बिहार चुनाव: मगध और शाहाबाद में वाम का किला ढहा, भाकपा का तीसरी बार खाता नहीं खुला
वामदलों में भाकपा माले, भाकपा एवं माकपा इस चुनाव में महागठबंधन के घटक दलों में शामिल थी। तीनों वामदलों ने 33 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे। इनमें मात्र तीन उम्मीदवार ही चुनाव जीतने में सफल रहे।
बिहार विधानसभा चुनाव में वामदलों का मगध और शाहाबाद क्षेत्र में बना मजबूत किला ढह गया। भाकपा माले का बिहार में उद्भव एवं विकास ही शाहाबाद क्षेत्र से हुआ था। सारण और बिहार के लेनिनग्राद बेगूसराय में भी वामदलों को सफलता नहीं मिली। पिछली बार वामदलों ने 16 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार तीन पर सिमट गई। वामदल अपने कोर वोटरों में इजाफा नहीं कर पाए। हालांकि, वामदलों के वोट में बढ़ोतरी हुई लेकिन उसे सीट में बदल पाना मुश्किल हो गया।

वामदलों में भाकपा माले, भाकपा एवं माकपा इस चुनाव में महागठबंधन के घटक दलों में शामिल थी। तीनों वामदलों ने 33 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे। इनमें मात्र तीन उम्मीदवार ही चुनाव जीतने में सफल रहे। इनमें भाकपा माले के दो और माकपा के एक उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे जबकि 30 उम्मीदवार चुनाव हार गए।
2020 के चुनाव में भाकपा माले ने 19 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे और इनमें 12 चुनाव जीतने में सफल रहे थे। मगध क्षेत्र में घोसी, अरवल, पालीगंज और फुलवारी तथा शहाबाद में डुमरांव, अगिआंव, तरारी एवं काराकाट में विधायक थे। इनमें सिर्फ पालीगंज और काराकाट में ही सफलता मिल सकी बाकी जगहों पर हार का सामना करना पड़ा। जबकि सीवान में दो जीरादेई व दरौली एवं चंपारण के सिकट और कटिहार के बलरामपुर में विधायक थे, जहां उन्हें सीटिंग सीट पर असफलता हासिल हुई। भाकपा माले के विधायक दल के नेता महबूब आलम को भी हार का सामना करना पड़ा।
भाकपा का तीसरी बार खाता नहीं खुला
बिहार विधानसभा चुनाव में भाकपा का खाता तक नहीं खुला। इस चुनाव में भाकपा ने 9 उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी को महागठबंधन की ओर से 6 सीटें ही आवंटित की गई थी किंतु भाकपा ने तीन अतिरिक्त उम्मीदवार देकर महागठबंधन के अंदर ही फ्रेंडली फाइट की स्थिति पैदा कर दी। बछवाड़ा सीट एक महत्वपूर्ण बैटल ग्राउंड बन गया जहां कांग्रेस के उम्मीदवार उसके सामने डटे हुए थे और प्रियंका गांधी तक अपने प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर चुकी थी। वहीं, इस चुनाव में भाकपा के राज्य सचिव के पुत्र के चुनाव मैदान में होने को लेकर पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह चर्चा खूब थी।
नतीजतन, इस चुनाव में तीसरी बार भाकपा का खाता नहीं खुला और ऐसा रिकार्ड बनाई जो ऐतिहासिक है। इसके पहले 1952 और 1915 के चुनाव में भाकपा को बिहार में एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी। माकपा के दो विधायकों में मात्र एक विधायक ही जीत कर पुन: वापस सदन में पहुंचे है। हालांकि, माकपा ने चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।



