
मांगुर, गैंचा, सिधी, टेंगरा जैसी मछलियां विलुप्त हो रहीं; कतला-रोहू का भी उत्पादन घटा, वजह जानिए
मत्स्य पदाधिकारी बताते हैं कि पर्यावरणीय असंतुलन और मानसून के अनियमित व्यवहार का सीधा असर मछलियों की देशी प्रजातियों पर पड़ा है। कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।
बिहार में नदियों के जलस्तर में लगातार हो रही कमी अब केवल जल संकट तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका सीधा और गहरा प्रभाव पर्यावरण, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जिले की प्रमुख नदियों और जल स्रोतों में पानी घटने से जहां जलीय जीव-जंतुओं का अस्तित्व संकट में है, वहीं बदलते पर्यावरणीय हालात आम जनजीवन के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। बिहार में पाई जाने वाली कई मछलियां विलुप्त होने के कगार पर हैं।
पूर्णिया के मत्स्य पदाधिकारी मृत्युंजय कुमार सिंह के अनुसार पर्यावरणीय असंतुलन और मानसून के अनियमित व्यवहार का सीधा असर मछलियों की देशी प्रजातियों पर पड़ा है। एक समय पूर्णिया की नदियों और तालाबों में सहज रूप से मिलने वाली देशी मांगर, मच्छली, गैंचा (पटिया), सिधी, टेंगरा, सौरा गड़ई, दरही, रेवा और कुर्सा जैसी प्रजातियां अब प्रायः विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। प्राकृतिक परिस्थितियां अनुकूल न रहने के कारण रोह और कतला जैसी प्रमुख मछलियों के प्राकृतिक उत्पादन में भी भारी कमी आई है। वर्तमान में बाजार में मिलने वाली रोह और कतला मुख्यतः पालन से प्राप्त होती हैं। उन्होंने बताया कि पूर्णिया जिले में स्थानीय खपत के अनुरूप मछली उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
तेजी से बिगड़ रहे पर्यावरणीय दशा-दिशा
विशेषज्ञ जैव विविधता पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर पूर्णिया विश्वविद्यालय के पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. संजीव कुमार सिंह कहते हैं कि कोसी क्षेत्र सहित पूर्णिया में पर्यावरणीय हालात तेजी से खराब हुए हैं। इसके परिणामस्वरूप कई जीव-जंतु पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं, जबकि कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। बीते कुछ वर्षों में पर्यावरण असंतुलन का प्रभाव सीधे मानव जीवन पर भी देखने को मिल रहा है। प्रो. सिंह के अनुसार बदलते पर्यावरण के कारण रक्तचाप, हृदय रोग और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों में लगातार वृद्धि हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्णिया में अब पीने योग्य शुद्ध पानी की भारी कमी हो गई है। मजबूरी में आम लोग खराब गुणवत्ता वाला पानी पीने को विवश हैं, जिससे जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
नदी या इसके किनारे न फैलाएं कचरा
पूर्णिया। नदियों की साफ-सफाई रहनी चाहिए। किसी भी तरह की गंदगी रहती है तो यह स्वस्थ्य लोगों के लिए एक बीमारी बनेगी। इसलिए इसकी सफाई रहनी चाहिए। यह बातें सिविल सर्जन डॉ प्रमोद कुमार कनौजिया ने कही। उन्होंने नदियों की साफ सफाई नहीं होने की स्थिति में स्वास्थ्य के असर पर अपनी प्रतिक्रिया में जानकारी दी।
नमामि गंगे योजना के तहत रखी जा रही है नजर
पूर्णिया शहर के बीचोबीच सौरा नदी में मेडिकल वेस्ट के बहाने के मामले सामने आते रहते हैं। इससे नदी का जल दूषित हो रहा है। जीवनदायिनी सौरा नदी पर इसका असर पड़ रहा है। मछलियों की कई प्रजाति इसके चलते विलुप्त होने लगी है।। कई उद्योग धंधे के गंदे पानी भी छोटे-छोटे चैनल के माध्मय से नदियों में जा रहे हैं।

लेखक के बारे में
Sudhir Kumarटीवी, प्रिंट और डिजिटल पत्रकारिता में लगभग 18 साल का अनुभव रखने वाले सुधीर कुमार लाइव हिन्दुस्तान में अगस्त 2021 से बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर/को-ऑर्डिनेटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में हिन्दुस्तान दैनिक से इंटर्न के रूप में करियर की शुरुआत की। सुधीर ने लंबे समय तक ईटीवी/न्यूज18 में रिपोर्टर के रूप में बिहार और झारखंड में काम किया। दोनों राज्यों की राजनीति के साथ क्राइम, भूगोल और कल्चर की समझ रखते हैं। झारखंड में नक्सली वारदातों की कवरेज के साथ बिहार के चर्चित बालिकागृह कांड की पहली टीवी रिपोर्टिग कर गुनाहगारों का चेहरा उजागर किया। सुधीर ने स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के मुद्दों को कवर किया है और ह्यूमैन रिलेशन्स पर भी लिखते हैं। साइंस बैकग्राउंड के विद्यार्थी सुधीर कुमार ने इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी से पीजी डिप्लोमा किया है। डिजिटल कंटेंट क्रिएशन में खास रूचि रखते।
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