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आलोक अरुण के नाम बना एक और कीर्तिमान

हिन्दुस्तान टीम,दरभंगाPublished By: Newswrap
Mon, 14 Jun 2021 07:51 PM
आलोक अरुण के नाम बना एक और कीर्तिमान

दरभंगा। निज प्रतिनिधि

अमेरिका के पोर्तो रिको स्थित इंटर अमेरिकन यूनिवर्सिटी के बायोटेक्नोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत आलोक अरुण के रिसर्च प्रोजेक्ट ‘फ्यूचर फार्मिंग को यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर पेंसिलवेनिया ने उच्चतम शोध प्रारूप का दर्जा देकर 9,48,771 डॉलर (करीब सात करोड़ रुपये) का अनुदान स्वीकृत किया है। इतनी बड़ी राशि रिसर्च ग्रांट के रूप में प्राप्त करने वाले आलोक अपने विश्वविद्यालय में प्रथम व्यक्ति हैं। इस आधार पर विश्वविद्यालय ने इन्हें एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर प्रोन्नत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। 2019 में अमेरिका की सबसे बड़ी फंडिंग एजेंसी नेशनल साइंस फाउंडेशन की ओर से भी लगभग तीन करोड़ रुपए का रिसर्च ग्रांट स्वीकृत किया गया था। लगातार रिसर्च ग्रांट प्राप्त कर आलोक अपनी मेधा का परचम लहराते रहे हैं। मूलत: मधुबनी जिले के बिस्फी प्रखंड अंतर्गत सिंगिया उत्तरी के स्व. हरिवंश झा के पौत्र एवं सीएम कॉलेज के सेवानिवृत्त अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. परमानंद झा एवं रेणु झा के सुपुत्र आलोक दिल्ली विश्वविद्यालय से बॉटनी में एमएससी तथा एमफिल करने के बाद यूरोप के सर्वाधिक प्रतिष्ठित ‘इरैसमस मेंडस फेलोशिप‘ प्राप्त कर पेरिस स्थित पियरे एंड मैडम क्यूरी विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त कर पोस्ट डॉक्टरल फेलोशिप के तहत बेल्जियम विश्वविद्यालय में दो वर्षों तक शोध कार्य और शिक्षण में संलग्न रहे। इसके बाद उनकी नियुक्ति आसिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर इंटर अमेरिकन विश्वविद्यालय में हुई जहां अभी वे कार्यरत हैं। इससे पूर्व फ्रांस के रौस्कॉफ में मरीन एवोल्यूशनरी एंड एकोलॉजिकल जेनोमिक्स समर कोर्स 2010 में आलोक का चयन दुनियाभर से चुने गए 16 शोधार्थियों में हुआ था। वर्ष 2012 में 20-23 सितंबर तक चीन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विश्वभर के चार वैज्ञानिकों के अलावा पांचवें वैज्ञानिक के रूप में आलोक ने ‘मरीन अल्गी विषय पर व्याख्यान दिया जिसे काफी सराहा गया। वर्ष 2013 में हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने बॉटनीकल सोसाइटी ‘संजीवनी के वार्षिक उत्सव में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। इसी वर्ष यूरोपीयन बायोइंफोर्मेटिक्स इंस्टिट्यूट, कैंब्रिज (इंग्लैंड) द्वारा ओकिनावा (जापान) में आयोजित शोध कार्यशाला में चयनित होने वाले आलोक पहले भारतीय रहे।

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