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सुषिर वाद्य भारतीय संस्कृति की धरोहर : डॉ. संतोष

दरभंगा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संगीत एवं नाट्य विभाग में आयोजित ऑनलाईन...

सुषिर वाद्य भारतीय संस्कृति की धरोहर : डॉ. संतोष
हिन्दुस्तान टीम,दरभंगाTue, 21 May 2024 07:00 PM
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दरभंगा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संगीत एवं नाट्य विभाग में आयोजित ऑनलाईन सोदाहरण व्याख्यान श्रृंखला के दूसरे दिन विषय विशेषज्ञ के रूप में सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक के डॉ. संतोष कुमार शामिल हुए। सुषिर वाद्य बांसुरी : अवलोकन एवं प्रदर्शन विषय पर आयोजित व्याख्यान में उन्होंने कहा कि भगवान इन्द्र के समय में भी संगीत के क्षेत्र में सुषिर वाद्य का प्रचलन था।
डॉ. कुमार ने सत्र की शुरुआत राग-नट भैरव की प्रस्तुति से प्रारंभ किया। जी-20 की बैठक में बांसुरी वादन का प्रदर्शन करने वाले डॉ. कुमार ने कहा कि सुषिर वाद्य पूरे विश्व में बजाया जाता है। इसकी परंपरा द्वापर में श्रीकृष्ण के समय से बांसुरी के रूप में और वैदिक काल में इंद्र के समय में भी प्रचलित था। सिंधु घाटी सभ्यता के समय जब सभ्यता पूर्ण रूप से विकसित भी नहीं हुई थी, उस समय भी बांसुरी के अवशेष विभिन्न जगहों पर विभिन्न रूप में प्राप्त हुए थे। टेराकोटा की मूर्तियों में बांसुरी के अवशेष मिलते हैं।

बांसुरी के विभिन्न प्रकार सोना, लोहा, ताम्बा, चंदन की लकड़ी तथा बांस की बांसुरी का उदाहरण देकर नवोदित कलाकारों को प्रेरित किया। उन्होंने बांसुरी के 14 प्रकारों की चर्चा छिद्रों के आधार पर करते हुए वेदों और नाट्य शास्त्र में बांसुरी एवं सुषिर वाद्यों के महत्व पर प्रकाश डाला। नामचीन बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष, हरि प्रसाद चौरसिया, पंडित रघुनाथ सेठ, सुनील कांत गुप्ता व राजेंद्र प्रसन्ना आदि महान वादकों के विषय में भी विस्तृत चर्चा हुई। व्याख्यान का समापन बांसुरी पर द्रुत ख्याल में तीनताल में बद्ध बंदिश के साथ हुआ। विभागाध्यक्ष प्रो. पुष्पम नारायण ने स्वागत व धन्यवाद ज्ञापन किया। व्याख्यान में पूर्व विभागाध्यक्ष व संकायाध्यक्ष प्रो. लावण्य कीर्ति सिंह काव्या, डॉ. नितप्रिया प्रलय सहित छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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