नालंदा के 5 गांवों में रंगों की बौछार नहीं, ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं हर कोई
नालंदा के पांच गांवों में होली का त्योहार रंगों से नहीं, बल्कि भक्ति से मनाया जाता है। यहां 54 वर्षों से चल रही परंपरा के तहत होली के दिन चूल्हे नहीं जलते और लोग बासी भोजन का सेवन करते हैं। इस दौरान 24 घंटे का अखंड कीर्तन होता है। यह अनूठी परंपरा शांति और प्रेम का संदेश देती है।

अनोखी होली : नालंदा के 5 गांवों में रंगों की बौछार नहीं, ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं हर कोई होली के दिन न उड़ता है गुलाल और न जलते हैं चूल्हे, सुनायी देती है हरे राम हरे कृष्ण की गूंज 54 सालों से निभाई जा रही अनोखी रीत, फगुआ के गीतों की जगह 24 घंटे का होता है अखंड कीर्तन होलिका दहन से शुरू होता है अनुष्ठान, कीर्तन खत्म होने तक घरों में धुआं करना रहता है वर्जित मांस-मदिरा और नमक से तौबा, एक दिन पहले बना बासी भोजन कर पर्व मनाते हैं ग्रामीण फोटो होली01: पतुआना का कालिका स्थान, जहां होली के मौके पर 24 घंटे का होता है अखंड कीर्तन।
होली02: राजाकुआं में संत बाबा का आश्रम, जिनकी प्रेरणा से अनोखी होली मनाते हैं ग्रामीण। बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। होली का नाम आते ही रंग-गुलाल, पुआ-पकवान और फगुआ के गीतों की तस्वीर जेहन में उभरती है। लेकिन, नालंदा जिला मुख्यालय से सटे पांच गांवों में होली का रंग बिल्कुल अलग है। होली के दिन यहां न रंग उड़ता है और न ही घरों में चूल्हे जलते हैं। लोग शुद्ध शाकाहारी और बासी भोजन करते हैं। फगुआ के गीतों की जगह ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ की धुन गूंजती है। करीब 54 वर्षों से चली आ रही इस शांतिपूर्ण और अनोखी परंपरा को पतुआना, बासवन बिगहा, ढीबरापर, नकटपुरा और डेढ़धारा गांव के लोग आज भी पूरी श्रद्धा से निभा रहे हैं। रंग में भंग न हो, इसलिए अखंड कीर्तन: त्योहार के उत्साह में कोई विवाद न हो, इसके लिए होलिका दहन की शाम से ही इन गांवों में 24 घंटे का अखंड कीर्तन शुरू हो जाता है। ग्रामीण अनुष्ठान शुरू होने से पहले घरों में मीठा भोजन (पकवान) तैयार कर रख लेते हैं। जब तक कीर्तन का समापन नहीं होता, तब तक घरों में चूल्हा जलाना वर्जित रहता है। यहां तक कि अधिकांश लोग इस दौरान नमक का भी सेवन नहीं करते हैं। हालांकि, कीर्तन समाप्त होने के अगले दिन (बसिऔरा के दिन) ग्रामीण रंगों की होली का आनंद जरूर उठाते हैं। संत बाबा ने दिखाई राह तो शुरू हुई परंपरा: पतुआना निवासी पूर्व वार्ड पार्षद जागेश्वर यादव, समाजसेवी नीतीश कुमार, डोमन यादव, छोटे यादव, बासवन बिगहा के मनोज कुमार व अन्य बताते हैं कि पांच दशक पहले होली के मौके पर इन गांवों में भारी विवाद और मारपीट होती थी। इस रंग में भंग से छुटकारा पाने के लिए सिद्ध पुरुष (संत बाबा) ने ग्रामीणों को ईश्वर भक्ति की राह दिखाई थी। उन्हीं का आदेश मानकर होली के मौके पर अखंड कीर्तन की यह परंपरा शुरू हुई, जिसने गांवों का माहौल हमेशा के लिए शांत कर दिया। कौन थे संत बाबा: ग्रामीणों के अनुसार, संत बाबा शहर के इमादपुर के रहने वाले थे। सांसारिक विवादों से दूर होने के लिए उन्होंने कम उम्र में ही घर त्याग दिया था। वे पतुआना और बाद में राजाकुआं के खंधे (मैदान) में रहकर तपस्या करने लगे। दो अक्टूबर 2000 को उन्होंने शरीर त्याग दिया। आज उनके आश्रम और समाधि स्थल पर भव्य मंदिर बन