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दरभंगा राज परिवार के पास आज कितनी संपत्ति, कामसुंदरी देवी का क्या था असली नाम; जानें सबकुछ

दरभंगा राज परिवार के पास आज कितनी संपत्ति, कामसुंदरी देवी का क्या था असली नाम; जानें सबकुछ

संक्षेप:

दरभंगा राज परिवार की सदस्य कुमुद सिंह ने बताया कि महारानी अधिरानी कामसुन्दरी देवी बिहार के सबसे बड़े न्यास कामेश्वर सिंह रिलीजियस ट्रस्ट की अंतिम जीवित ट्रस्टी थीं। वर्तमान में इस ट्रस्ट के पास एक लाख एकड़ जमीन और दो हजार करोड़ का सोना है।

Jan 13, 2026 10:25 am ISTNishant Nandan हिन्दुस्तान, संतोष कुमार झा, दरभंगा
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देश के विकास और संकट की घड़ी में योगदान को लेकर दरभंगा राज परिवार का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। बिहार के मिथिला क्षेत्र में फैला दरभंगा राज करीब 8380 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर स्थापित था। इसका मुख्यालय दरभंगा शहर रहा। इसकी स्थापना 16वीं सदी की शुरुआत में मैथिल ब्राह्मण जमींदारों ने की थी। दरभंगा राज परिवार को करीब से जानने वाले संतोष चौधरी बताते हैं कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान दरभंगा राज सबसे पहले मदद के लिए आगे आये। दरभंगा के इंद्र भवन मैदान में लगभग 15 मन यानी करीब 600 किलो सोना तौलकर राष्ट्र रक्षा के लिए दान दिया गया। राज परिवार ने अपने तीन निजी विमान भी देश को सौंप दिए।

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इसके अलावा 90 एकड़ में फैला निजी एयरपोर्ट सरकार को दान कर दिया। इसी भूमि पर आज का दरभंगा एयरपोर्ट संचालित है। जानकार बताते हैं कि शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन में भी दरभंगा राज का अभूतपूर्व योगदान रहा। बीएचयू के निर्माण के लिए 50 लाख रुपए का दान दिया गया। प्राच्य विद्या के संरक्षण के लिए अपना आवासीय परिसर दान करके संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना कराई।

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यही देश का एकमात्र परिसर है, जहां दो विश्वविद्यालय संचालित होते हैं। वैज्ञानिक प्रगति में योगदान देते हुए दरभंगा राज ने नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. सी.वी. रमण को शोध के लिए बहुमूल्य हीरा प्रदान किया।दरभंगा राज परिसर में 1874 में निजी रेल लाइन बिछाई गई। वाजितपुर से नरगौना टर्मिनल तक 55 मील लंबा रेलखंड मात्र 62 दिनों में तैयार कर विश्व रिकॉर्ड बनाया गया।

इसके लिए तिरहुत रेलवे कंपनी की स्थापना कर उसका मुख्यालय मोती महल को बनाया गया। इस रेलखंड ने मिथिला क्षेत्र के विकास को नया आयाम दिया और लोगों को मजबूरी में परदेश जाने से बचाया। यही वह रेलमार्ग था, जहां देश में पहली बार तीसरे दर्जे के डिब्बे में शौचालय सुविधा उपलब्ध कराई गई। रेलखंड बनाने की जिम्मेदारी इंग्लैंड की एक कंपनी को सौंपी गयी। दूरसंचार के लिए तार बिछाने का ठेका रमेश्वर सिंह अर्थात लंगट सिंह को मिला। 1883 में भारत के वायसराय ने पहली बार आधिकारिक रेल सैलून से कोलकाता से दरभंगा तक की यात्रा की थी। उनका सैलून दरभंगा के नरगौना टर्मिनल तक आया था।

1934 में भूकंप के बाद महात्मा गांधी की दरभंगा यात्रा विवादों में थी। बिहार में जगह-जगह विरोध हो रहा था। ऐसे में दरभंगा जिला प्रशासन ने बापू को दरभंगा आने से रोक दिया था। महाराजा कामेश्वर सिंह को जब यह पता चला तो उन्होंने अपनी गारंटी पर गांधीजी को दरभंगा बुलाया। उन्होंने बापू की सुरक्षा का जिम्मा अपने मैनेजर डेनबी को सौंपा और अपने छोटे भाई को उनकी देखरेख में लगाया। गांधीजी की ट्रेन को सीधा नरगौना टर्मिनल लाया गया। पूरे टर्मिनल पर सुरक्षा के लिए प्रहरी तैनात थे। नरगौना टर्मिनल पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर देश के कई बड़े नेता, विद्वान और कारोबारी उतर चुके हैं।

महारानी कामसुंदरी देवी महारानी अधिरानी उपाधिधारी देश की अंतिम जीवित महिला थीं। दरभंगा राज परिवार की सदस्य कुमुद सिंह ने बताया कि कामसुंदरी नाम उन्हें दरभंगा राज परिवार की ओर से दिया गया था। उनका मायके का नाम कल्याणी था। कुमुद सिंह ने बताया कि राज परिवार में पहली रानी को लक्ष्मी, दूसरी को प्रिया और तीसरी को कामा नाम दिया जाता था। यह राज परिवार की परंपरा थी। सनातन में चार विवाह तक करने को मान्यता दी गयी थी। वर्तमान में वे महाराजा कामेश्वर सिंह की ओर से दिए गये कल्याणी निवास में रह रही थीं।

