आंदोलन के साथ भाषा का गहरा संबंध : प्रो. तिवारी

Jan 11, 2026 07:22 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, दरभंगा
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दरभंगा में विश्व हिन्दी दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि आंदोलन और भाषा का गहरा संबंध है। उन्होंने बताया कि हिन्दी ने विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ा है और आज हिन्दी की वैश्विक उपस्थिति 170 देशों में महसूस की जाती है। संगोष्ठी में कई शिक्षकों ने अपने विचार रखे।

आंदोलन के साथ भाषा का गहरा संबंध : प्रो. तिवारी

दरभंगा। संत आंदोलन और बौद्ध आंदोलन से हिन्दी और पाली भाषा निकली। आधुनिक काल में दलित आंदोलन से हिन्दी, मराठी जैसी भाषाओं को पुनर्जीवन मिला। दलित आंदोलन ने भाषा को फिर से प्राणवान बनाया। इसलिए आंदोलन के साथ भाषा का गहरा संबंध है। आंदोलन से निकली भाषा दिशा देती है। विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर लनामिवि के पीजी हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने उक्त बातें कही। हिन्दी का वर्तमान भारतीय सन्दर्भ और वैश्विक परिप्रेक्ष्य विषयक संगोष्ठी में प्रो. तिवारी ने कहा कि जिस देश में भी जागरण, लोकजागरण या नवजागरण हुआ है, वहां की अपनी भाषा में ही हुआ है।

नकल की भाषा से आप नवजागरण नहीं ला सकते। भाषा की प्रतिष्ठा का प्रश्न भाषा का नहीं, अर्थव्यवस्था का प्रश्न है। आज लोग कोरियन, जापानी जैसी भाषाओं के पीछे इसलिए भाग रहे हैं, क्योंकि कोरिया, जापान जैसे देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत है। जब आप आर्थिक रूप से सम्पन्न होंगे तब लोग सहर्ष आपकी भाषा सीखने आयेंगे। रांची विश्वविद्यालय के प्रो. रविभूषण ने कहा कि भाषा समाज को बनाती है। समाज को नष्ट करेंगे तो भाषा भी नष्ट होगी। भाषा को बचाना अपने को बचाना है, प्रेम को बचाना है, सम्बन्धों को बचाना है, जीवन को बचाना है। वर्तमान समय में भाषा का अंग-भंग किया जा रहा है, भाषा की प्रकृति को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है। यह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज के डॉ. राकेश कुमार ने कहा कि हिन्दी ने उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम के क्षेत्रों को समेटते हुए उनके शब्दों को जगह दी। संगोष्ठी का समाहार करते हुए लनामिवि के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि प्राचीन समय से हिन्दी अपने विभिन्न रूपों में समाज और राज्याश्रित रही है। वैश्विक स्तर पर इसकी प्रसिद्धि भारतीय संस्कृति के साथ भी अक्षुण्ण है। सत्र का संचालन डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मंजरी खरे ने किया। अंतिम सत्र में कॉलेज के शिक्षकों ने विचार रखे। डॉ. महेश सिन्हा ने कहा कि आज हिन्दी की वैश्विक उपस्थिति को दुनिया के 170 देशों में महसूस किया जा सकता है। हालांकि हिन्दी में राष्ट्रकवि तो हुए, लेकिन वह राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है। सीएम कॉलेज की डॉ. बिन्दु चौहान ने कहा कि विश्व पटल पर हिन्दी में शोध कार्य हो रहे हैं। हिन्दी का नामकरण ही सांस्कृतिक समन्वय का परिणाम है। एमएलएसएम कॉलेज के डॉ. ज्वालाचंद्र चौधरी ने हिंदी की ताकत और भूमंडलीकरण के दौर में बाज़ार पर हिन्दी के काबिज़ होने का पक्ष रखा। सीएम कॉलेज के डॉ. अखिलेश कुमार राठौर ने भाषा विज्ञान की दृष्टि से हिंदी के समृद्धि पर विचार रखें। बहेड़ी कॉलेज से डॉ. अभिमन्यु कुमार ने साहित्यिक लेखन में हिंदी के संवर्द्धन पर विचार रखा। आकाशवाणी के विनीत कुमार ठाकुर ने मीडिया में हिंदी के पक्ष पर विचार रखे। मारवाड़ी कॉलेज के डॉ. अनिरुद्ध सिंह ने खड़ी बोली हिंदी की संरचना पर प्रकाश डाला। अंतिम सत्र की अध्यक्षता करते हुए वीएसजे कॉलेज, राजनगर की डॉ. विभा कुमारी ने कहा कि वैश्विक परिदृश्य में स्वाध्याय की आवश्यकता है। निरंतर भाषाई विकास और शब्द संपदा का विकास होना चाहिए। भाषा को सीखने और साहित्य को गुनने का कोई अंत नहीं। अंतिम सत्र में शोधार्थी कंचन रजक, खुशबु कुमारी, कुमकुम झा, सुभद्रा कुमारी, पिंकी कुमारी सहित कई शिक्षकों ने अपने शोधपत्रों का वाचन किया। संचालन मारवाड़ी कॉलेज के डॉ. गजेंद्र भारद्वाज ने किया।

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