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5 अप्रैल, 2020|3:26|IST

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सार्थक कविता खोए शब्दार्थ की करती है तलाश : कुशवाहा

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ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग में समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवि एवं अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. दिनेश कुशवाहा ने मंगलवार को विभाग के छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों से संवाद करते हुए काव्यपाठ किया।

प्रो. कुशवाहा ने कहा कि आज की हिन्दी कविता वही सार्थक है जो खोए शब्दार्थ की तलाश करती है। कविता छंदमुक्तता से छंदबद्धता की ओर लौट रही है। उन्होंने ‘उजाले में आजानुबाहु, ‘सोच लीजिए और ‘दशहरे पर राजा की सवारी जैसी अतिलोकप्रिय कविताओं का पाठ कर उपस्थित श्रोताओं की वाहवाही लूटी। दिनेश कुशवाहा ने जब कहा- ‘बड़बोले किसी के सगे नहीं होते, वे जिस पौधे को लगाते हैं, कुछ दिन बाद उसे एकबार उखाड़कर देख लेते हैं कि जड़ तो नहीं पकड़ रहा है तो कविता के राजनीतिक निहितार्थ अपने आप खुलने लगे। ‘कुनबे के कायाकल्प में लगे बड़बोले, विश्व कल्याण से छोटी बात नहीं बोलते। इन पंक्तियों का पाठ करते हुए दिनेश कुशवाहा नागार्जुन की धरती पर उन्हीं के तेवर की कविताएं परोस रहे थे। इस अवसर पर समकालीन हिन्दी कविता के चर्चित युवा कवि और दरभंगा निवासी मनोज कुमार झा ने भी अपनी कविताएं ‘यह बारिश, ‘काया, ‘विनय का पाठ किया। ‘सही स्थानों पर झुकने से, मन की रीढ़ सीधी होती है मनोज के इस पाठ की प्रशंसा की गयी।

कार्यक्रम के आरम्भ में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने दिनेश कुशवाहा का स्वागत करते हुए कहा कि वे नागार्जुन की परंपरा के कवि हैं, जिनकी कविता में शब्द और कर्म की एकता है। उनकी कविता आंदोलन के गर्भ से पैदा हुई है। विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के डॉ. विजय कुमार एवं डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने मिथिला की परंपरा के अनुरूप पाग-चादर से प्रो. दिनेश कुशवाहा का स्वागत किया।

इस अवसर पर प्रधानाचार्य डॉ. विद्यानाथ झा, डॉ. कृष्ण कुमार झा, डॉ. अमरकांत कुमार, डॉ. सतीश कुमार सिंह, अखिलेश कुमार शोधप्रज्ञ पार्वती कुमारी, कृष्णा अनुराग, अभिशेक कुमार सिन्हा समेत बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं भी उपस्थित थे।

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  • Web Title:Meaningful poem seeks for lost semantics Kushwaha