
सारण में सूखती नदियां, सिसकती अर्थव्यवस्था
रों की रोज़ी-रोटी सारण में केवल पानी की कमी का सवाल नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बना फ़ोटो 6 मढ़ौरा क्षेत्र से गुजरने वाली डबरा नदी पेज पांच की लीड या पांच पेज हो तो उसकी लीड लगाएं...
छपरा, नगर प्रतिनिधि। सारण की पहचान कभी उसकी नदियों से होती थी। गंगा, गंडक और घाघरा जैसी विशाल नदियों के साथ-साथ सरयू, दाहा, कटेया, जोंक, माही , सुखमयी, तैल और दर्जनों छोटी-बड़ी स्थानीय नदियां- धाराएं ,खनुआ नाला, आहर-पईन और मौसमी नाले इस जिले की सामाजिक और आर्थिक रीढ़ थे। इन्हीं जलधाराओं के किनारे गांव बसे, खेतों को पानी मिला और पीढ़ियों से लोगों की आजीविका चलती रही। मछुआरों की नावें पानी चीरती थीं, धोबी नदी घाटों पर कपड़े धोते थे, नाविक लोगों को एक किनारे से दूसरे किनारे पहुंचाते थे और स्थानीय बाजारों में ताजी मछलियों की खुशबू फैलती थी लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह तस्वीर तेजी से धुंधली होती चली गई।
जलवायु परिवर्तन, लगातार घटती वर्षा, नदियों पर अतिक्रमण, अवैज्ञानिक तटबंध निर्माण, अनियंत्रित बालू खनन और पारंपरिक जल संरचनाओं की उपेक्षा ने मिलकर सारण की नदियों को लगभग सूखा दिया है। इसका प्रभाव केवल पर्यावरणीय असंतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर जिले की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। नदियों के सूखने के साथ ही उनसे जुड़े पारंपरिक पेशे भी संकट में आ गए हैं और हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी पर प्रश्नचिह्न लग गया है।आज हालात यह हैं कि जिन नदी घाटों पर कभी सुबह से शाम तक हलचल रहती थी, वहां अब रेत और मिट्टी उड़ती दिखाई देती है। पानी के अभाव ने नदियों से जुड़े पूरे आर्थिक तंत्र को तोड़ दिया है। मछली पालन से लेकर नौका परिचालन तक, धोबीघाट से लेकर नदी किनारे लगने वाले हाट-बाजार तक, हर कड़ी कमजोर पड़ चुकी है। इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। नदियों का सूखना आज सारण में केवल पानी की कमी का सवाल नहीं, बल्कि पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। आमदनी घटने से वैकल्पिक रोजगार की तलाश में पलायन शुरू सारण के डोरीगंज, मकेर, मढ़ौरा, दिघवारा, सोनपुर, मांझी, एकमा और तरैया जैसे इलाकों में रहने वाले मछुआरा समुदाय के लिए नदी केवल पानी का स्रोत नहीं थी, बल्कि जीवन का आधार थी। स्थानीय नदियों और उनकी सहायक धाराओं में साल भर मछली मिलती थी। इससे मछुआरों की आमदनी होती थी और आसपास के बाजारों में सस्ती व ताजी मछली उपलब्ध रहती थी। मछली पकड़ना, बेचना और उससे जुड़े काम जैसे जाल की मरम्मत, नाव की देखरेख पूरी एक आर्थिक श्रृंखला को जीवित रखते थे।मांझी प्रखंड के मछुआरे रामबाबू सहनी बताते हैं कि कुछ साल पहले तक सरयू नदी में जाल डालते ही मछली मिल जाती थी। अब हालत यह है कि कई मीटर तक नदी के तल पर पैदल चलने के बाद भी पानी नहीं मिलता। जहां थोड़ा बहुत पानी बचा है, वहां मछलियां नाम मात्र की रह गई हैं। पानी कम होने से मछलियों का प्राकृतिक प्रजनन चक्र टूट गया है। कई प्रजातियां या तो पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं या बेहद दुर्लभ हो गई हैं। इसका सीधा असर मछुआरों की आमदनी पर पड़ा है। कई परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है।आमदनी घटने के कारण मछुआरों को वैकल्पिक रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ रहा है। कोई ईंट-भट्ठों पर मजदूरी कर रहा है तो कोई दिल्ली, पंजाब या हरियाणा की ओर निकल गया है। इससे न सिर्फ परिवार बिखर रहे हैं, बल्कि गांवों की सामाजिक संरचना भी प्रभावित हो रही है। मछली की कमी से स्थानीय बाजारों में कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे आम उपभोक्ता भी प्रभावित हो रहा है। जाल बनाने वालों की कारीगरी पर ताला नदियों से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पेशा मछली पकड़ने के जाल बनाने का था। सारण के रिविलगंज, मांझी और आसपास के कई प्रखंडों में यह काम पीढ़ियों से होता आ रहा था। जाल बनाने वाले कारीगर मछुआरों की जरूरत के अनुसार अलग-अलग किस्म के जाल तैयार करते थे। यह पारंपरिक हुनर न केवल रोजगार का साधन था, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा