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नदियों का सिमटता आंचल और बढ़ रहा सारण का संकट

नदियों का सिमटता आंचल और बढ़ रहा सारण का संकट

संक्षेप:

सारण की नदियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जिससे जलस्तर गिर रहा है और जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। मछलियों की प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं और मानव स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट मानव निर्मित है और इसे रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है।

Jan 06, 2026 09:21 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, छपरा
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छपरा, नगर प्रतिनिधि।सारण की धरती सदियों से नदियों की गोद में पली-बढ़ी है। गंडक, घाघरा और उनकी सहायक नदियां केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि खेती, मछली पालन, जैव विविधता और जनस्वास्थ्य की जीवनरेखा रही हैं लेकिन बीते कुछ वर्षों में इन नदियों का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी अविरल बहाव और कलकल धारा के लिए पहचानी जाने वाली नदियां आज कई स्थानों पर सिकुड़ चुकी हैं। कहीं धारा टूट गई है, तो कहीं रेत के टीले उभर आए हैं। जय गोविंद उच्च विद्यालय दिघवारा के भूगोल के प्राध्यापक डॉ विनय प्रताप सिंह ने कहा कि कभी नदियों की कल-कल ध्वनि से जागने वाला सारण आज उसी खामोशी से डरने लगा है।सारण

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की नदियां आज एक मौन चेतावनी दे रही है। उनका सूखना केवल पानी का संकट नहीं, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और आजीविका पर मंडराता खतरा है। जलीय जीवों से लेकर इंसान तक, हर कोई इस संकट की कीमत चुका रहा है। जलीय जंतुओं पर गहराता संकट और जीवन चक्र पर सीधा प्रहार नदियों के सिकुड़ने का सबसे पहला और सबसे गहरा असर जलीय जंतुओं पर पड़ा है। गंडक, घाघरा और उनसे जुड़ी बूढ़ी गंडक, सरयू समेत सहायक नदियों में जलस्तर गिरने से मछलियों, कछुओं, घोंघों, केकड़ों और अन्य जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास तेजी से नष्ट हो रहा है। डोरीगंज के रमेश सहनी, उमेश सहनी, रामनरेश बिंद व अन्य मछुआरों के अनुसार, पहले साल भर नदी में पर्याप्त पानी रहता था। इससे मछलियों का प्रजनन स्वाभाविक रूप से होता था और आजीविका भी सुरक्षित रहती थी। अब गर्मी शुरू होते ही कई हिस्सों में नदी उथली हो जाती है। अंडे देने के लिए जरूरी शांत और गहरे जल क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ रमेश चन्द्र बताते हैं कि कम पानी में तापमान तेजी से बढ़ता है और घुलित ऑक्सीजन घटती है। इसका सीधा असर मछलियों की सेहत पर पड़ता है। लुप्त होती मछलियां, अदृश्य लेकिन गंभीर क्षति सारण की नदियां कभी देशी मछलियों की विविधता के लिए जानी जाती थीं। रोहू, कतला और मृगल के साथ-साथ सौर, टेंगरा, पाठी, बाम, सिंगही, करौती और गेंजर जैसी स्थानीय प्रजातियां आम थीं। मछुआरों का कहना है कि अब इनमें से कई प्रजातियां या तो बेहद कम रह गई हैं या पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। टेंगरा और पाठी जैसी छोटी देशी मछलियां जो पोषण की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी थीं, अब बाजारों में मुश्किल से दिखती हैं। बाम और सौर जैसी मछलिययां जो साफ और बहते पानी की पहचान मानी जाती थीं, अब दुर्लभ हो चुकी हैं।पर्यावरण जानकार सुभाष कुमार के अनुसार, स्थानीय प्रजातियों का खत्म होना केवल मछुआरों की आजीविका का संकट नहीं है। जैव विविधता पर असर: एक पूरी श्रृंखला कमजोर नदियां केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र हैं। सारण में नदियों के संकट का असर मछलियों से आगे बढ़कर पूरी जैव विविधता पर पड़ रहा है। नदी किनारे पाए जाने वाले कछुए, मेंढक, घोंघे और अन्य जलीय जीव तेजी से कम हो रहे हैं।जल पक्षियों की संख्या में भी स्पष्ट गिरावट दर्ज की जा रही है। कभी सर्दियों में सारण के नदी क्षेत्रों और चौर इलाकों में प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा आम दृश्य था। अब ये दृश्य दुर्लभ होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जल और भोजन की कमी के कारण पक्षी अन्य क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं।नदी तटों पर उगने वाली घास, झाड़ियां और पेड़-पौधे कमजोर पड़ रहे हैं। अविरल बहाव थमने से हरियाली पर गहरा असर पर्यावरणविद डॉ संजय बताते है कि नदी का निरंतर बहाव आसपास के इलाकों को प्राकृतिक नमी प्रदान करता है। जब यह बहाव बाधित होता है, तो खेतों, बागानों और चारागाहों की हरियाली प्रभावित होती है। सारण के किसान सुहैल अहमद, नशीर खान व अन्य का कहना है कि पहले नदी किनारे की जमीन स्वाभाविक रूप से उपजाऊ रहती थी। अब उसी जमीन पर खेती के लिए अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ती है।भूजल पुनर्भरण घटने से हैंडपंप, कुएं और चापाकल सूखने लगे हैं। मानव स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव: चुपचाप बढ़ता खतरा सूखती और प्रदूषित नदियों का असर सीधे मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। कम बहाव के कारण नदी का पानी अधिक समय तक ठहरा रहता है, जिससे मच्छरों का प्रजनन बढ़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ सुनील कुमार के अनुसार, इससे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।पेयजल की गुणवत्ता गिरने से पेट संबंधी रोग, त्वचा संक्रमण और बच्चों में कुपोषण की समस्या सामने आ रही है। कई ग्रामीण परिवार मजबूरी में दूषित जल का उपयोग कर रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि बढ़ता तापमान और नमी की कमी से हीट स्ट्रोक, सांस संबंधी बीमारियाँ और मानसिक तनाव के मामले भी बढ़ रहे है। चेतावनी के साथ समाधान भी स्थानीय पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नदियों का संकट पूरी तरह मानव निर्मित है। अनियंत्रित बालू खनन, तटवर्ती अतिक्रमण, जल का अत्यधिक दोहन और संरक्षण की कमी ने हालात को गंभीर बनाया है।वे अविरल जल प्रवाह सुनिश्चित करने, बालू खनन पर सख्त नियंत्रण, तटवर्ती क्षेत्रों में व्यापक पौधरोपण और जल संरक्षण योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की सलाह देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नदी संरक्षण को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति से जोड़ना अब समय की मांग है।