
श्रीकृष्ण व सुदामा की मित्रता समाज के लिए मिसाल
बुढ़वा शिवजी मंदिर में भागवत महापुराण कथा का आयोजन हुआ। आचार्य रणधीर ओझा ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया, जो यह दर्शाता है कि मित्रता में धन दौलत का कोई महत्व नहीं होता। उन्होंने बताया कि आत्मा अमर है और मृत्यु के समय भगवान का ध्यान करने से जीवन का उद्धार होता है।
प्रवचन हमें यह शिक्षा मिलती है कि मित्रता में कभी धन दौलत आड़े नहीं आती है जन्म, जरा और मृत्यु शरीर के धर्म है, आत्मा के नहीं, आत्मा अजर-अमर फोटो संख्या- 14, कैप्सन- मंगलवार को चरित्रवन में श्रीमद्भागवत कथा सुनती महिलाएं। बक्सर, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। चरित्रवन स्थित बुढ़वा शिवजी मंदिर में मंगलवार को सातवें दिन भी भागवत महापुराण कथा का वाचन किया गया। मामा जी के कृपापात्र आचार्य रणधीर ओझा ने श्रीकृष्ण भक्त व बाल सखा, सुदामा चरित्र व शुकदेव द्वारा राजा परीक्षित को दी गई उपदेश का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण व सुदामा की मित्रता समाज के लिए मिसाल है।

सुदामा के आने की खबर सुनकर श्री कृष्ण व्याकुल होकर दरवाजे की तरफ दौड़ते हैं। ‘पानी परात को हाथ छूवो नाहीं, नैनन के जल से पग धोए।’ श्रीकृष्ण अपने बाल सखा सुदामा की आवभगत में इतने विभोर हो गए कि द्वारका के नाथ हाथ जोड़कर औरंग लिपट कर जल भरे नेत्रों से सुदामा का हालचाल पूछने लगे। इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मित्रता में कभी धन दौलत आड़े नहीं आती। आचार्य श्री ने आगे शुकदेव परीक्षित की कथा सुनाते हुए कहा कि शुकदेव जी ने परीक्षित को अंतिम उपदेश देते हुए कहा कि कलयुग में कोई दोष होने पर भी एक लाभ है। इस युग में जो भी श्रीकृष्ण का कीर्तन करेगा। उसके घर काल कभी प्रवेश नहीं करेगा। मृत्यु के समय परमेश्वर का ध्यान और नाम लेने से प्रभु जीव को अपने स्वरूप में समाहित कर लेते हैं। उन्होंने बताया कि जन्म, जरा और मृत्यु शरीर के धर्म है, आत्मा के नहीं। आत्मा अजर-अमर है। इसलिए मानव को पशु बुद्धि त्याग कर अपने मन में भगवान की स्थापना करनी चाहिए। इस मौके पर पवन दुबे, प्रेम मिश्रा, मृत्युंजय तिवारी, पंकज उपाध्याय व विनोद सिंह उपस्थित रहे।

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