Hindi NewsBihar NewsDarbhanga NewsSignificance of Traditional Sanskrit Chants and Modern Music Explored at Seminar
जीवन को परिष्कृत करते हैं कला साहित्य एवं संगीत : प्रो. मिश्र

जीवन को परिष्कृत करते हैं कला साहित्य एवं संगीत : प्रो. मिश्र

संक्षेप:

दरभंगा में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में आयोजित संगोष्ठी में संगीत और साहित्य के बीच गहरे संबंधों पर चर्चा की गई। प्रो. सम्पदानंद मिश्र ने बताया कि छन्द और राग का आपसी संबंध हमारे जीवन में आनंद और स्वास्थ्य को बढ़ाता है। आधुनिक संगीत में प्राचीन छंदों का प्रयोग महत्वपूर्ण है।

Jan 16, 2026 08:10 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, दरभंगा
share Share
Follow Us on

दरभंगा। कला, साहित्य एवं संगीत हमारे जीवन को परिष्कृत करते हैं, जिनसे हमारा जीवन स्वस्थ, सुंदर और सार्थक बनता है। छन्दों के साथ प्रकृति का तादात्म्य संबंध है। संगीत की चेतना हमें प्रकृति से मिलती है। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग में आयोजित संगोष्ठी में ऋषिहुड विश्वविद्यालय, सोनीपत, हरियाण के मानव विकास केंद्र के निदेशक प्रो. सम्पदानंद मिश्र ने उक्त बातें कही। पारंपरिक संस्कृत छन्द और आधुनिक संगीत विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रो. मिश्र ने कहा कि एक छन्द में निबद्ध काव्य या गीत को अनेक तरह से पढ़ा या गाया जा सकता है।

प्यार से लेकर प्रमोशन तक 2026 का पूरा हाल जानें ✨अभी पढ़ें

छन्द केवल काव्य या संगीत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हमारे हर सांस एवं पशु-पक्षियों के संचार सहित पूरी प्रकृति में विद्यमान है। आधुनिक फिल्मी गानों का संबंध हमारे प्राचीन छन्दों से है, जिनकी संख्या अनन्त है। यदि हम अलग-अलग छंदों में गायन करें तो हम ज्यादा स्वस्थ एवं आनंदित जीवन जी सकते हैं। अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकान्त झा ने कहा कि छन्द और राग परस्पर काफी घुले-मिले हैं, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। वेदों में 21 छन्दों का वर्णन मिलता है। छन्द या गान का अवतरण सामवेद से माना जाता है, जिसकी स्फूर्ति मानव चेतना से स्वत: होती है। उन्होंने कई छन्दों एवं रागों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि एक छन्द में चार चरण होते हैं। छन्दोबद्ध गीत या काव्य ही हमें आनंदित कर सकते हैं। दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. शिवानन्द झा ने कहा कि संगोष्ठी का विषय ज्ञान और व्यवहार का अद्भुत संगम है। उन्होंने वैदिक ऋचाओं एवं काव्य श्लोकों का महत्व बताते हुए कहा कि यदि हम प्रत्येक दिन छंदों में गायन करें तो अधिकांश बीमारियां शांत हो सकती हैं। विषय प्रवेश करते हुए मण्डन मिश्र पीठ के समन्वयक डॉ. आरएन चौरसिया ने कहा कि पारंपरिक संस्कृत छन्द और आधुनिक संगीत के बीच बहुत गहरे संबंध हैं। संगीत और साहित्य का संबंध आत्मा और शरीर जैसा है। संस्कृत के कुछ विशिष्ट छन्द अपनी गेयता के लिए प्रसिद्ध है और आज भी आधुनिक धुनों में मौजूद हैं। उन्होंने आधुनिक फिल्मों के गायन में प्रयुक्त अनेक छन्दों का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि इनका प्रयोग आधुनिक फिल्मों एवं रामायण महाभारत जैसे टीवी सीरियल्स में हुआ है जो श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। संगोष्ठी का संचालन करते हुए उदयनाचार्य पीठ के समन्वयक डॉ. मोना शर्मा ने कहा कि वेद को समझने के लिए छन्द आदि वेदांगों को समझना आवश्यक है। छन्द वेद पुरुष का चरण है, जिससे पद्यों की रचना होती है। उदयनाचार्य पीठ एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में डॉ. ममता स्नेही ने स्वागत, जबकि फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का प्रारंभ नीरज कुमार झा के वैदिक मंगलाचरण से हुआ। स्वागत गान कुमकुम कुमारी ने प्रस्तुत किया। सेमिनार में ऑनलाइन माध्यम से सीएमबी कॉलेज के प्रधानाचार्य प्रो. जीवानन्द झा तथा बंगाल से नजमा हसन सहित बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने ऑफलाइन मोड में भाग लिया। आयोजन में सदानंद विश्वास, रवीन्द्र कुमार, जिग्नेश कुमार, सम्पा नन्दी, अनिल कुमार सिंह, सोनाली मंडल तथा अनिमेष मंडल आदि का सक्रिय सहयोग रहा। सेमिनार में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागी शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को फाउंडेशन की ओर से प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।