भी था। डोरीगंज के पास रहने वाले शिवनाथ बिंद बताते हैं कि पहले हर मौसम में जाल की मांग रहती थी। मछुआरे पुराने जाल की मरम्मत कराते थे और नए जाल भी बनवाते थे। अब जब नदी में मछली ही पर्याप्त नहीं है, तो जाल कौन खरीदे। उनकी आय लगभग खत्म हो चुकी है। परिवार चलाने के लिए उन्हें खेतों में मजदूरी करनी पड़ रही है। पारंपरिक कारीगरी धीरे-धीरे दम तोड़ रही है, और इसके साथ ही एक सांस्कृतिक विरासत भी खत्म होने के कगार पर है। रजक समुदाय: मुफ्त पानी से लेकर मोटर तक सारण के ग्रामीण इलाकों में रजक समुदाय की आजीविका भी नदियों पर निर्भर थी। नदी का बहता पानी कपड़े धोने के लिए मुफ़्त, सुलभ और पर्याप्त होता था। सुबह-सुबह धोबी घाटों पर पहुंच जाते थे और दिन भर का काम आसानी से हो जाता था। लेकिन नदियों के सूखने के बाद यह व्यवस्था पूरी तरह बदल गई है। रिविलगंज प्रखंड के राजकुमार धोबी बताते हैं कि पहले नदी में भरपूर पानी रहता था, लेकिन अब पानी बहुत कम हो गया है। मजबूरी में घर पर मोटर लगाकर बोरिंग का पानी इस्तेमाल करना पड़ता है। बिजली का खर्च अलग है, मोटर की मरम्मत का खर्च अलग। लागत बढ़ गई है, लेकिन ग्राहकों से कपड़े धोने की वही पुरानी कीमत मिल पाती है। नतीजतन मुनाफा घट गया है। कई छोटे धोबी अब यह पेशा छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं और दिहाड़ी मजदूरी या अन्य छोटे कामों की ओर रुख कर रहे हैं। नौका परिचालन कम होने से नाविक बेरोजगार नदियों के सूखने का एक बड़ा असर नौका परिचालन पर भी पड़ा है। कभी सारण की नदियों पर छोटी-बड़ी नावों के साथ स्टीमर भी चला करते थे। लोग रोजमर्रा के काम, बाजार, शिक्षा और रिश्तेदारी के लिए इन्हीं जलमार्गों का इस्तेमाल करते थे। बरसात के दिनों में तो नावें ही आवागमन का मुख्य साधन होती थीं। इससे नाविकों को नियमित रोजगार मिलता था और परिवहन सस्ता व सुलभ रहता था।रिविलगंज के बैजू टोला निवासी ठाकुर महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि दो दशक पहले रिविलगंज थाना घाट से स्टीमर पर चढ़कर सीधे सिताब दियारा उतरा जाता था। अब सरयू नदी में पानी कम रहने के कारण स्टीमर से यात्रा इतिहास बन चुकी है। लोगों को मांझी होकर जयप्रकाश सेतु के रास्ते जाना पड़ता है, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं। यदि नदी में समुचित पानी रहता, तो कम खर्च में और कम समय में गांव पहुंचा जा सकता था। सोनपुर के नाविक महेश निषाद बताते हैं कि नदी में पानी कम है तो नाव कैसे चले। पहले दिन भर में चार-पांच चक्कर लग जाते थे, जिससे परिवार का खर्च चल जाता था। अब महीनों से नाव किनारे पड़ी है। न कोई वैकल्पिक रोजगार है और न ही कोई ठोस सरकारी सहायता। कई नाविक परिवार कर्ज में डूब चुके हैं और जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। स्थानीय बाजारों पर भी असर नदियों के सूखने का असर केवल इन पारंपरिक पेशों तक सीमित नहीं है। मछली की आवक कम होने से स्थानीय हाट-बाजारों में कारोबार घट गया है। मछली बेचने वाले, बर्फ सप्लायर, छोटे दुकानदार और परिवहन से जुड़े लोग सभी प्रभावित हैं। नदी किनारे लगने वाले बाजारों की रौनक फीकी पड़ गई है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो गई है। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. सतीश मानते हैं कि नदियों का सूखना केवल जल संकट नहीं, बल्कि एक गहरा आर्थिक और सामाजिक संकट है। पानी कम होने से खेती प्रभावित हो रही है, जिससे किसानों की आय घट रही है। इसका असर ग्रामीण मांग और बाजार पर पड़ रहा है। नदियां जब सूखती हैं तो केवल पानी नहीं जाता, बल्कि पूरा जीवन तंत्र प्रभावित पर्यावरणविद डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, नदियां जब सूखती हैं तो केवल पानी नहीं जाता, बल्कि पूरा जीवन तंत्र प्रभावित होता है -रोजगार, स्वास्थ्य और पोषण सब पर असर पड़ता है। सरकार की ओर से ‘जल-जीवन-हरियाली’ और ‘नमामि गंगे’ जैसी योजनाएं जरूर चलाई जा रही हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीनी स्तर पर इनके परिणाम सीमित नजर आते हैं। नदियों से अतिक्रमण हटाना, पारंपरिक जलधाराओं को पुनर्जीवित करना और आहर-पईन जैसी संरचनाओं को संवारना अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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