में समता पार्टी विधानसभा चुनाव अकेले ही लड़ी और उसके 7 विजयी विधायकों में नीतीश और शकुनी शामिल थे।

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1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और समता पार्टी का गठबंधन हो गया। एनडीए के बैनर तले शकुनी चौधरी खगड़िया सीट से समता पार्टी के सांसद बनकर दिल्ली गए, तो तारापुर से उप-चुनाव में पत्नी पार्वती देवी समता पार्टी की विधायक बनीं। लेकिन, इसके बाद शकुनी चौधरी नीतीश से दूर और लालू के करीब जाने लगे। 1999 में राबड़ी देवी ने सम्राट चौधरी को विधायक या विधान पार्षद बने बिना मंत्री बना दिया। तब भाजपा नेता सुशील मोदी के सवाल उठाने पर मंत्री बनने को निर्धारित उम्र में कमी के आधार पर राज्यपाल ने बर्थडे के दिन ही सम्राट को बर्खास्त कर दिया था। 2000 के चुनाव में शकुनी का परिवार लालू के साथ हो गया। शकुनी तारापुर से जीते तो सम्राट चौधरी परबत्ता से। शकुनी चौधरी कद्दावर मंत्री भी बने।

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लालू और राजद के साथ शकुनी के परिवार की पारी 2014 तक चली। इस दौरान शकुनी तारापुर से राजद के टिकट पर तीन बार जीते। सम्राट चौधरी भी राजद के टिकट पर परबत्ता से 2000 के बाद 2010 में जीते। 2010 में लालू की पार्टी राजद से मात्र 22 लोग जीते थे। सम्राट उनमें एक थे। शकुनी खुद तारापुर में हार गए। लालू का शकुनी परिवार पर ऐसा भरोसा था कि उन्होंने विधानसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक सम्राट को बना दिया था।

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नीतीश कुमार के 2013 में एनडीए छोड़ने के बाद राज्य की राजनीति करवट लेने लगी। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले सम्राट ने राजद को तोड़ दिया और स्पीकर को 13 विधायकों की सूची देने के बाद अलग मान्यता मांगी। स्पीकर ने अलग ग्रुप मान लिया। बाद में 6 विधायक यह कहके मुकर गए कि उनके दस्तखत फर्जी हैं या उनसे कुछ और कहकर साइन करवाया गया। इस तोड़-फोड़ के बाद सम्राट सीएम के हेलिकॉप्टर में चढ़कर नीतीश को परबत्ता ले गए थे। नीतीश ने सम्राट को फिर एमएलसी भी बनाया। दोनों के निजी संबंध तब से प्रगाढ़ हैं, भले रास्ते अलग हुए। भाजपा के पहले सीएम के चयन में नीतीश का वह स्नेह सम्राट के काम आया जो 2014 में उन्होंने राजद को तोड़कर हासिल कर लिया था।

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2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू की करारी हार के बाद नीतीश ने सीएम की कुर्सी छोड़ दी और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। इस सरकार में सम्राट चौधरी भी मंत्री बने। नीतीश ने उनको जेडीयू से एमएलसी बना दिया था। लेकिन 2015 के बिहार चुनाव में नीतीश ने लालू से हाथ मिला लिया। शकुनी और सम्राट चौधरी तब मांझी के साथ हम बनाने चले गए। शकुनी हम के प्रदेश अध्यक्ष बने। चुनाव में हम का सूपड़ा साफ हो गया। सिर्फ मांझी जीत पाए। शकुनी तारापुर से हारे। उनके बेटे रोहित चौधरी खगड़िया से हारे। शकुनी चौधरी ने पराजय की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। विधानसभा चुनाव में जदयू का एमएलसी रहते महागठबंधन के खिलाफ काम करने के आधार पर जेडीयू के नोटिस पर सभापति ने सम्राट की विधान पार्षदी भी रद्द कर दी।

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इसके बाद शकुनी और सम्राट ने कुछ समय देश और बिहार की बदल रही राजनीति को भांपने के बाद भारतीय जनता पार्टी का रुख किया। सम्राट चौधरी 2017 में भाजपा में शामिल हुए। उन्हें लाने वाले भी सुशील मोदी थे, जिनके हंगामा से 1999 में सम्राट को गवर्नर ने बर्खास्त किया था। सम्राट भाजपा में तेजी से बढ़े। भाजपा को एक मजबूत ओबीसी नेता की तलाश थी जो मुखर हो, आक्रामक हो। नीतीश के विकल्प की राजनीति कर सके। भाजपा को वह तलाश सम्राट में पूरी होती दिखी।

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सम्राट सबसे पहले भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष बने। फिर 2020 में भाजपा ने एमएलसी बनाया। फिर नीतीश सरकार में मंत्री बने। जब नीतीश 2022 में महागठबंधन में चले गए तो विधान परिषद में नेता विपक्ष बने। सम्राट ने मां पार्वती देवी (पूर्व विधायक) के सितंबर 2022 में निधन के बाद श्राद्ध में जो पगड़ी बांधी, उसे राजनीति का हथियार बना लिया और कहा कि जब तक नीतीश को कुर्सी से नहीं हटाएंगे, मुरेठा नहीं खोलेंगे। यह अलग बात है कि मुरेठा खोलने का मौका उन्हें नीतीश ने ही 2024 में दिया, जब एनडीए में लौटने के बाद उनकी सरकार में सम्राट पहली बार डिप्टी सीएम बने।

