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दरभंगाअब नहीं मिले रहे चार कंधे

हिन्दुस्तान टीम,दरभंगाPublished By: Newswrap
Tue, 25 May 2021 03:52 AM
अब नहीं मिले रहे चार कंधे

सिंहवाड़ा | संवाद सूत्र

कोरोना की दूसरी लहर ने सामाजिक ताने-बाने को ही छिन्न-भिन्न कर दिया है। समाज में मृतकों के अंतिम दर्शन एवं अंतिम यात्रा का रिवाज ही बदल गया है। लाश को समाज में सम्मान सहित चार लोगों के कंधे पर श्मसान पहुंचाने की परंपरा थी। वहां समाज के सभी लोग उसके अंतिम संस्कार में शिरकत करते थे। मुस्लिम समाज के लोग जनाजे की नमाज अदा कर तो हिंदू समाज के लोग जय श्रीराम के नारे लगाकर अंत्येष्टि की क्रिया संपन्न करते थे। इससे पूर्व गांव के लोग मृतक के अंतिम दर्शन एवं अंतिम यात्रा में शामिल होना सौभाग्यशाली समझ रहे थे। लेकिन कोरोना स्थिति बदल दी है। कोरोना से पीड़ित एवं ब्लैक फंगस के शिकार निस्ता निवासी वकील यादव की लाश पटना के आईजीआईएमएस से गांव आने की जानकारी मिलते ही गांव के लोग सहम गए। अधिकतर लोग अपने घर के दरवाजे बंद कर खिड़की से लाश आने की आहट पता लगा रहे थे। इधर मृतक के परिजनों ने अंतिम संस्कार की कोई व्यवस्था नहीं होता देख भाड़े पर जेसीबी मशीन लिया। श्मशान में जाकर गड्ढा बनवाया। उधर, एंबुलेंस से जैसे ही वकील यादव की लाश गांव में पहुंची, परिजन एंबुलेंस सहित श्मशान पहुंच गए। वहां ताबूत सहित लाश को जेसीबी से बनाए गए गड्ढे में दबा दिया। इधर, घर- आंगन में बिलख रही मृतक की पत्नी गनीता देवी, लड़का कृष्ण कुमार, लड़की सीमा कुमारी, मीरा कुमारी व आशा कुमारी को कोरोना के भय से कोई दिलासा दिलाने भी नहीं आ रहा था। परिवार के लोग ही एक-दूसरे को दिलासा दिला रहे थे। आसपास के लोगों ने उनके यहां आना-जाना भी बंद कर दिया। ग्रामीणों ने बताया कि कोरोना ने ही हमारी सनातन व्यवस्था पर प्रहार किया है। हमें मास्क लगाकर एवं सोशल डिस्टेंस का पालन कर एक दूसरे की मदद करनी चाहिए।

श्राद्ध में दान एवं भोज का बदलने लगा है चलन:

कोविड-19 की दूसरी लहर ने श्राद्ध के दौरान कर्मकांड करने एवं मृत्युभोज करने का चलन भी बदल दिया है। जैसे ही लोगों को पता चल रहा है कि कोरोना से मौत हुई है, लोग उसके यहां भोज खाने के लिए नहीं जा रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि कर्मकांड के लिए महापात्र भी दरवाजे तक पहुंचने में आनाकानी कर रहे हैं। अगल-बगल के किसी साफ-सुथरी जगह पर सेनेटाइजर कर मास्क एवं सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए महापात्र श्राद्ध कर्म को जैसे-तैसे पूरा कर रहे हैं। श्राद्ध के दौरान दिए जाने वाले बर्तन एवं अन्य वस्तुओं के बदले लोग महापात्र को रुपए ही देने शुरू कर दिए हैं। दूर-दूर गांव से आने वाले इक्का-दुक्का रिश्तेदार अगर पहुंचते भी हैं तो हाल पूछने का कोरम पूरा कर बिना चाय-पानी लिए ही दरवाजे से निकल रहे हैं।

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