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सत्ता के बेलगाम होने पर बदलता है डुमरांव के वोटरों का मिजाज

संक्षेप: सत्ता संग्रामसत्ता संग्राम ----------- जुगलबंदी कांग्रेस का गढ़ रहे डुमरांव में समय के साथ होता रहा राजनीतिक बदलाव जेपी आंदोलन के बाद कांग्रेस के गढ़ में वामपंथी दल की हुई धमाकेदार इंट्री 07 बार...

Tue, 14 Oct 2025 08:31 PMNewswrap हिन्दुस्तान, बक्सर
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सत्ता के बेलगाम होने पर बदलता है डुमरांव के वोटरों का मिजाज

सत्ता संग्राम ----------- जुगलबंदी कांग्रेस का गढ़ रहे डुमरांव में समय के साथ होता रहा राजनीतिक बदलाव जेपी आंदोलन के बाद कांग्रेस के गढ़ में वामपंथी दल की हुई धमाकेदार इंट्री 07 बार कांग्रेस का रहा है डुमरांव विधानसभ की सीट पर कब्जा फोटो संख्या- 36, कैप्सन- डुमरांव का बांके बिहारी मंदिर। अजय सिंह डुमरांव। सत्ता जब-जब बेलगाम हुई तब-तब डुमरांव विधानसभा करवट बदलता रहा है। राजा-महाराजाओं का शहर डुमरांव भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की जन्मस्थली है। डुमरांव भले ही ऊपर से शांत और सामान्य सा दिखता है। लेकिन, राजनीतिक चेतना से यह शहर पूरी तरह लैश है। कभी डुमरांव कांग्रेस का गढ़ माना जाता था।

लेकिन, वर्तमान में कांग्रेस का गढ़ पूरी तरह ढह चुका है। गौरतलब है कि विधानसभा के मतदान के दौरान यहां की जनता प्रत्याशियों की भीड़ में क्षेत्र के भविष्य की तलाश करती है। यही कारण है कि डुमरांव समय-समय पर करवट बदलता रहता है। डुमरांव पुराना और ऐतिहासिक शहर है। भारत रत्न उस्ताद बिस्मल्लाह खा़ं की जन्मस्थली रही है। राजगढ़ स्थित बांके बिहारी मंदिर आज भी उस्ताद की यादों को संजोए चट्टान की तरह खड़ा है। शहर की चाहत यह कि उनके इतिहास और विभूतियों से जुड़े स्थलों को संजो कर रखा जाये। लंबे समय तक उपेक्षित रहे विभूतियों को सम्मान देने की अब पहल शुरु हुई है। डुमरांव विधानसभा में कांग्रेस का शुरु से दबदबा वर्ष 1951 में डुमरांव को विधानसभा का दर्जा मिला था। डुमरांव विधानसभा सीट पर कांग्रेस का शुरु से दबदबा था। वर्ष 1951 से 1985 के बीच कांग्रेस का कब्जा रहा। 74 के जेपी आंदोलन के दौरान डुमरांव भी कांग्रेस विरोधी लहर से अछूता नहीं रह सका था। 1977 के चुनाव में जनता ने कांग्रेस को नकारते हुए सीपीआई के रामाश्रय सिंह के सिर जीत का सेहरा बांधा था। पुनः 1980,1981 और 1985 के चुनाव में जनता ने कांग्रेस पर भरोसा जताया था। इसके बाद डुमरांव की जनता का कांग्रेस से लगभग मोहभंग हो गया। उसके बाद जनता ऐसी बिदकी कि कांग्रेस की नींव हिल गई। पिछले सात चुनावों में निर्दलीय से लेकर अन्य दलों के साथ यहां की जनता खड़ी नजर आई। राजनीतिक समीकरणों में जबरदस्त बदलाव आया वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में समय के साथ डुमरांव के राजनीतिक समीकरणों में जबरदस्त बदलाव आया। यहां महागठबंधन ने माले प्रत्याशी डॉ. अजीत कुशवाहा को मैदान में उतारा था। इस चुनाव में जनता खामोश थी। लेकिन, अंदर ही अंदर राजनीतिक समीकरण ऐसा बना कि वोटरों का मिजाज बदला और माले की जीत ने सभी को दंग कर दिया। यह भी सच है कि विधानसभा चुनाव के समय यहां की जनता राज्य में होने वाले राजनीतिक परिवर्तनों का आकलन करते हुए अपना फैसला लेती है। इन फैसलों के पीछे राज्य और डुमरांव के बेहतर भविष्य की छटपटाहट छिपी रहती है। राज्य में गठबंधन को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज डुमरांव में आगामी 6 नवंबर को मतदान की तिथि की घोषणा हो चुकी है। नामांकन की प्रक्रिया चल रही है। परंतु अभी तक जनता खुलकर सामने नहीं आ रही है। आमलोग मानते है कि अभी राज्य में गठबंधन को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। दलों की स्थिति और प्रत्याशियों की औपचारिक घोषणा के बाद ही जनता का रुख सामने आएगा। हालांकि पहले के चुनावों की अपेक्षा इसबार मतदाता विकास के सवाल को मुद्दा बनाने की बात कह रहे हैं। लेकिन, डुमरांव विधानसभा के चुनाव में दलितों, पिछड़ो और अतिपिछड़ों की जुगलबंदी ही बदलाव की कहानी गढ़ती है।