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जाले में वैष्णवी शक्तिपीठ है माता रत्नेश्वरी स्थान

जाले में वैष्णवी शक्तिपीठ है माता रत्नेश्वरी स्थान

रतनपुर स्थित माता रत्नेश्वरी स्थान मिथिलांचल में एक वैष्णवी दुर्गा पीठ के रूप में प्रसिद्ध है। यहां की माता लक्ष्मी स्वरूपा दुर्गा हैं। सच्चे भाव से इनकी पूजा करने वाले भक्तों की माता तत्क्षण ही मनोकामना पूरी कर देती हैं। यही वजह है कि यहां मिथिलांचल और नेपाल के कोने-कोने से प्रतिदिन भक्तों के आने जाने का सिलसिला लगा रहता है। यहां शारदीय और वासंतिक दोनों नवरात्रा में माता की पूजा वैष्णवी पद्धति से होती है। यहां माता दुर्गा की प्रतिमा नहीं बनाई जाती, मंदिर में अवस्थित माता की अंकुरित पींड़ी (प्रतिमा) की पूजा-अर्चना की जाती है।

माता रत्नेश्वरी स्थान का प्राचीन इतिहास है। बंगाल में 1234-1293 में सेन राजवंश था। देवा राजवंश के उदय के बाद सेन वंश के वारिस वहां से दूसरे जगहों के लिए पलायन करने लगे। अंतिम शासक केशव सेन के परपौत्र रत्नसेन बंगाल से पलायन कर मिथिलांचल पहुंचा। वे माता दूर्गा के परम उपासक थे। उसने रतनपुर के तत्कालीन दुर्गा स्थान के पास अपना एक किला बनाया। राजा रत्नसेन के नाम पर ही बस्ती का नाम रत्नपुर पड़ा। अब यह रतनपुर के नाम से प्रसिद्ध है।

ग्रामीणों की करतीं हैं रक्षा

प्रधान पुजारी जयचंद्र कुमर उर्फ फुनाई कुमर कहते हैं कि माता आज भी राजा रत्नसेन की अकूत संपत्तियों साथ-साथ ग्रामीणों की रक्षा कर रही हैं। राजा रत्नसेन के किला के भग्नावशेष पर अवस्थित माता रत्नेश्वरी परम वरदायणी एवं करुणामयी है। इनकी अराधना से भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। रतनपुर और ब्रह्मपुर के हर एक मांगलिक कार्य उनकी पूजा आराधना के बगैर संपन्न नहीं होती है।

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  • Web Title:Vaishnavi Shaktipeeth is in the Mata Ratneshwari place