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2024 में नीतीश और सम्राट का जो मिलन हुआ, तो फिर चाचा-भतीजा की केमिस्ट्री रंग में आ गई और नीतीश ने सवा दो साल में सीएम की कुर्सी सम्राट को सौंपकर बिहार की राजनीति का चेहरा ही बदल दिया। भाजपा को अपना सीएम चाहिए था और नीतीश को भाजपा का ऐसा सीएम, जो अपना लगे। सम्राट दोनों के फॉर्मूले में सेट हो गए। शकुनी चौधरी के जमाने में ना ऐसा मौका आया और ना उन्होंने ऐसा मौका बनाया।

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शकुनी ने सम्राट के मुख्यमंत्री बनने के अंदर की कहानी सुनाते हुए कहा- ‘जिस तरह उन्होंने जनता का दिल जीता, जिस तरह नेताओं का दिल जीता, ये कम इतिहास है क्या। आप सोचिए, दो धुरी, एक धुरी भाजपा का है, दूसरी धुरी जदयू का। दोनों के नेता एक ही नाम पर आश्वस्त हो जाएं और डटकर बोलें कि सम्राट चौधरी को आगे बढा़ना है, तो कोई ना कोई गुण तो होगा। नरेंद्र मोदी और नीतीश का आशीर्वाद सम्राट को मिला है। ये कम बात नहीं है। ये भगवान का गिफ्ट है।’

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शकुनी चौधरी इसी साल 4 जनवरी को 90 साल के हो गए। सम्राट ने शकुनी के 90वें जन्मदिन पर पटना में बड़ा जलसा रखा था। नीतीश भी अपने पुराने मित्र को शुभकामना देने पहुंचे थे। शकुनी से जब मीडिया ने सम्राट के नेतृत्व में बिहार के विकास पर सवाल किया तो हाजिरजवाब नेता ने कहा- ‘जिस युवा को पीएम मोदी ने बनाया है, कुछ सोचकर बनाया होगा। जिस युवा को नीतीश ने बनाया है, 20 साल राज करने के बाद, आखिर कुछ तो सोचा होगा, तब ना बनाया।’

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राजनीति में आने के बाद शकुनी ने जो भी सपने देखे होंगे, उसमें कुछ अधूरे रह गए थे। बेटे के जरिए उन सपनों को पूरा होते देख गदगद बाप की वो पीड़ा भी झलकी और शकुनी ने कहा- ‘कभी-कभी ईश्वर की कृपा होती है। हम पूरा लड़ाई लड़े। लव-कुश बनाए। समता पार्टी बनाए। हम पार्टी बनाए। लेकिन सफलता नहीं मिली। आज अमित शाह, नरेंद्र मोदी और नीतीश की कृपा से सम्राट आगे बढ़ गए। हर मेहनत रंग लाता है। जो मेहनत करेगा, वही आगे बढ़ेगा।’

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Ritesh Verma

लेखक के बारे में

Ritesh Verma
रीतेश वर्मा पत्रकारिता में 25 साल से अलग-अलग भूमिका में अखबार, टीवी और डिजिटल में काम कर चुके हैं। दैनिक जागरण के साथ बिहार में 5 साल तक जिला स्तर की प्रशासनिक और क्राइम रिपोर्टिंग करने के बाद रीतेश ने आईआईएमसी, दिल्ली में दाखिला लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। एक साल के अध्ययन ब्रेक के बाद रीतेश ने विराट वैभव से दोबारा काम शुरू किया। फिर दैनिक भास्कर में देश-विदेश का पेज देखा। आज समाज में पहले पन्ने पर काम किया। बीबीसी हिन्दी के साथ आउटसाइड कंट्रीब्यूटर के तौर पर जुड़े। अखबारों के बाद रीतेश ने स्टार न्यूज के जरिए टीवी मीडिया में कदम रखा। रीतेश ने टीवी चैनलों में रिसर्च डेस्क पर लंबे समय तक काम किया है और देश-दुनिया के विषयों पर तथ्यपरक जानकारी सहयोगियों को आगे इस्तेमाल के लिए मुहैया कराई है। सहारा समय और इंडिया न्यूज में भी रीतेश रिसर्च का काम करते रहे। इंडिया न्यूज की पारी के दौरान वो रिसर्च के साथ-साथ चैनल की वेब टीम के हेड बने और इनखबर न्यूज पोर्टल को बतौर संपादक शुरू किया। लाइव हिन्दुस्तान के साथ एडिटर- न्यू इनिशिएटिव के तौर पर पिछले 6 साल से जुड़े रीतेश फिलहाल उत्तर प्रदेश और बिहार की खबरों और दोनों राज्यों की टीम को देखते हैं। और पढ़ें
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