वहां मायके के लोग उनकी देखभाल करते थे। उनके पोते कुमार कपिलेश्वर सिंह ने बताया कि महारानी अधिरानी कामसुन्दरी देवी सादगी, सौम्यता, करुणा और गरिमा की जीवंत प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने जीवनभर राजपरंपरा की मर्यादाओं का निर्वाह करते हुए स्वयं को सदैव लोक जीवन से जोड़े रखा। वैभव और ऐश्वर्य के मध्य रहते हुए भी उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल, संयमी और संवेदनशील रहा।

उनका संपूर्ण जीवन मौन, साधना, त्याग, अनुशासन और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने समाज को दिशा और मर्यादा दोनों प्रदान की। कुमार रत्नेश्वर सिंह व कुमार राजेश्वर सिंह ने कहा कि महारानी अधिरानी कामसुन्दरी देवी के निधन से ऐसा प्रतीत होता है जैसे मौन, किंतु सशक्त चेतना हमारे बीच से विदा हो गई हों।

बिहार के सबसे बड़े न्यास की थीं न्यासी

दरभंगा राज परिवार की सदस्य कुमुद सिंह ने बताया कि महारानी अधिरानी कामसुन्दरी देवी बिहार के सबसे बड़े न्यास कामेश्वर सिंह रिलीजियस ट्रस्ट की अंतिम जीवित ट्रस्टी थीं। वर्तमान में इस ट्रस्ट के पास एक लाख एकड़ जमीन और दो हजार करोड़ का सोना है। इसके अलावा इस ट्रस्ट के पास देश-विदेश में 108 मंदिर हैं। इनमें से एक मंदिर पाकिस्तान में भी है। इन मंदिरों के संचालन के लिए ट्रस्ट की ओर से जमीन दान में दी गयी है। इस ट्रस्ट के दो ट्रस्टियों का निधन पूर्व में हो चुका है।

राज परिवार के पास 10 हजार करोड़ की संपत्ति

दरभंगा राज परिवार के पास वर्तमान में 10 हजार करोड़ से भी अधिक की संपत्ति है। राज परिवार के सूत्रों के अनुसार, इनमें कामेश्वर सिंह रिलीजियस ट्रस्ट के अलावा निजी संपत्ति भी है। वर्तमान में दरभंगा राज परिवार की जमीन देश के कई हिस्सों में है। अब कामेश्वर सिंह रिलीजियस ट्रस्ट के होने वाले नए ट्रस्टी इस संपत्ति की देखभाल करेंगे।

सामाजिक कार्यों के लिए विख्यात थीं महारानी

महारानी कामसुंदरी देवी को सामाजिक और परोपकारी कार्यों के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। उन्होंने अपने पति महाराज कामेश्वर सिंह की स्मृति में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी। इसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में कई काम किए गए। इससे समाज के कमजोर वर्गों को लाभ मिला।

मधुबनी जिले के मंगरौनी में हुआ था महारानी का जन्म

महारानी कामसुन्दरी देवी का जन्म मधुबनी जिले के मंगरौनी में पंडित हंसमणि झा के घर चौथी पुत्री के रूप में 22 अक्टूबर 1932 को हुआ था। उनका विवाह पांच मई 1943 को हुआ था। महारानी कामसुंदरी देवी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का पहले ही निधन हो चुका है।

गणमान्य लोगों ने पहुंचकर दी श्रद्धांजलि

महारानी कामसुंदरी देवी के निधन की सूचना मिलने पर राज्य सरकार की ओर से उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल व समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी सहित डीएम कौशल कुमार, संस्कृत विवि के कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पाण्डेय व कुलसचिव प्रो. ब्रजेशपति त्रिपाठी ने श्रद्धांजलि दी। इनमें संस्कृत विवि के पूर्व कुलपति पं. रामचन्द्र झा, पं. शशिनाथ झा, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम डब्ल्यूआईटी के निदेशक प्रो. अजयनाथ झा, पंकज ठाकुर आदि ने श्रद्धांजलि दी।

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Nishant Nandan

लेखक के बारे में

Nishant Nandan
एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे निशांत नंदन डिजिटल पत्रकारिता में आने से पहले इलेक्ट्रॉनिक/प्रसारण मीडिया में लंबे समय तक काम कर चुके हैं। निशांत ने अपने करियर की शुरुआत ETV बिहार से की थी। इसके बाद वो मौर्य न्यूज, आर्यन न्यूज, न्यूज वर्ल्ड इंडिया जैसे संस्थानों में अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर चुके हैं। साल 2018 में इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के साथ डिजिटल पत्रकारिता का सफर शुरू करने के बाद निशांत साल 2021 में लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े। निशांत मूल रूप से बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले हैं। आरा में शुरुआती शिक्षा के बाद इन्होंने नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। और पढ़ें
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