जवानी में ही शरीर पर 'बुढ़ापे' का अटैक, युवाओं को तेजी से जकड़ रही पार्किंसन; डॉक्टर भी हैरान
बढ़ती खराब जीवनशैली, तनाव और सिर की चोट के कारण अब युवाओं में भी 'पार्किंसन' जैसी बुढ़ापे की बीमारी फैल रही है। भागलपुर के अस्पतालों में 29 से 49 साल के 13% मरीज पहुंच रहे हैं, जिनके हाथ कांपने और चलने में संतुलन खोने जैसे लक्षण दिख रहे हैं। एक्स्पर्ट्स ने सही खान-पान की सलाह दी है।

Bihar News: बीमारियां अब उम्र के दायरे को तोड़ रही हैं। जिस पार्किंसन बीमारी को कभी बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था, अब वह युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रही है। भागलपुर के प्रमुख अस्पतालों में अब 29 साल तक के युवा हाथ कांपने और चलने में दिक्कत जैसी समस्याओं के साथ पहुंच रहे हैं। डाक्टरों के अनुसार, बदलती जीवनशैली, मानसिक तनाव और शारीरिक चोटें इस गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या की मुख्य वजह बन रही हैं।
29 से 49 साल के बीच बढ़ रहे मरीज
जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (मायागंज) और सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार के अनुसार, पहले पार्किंसन आमतौर पर 55 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों में देखा जाता था। लेकिन अब कुल मरीजों में से लगभग 13 प्रतिशत ऐसे हैं जिनकी उम्र 29 से 49 साल के बीच है। रोजाना औसतन तीन से चार नए युवा मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
क्यों शिकार हो रहे हैं युवा?
एक्स्पर्ट्स का मानना है कि युवाओं में पार्किंसन होने की वजह सामान्य लक्षणों से थोड़ी अलग और गंभीर है। इसके प्रमुख कारणों में बिगड़ती जीवनशैली, गलत खान-पान, नींद की कमी और रोड एक्सीडेंट में सिर पर लगने वाली गंभीर चोट वजह है। इसके साथ ही जिनके परिवार में पहले से किसी को पार्किंसन है, उन्हें अधिक संजीदा रहने की जरूरत है।
क्या है पार्किंसन और इसके लक्षण?
पार्किंसन एक 'न्यूरोडिजेनरेटिव डिसऑर्डर' है। इसमें दिमाग के अंदर खास तरह के डोपामाइन का नुकसान होने लगता है, जिससे शरीर के अंगों पर कंट्रोल कम हो जाता है। इसके मुख्य लक्षण हैं:
1. हाथों और पैरों में कंपन शुरू होना।
2. चलने-फिरने की गति धीमी हो जाना।
3. शरीर में जकड़न महसूस होना।
सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के मस्तिष्क रोग विशेषज्ञ डॉ. सूर्यकांत मणि के मुताबिक, नई दवाओं से अब पार्किंसन का इलाज आसान हो गया है, हालांकि कुछ गंभीर मामलों में ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है। वहीं, आयुर्वेद के नजरिए से श्री यतींद्र नारायण अष्टांग राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सीबी सिंह ने बताया कि शरीर में एंटी-ऑक्सीडेंट्स की मात्रा बढ़ाकर 'न्यूरोडिजेनरेटिव' प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है। उन्होंने भोजन में कढ़ी पत्ता, अश्वगंधा, हल्दी और कसूरी मेथी जैसी आयुर्वेदिक चीजों को शामिल करने की सलाह दी है।


