दीपक प्रकाश का पद मार्च तक ही सेफ! आगे RLM का BJP में विलय या कुशवाहा की विदाई?
रालोमो अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने दीपक प्रकाश को विधान पार्षद बनवाकर सम्राट चौधरी सरकार में बेटे का मंत्री पद मार्च तक बचा लिया है। भाजपा में दल के विलय का दबाव झेल रहे कुशवाहा का रुख सात महीने बाद की राजनीति तय करेगा।

बिहार में नया दल बनाने और उसका दूसरे दल में विलय करने के बाद तीसरा दल बनाने वाले नेता उपेंद्र कुशवाहा ने बेटे की कुर्सी बचाने के लिए येन-केन-प्रकारेण मंत्री दीपक प्रकाश को सात महीने वाला विधान पार्षद बनवा लिया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार की सलाह पर राज्यपाल ने एमएलसी मनोनीत कर दिया है, जिनका कार्यकाल मार्च 2027 में पूरा हो रहा है। सात महीने बाद दीपक प्रकाश को अगर मंत्री पद पर बने रहना है तो उपेंद्र कुशवाहा को फिर बीजेपी से एमएलसी की एक सीट मांगनी होगी। सूत्रों के अनुसार कुशवाहा ने फिलहाल के लिए मुसीबत टालने में कामयाबी हासिल कर ली है, लेकिन अगले सात महीने में उन्हें अपनी पार्टी आरएलएम का बीजेपी में विलय करने के ऑफर पर अपना मन बना लेना होगा। कुशवाहा का स्टैंड ही उनकी और परिवार की आगे की राजनीति तय करेगा।
उपेंद्र कुशवाहा के सामने विकट संकट है। उनकी पार्टी के चार विधायक में पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को छोड़कर बाकी तीन विधायक एक गुट की तरह पार्टी में बने हुए हैं। नीतीश कुमार ने जब पिछली सरकार में पहली बार दीपक प्रकाश को मंत्री बनाया था, तब कुछ दिन तक ऐसा माहौल बना रहा था कि रालोमो के तीन विधायक माधव आनंद, आलोक सिंह और रामेश्वर महतो पार्टी तोड़कर अब गए कि तब गए। लेकिन तब उपेंद्र कुशवाहा ने उनके बीच कुछ पद बांटकर संकट को सुलझा लिया था। लेकिन उस प्रकरण ने कुशवाहा को इशारों में समझा दिया था कि उनकी पार्टी की एकता तभी तक महफूज है, जब तक भाजपा उसे तोड़ना नहीं चाहती है।
जब बिना किसी सदन का सदस्य बने दीपक प्रकाश के दोबारा मंत्री बनने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए सम्राट चौधरी सरकार से जवाब मांग लिया, तब यह मामला कुशवाहा के पक्ष में झुका। नहीं तो जून में ही 10 सीटों के लिए हुए एमएलसी चुनाव में दीपक को भाजपा ने मौका नहीं दिया। सूत्रों का कहना है कि रालोमो का भाजपा में विलय से इनकार करने के कारण ही जून वाली लिस्ट में दीपक का नाम शामिल नहीं हो सका, जिससे उनका मंत्री बने रहना मुश्किल होता जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट में अगस्त के अंतिम हफ्ते में सुनवाई से पहले भाजपा ने खुद के एक एमएलसी का इस्तीफा करवाकर दीपक प्रकाश को उनकी जगह सदन में भेजा है। इसका असर सरकार के जवाब में दिखेगा, जब वह कोर्ट से कहेगी कि दीपक अब सदन के सदस्य हैं।
लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में शुरू मामला इतने से खत्म हो जाएगा या जिस दिन याचिका लगी, उसी दिन के मुताबिक जारी रहेगी, ये आगे समझ आएगा। कोर्ट में मामला जब गया था, तब दीपक विधायक या एमएलसी बने बिना छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री रह चुके थे। पंजाब में इसी तरह के एक मामले में कोर्ट ने वर्षों बाद फैसला देकर एक मंत्री की नियुक्ति को अवैध और असंवैधानिक बताया था, जब वो सरकार भी नहीं बची थी। ऐसा कोई फैसला दीपक प्रकाश के मामले में आगे आता है तो यह उनके साथ-साथ भाजपा के लिए भी असहज स्थिति हो सकती है। दीपक का केस बंद नहीं हुआ तो कुशवाहा पर भी दबाव बना रहेगा। मार्च से पहले विलय का दबाव बढ़ेगा और ऐसा नहीं करने पर भाजपा दीपक प्रकाश की विदाई का रास्ता खोल देगी या उपेंद्र कुशवाहा दिल्ली से ब्रेक लगवाने में फिर कामयाब होंगे, यह समय बताएगा।