चुका है, जहां ग्रामीण होली के दिन माथा टेकते हैं। अनोखी होली नालंदा के तेतरावां गांव में भगवान बुद्ध भी खेलते हैं होली, देसी घी और ‘रवे’ के लेप से शुरू होता है फाग गांव में स्थापित काले पत्थर की विशाल पाषाण प्रतिमा की पूजा के साथ रंगोंत्सव का होता है आगाज रंग खेलने से पहले प्रतिमा को चढ़ाई जाती है सफेद चादर, फिर लगता है अबीर और गुलाल भगवान बुद्ध को ‘बाबा भैरव’ मानकर पूजते हैं ग्रामीण, मंदिर में भजन-कीर्तन कर मांगते हैं सुख-शांति पुरानी बौद्ध परंपराओं से जुड़ा है होली का यह रूप, देता है आपसी प्रेम और सौहार्द का संदेश फोटो तेतरावां : तेतरावां में स्थापित पाल कालीन भगवान बुद्ध (बाबा भैरव) की प्रतिमा। (फाइल फोटो) बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। होली का त्योहार यूं तो हर तरफ हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन, नालंदा के एक गांव में इसे मनाने का तरीका बिल्कुल जुदा और अलौकिक है। जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित तेतरावां एक ऐसा गांव है, जहां ग्रामीण आपस में रंग खेलने से पहले भगवान बुद्ध के साथ होली खेलते हैं। यहां सदियों से यह अनूठी परंपरा चली आ रही है। जब तक भगवान बुद्ध को रंग-गुलाल नहीं लग जाता, तब तक गांव में कोई होली नहीं खेलता। मीठा रावा और घी का लगता लेप: तेतरावां गांव में भगवान बुद्ध की काले पत्थर की विशाल और प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। स्थानीय ग्रामीण इन्हें ‘बाबा भैरव’ के नाम से पूजते हैं। होली के दिन सबसे पहले प्रतिमा क़ई की अच्छी तरह से सफाई की जाती है। उसके बाद विधिवत प्रतिमा पर मीठा रावा और देसी घी का लेप लगाया जाता है। बेशकीमती पत्थर की चमक बरकरार रहे, इसके लिए भगवान को सफेद चादर ओढ़ाई जाती है। पवित्र रस्म के बाद ही ग्रामीण पूरे उत्साह के साथ प्रतिमा पर रंग और अबीर-गुलाल लगाकर होली का आगाज करते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़ा है इतिहास: स्थानीय निवासी राजकुमार प्रसाद सिंह, रामू यादव और राजीव रंजन पाण्डेय बताते हैं कि यह परंपरा पालकाल से चली आ रही है। जानकारों के अनुसार, जब प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ाई होती थी, उस समय मूर्तिकला का मुख्य केंद्र यही तेतरावां गांव हुआ करता था। बुद्ध की यह प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा में है। कुछ लोगों का तो यहां तक मानना है कि होली की शुरुआत पुरानी बौद्ध परंपराओं से ही हुई थी, जिसे बाद में फाल्गुन उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। भजन-कीर्तन से होता है समापन: बुद्ध के साथ होली खेलने के बाद गांव वाले एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। दिन भर रंगों की मस्ती के बाद मंदिर परिसर में विशेष रूप से भजन-कीर्तन किया जाता है। ग्रामीण भगवान बुद्ध के समक्ष शीश नवाकर पूरे साल गांव में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने की कामना करते हैं। यह अनूठी परंपरा आज भी समाज को आपसी प्रेम और सौहार्द का बड़ा संदेश दे रही है। बॉक्स : डीजे के शोर में गुम हुए फगुआ के सुर, बदल गया होली का असली रंग और स्वाद बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। कभी गांवों की चौपालों पर ढोलक-मंजीरे की थाप और फगुआ के गीतों से होली का स्वागत होता था। लेकिन, आज यह रिवायत डीजे की तेज धुनों में कहीं खो गई है। पिछले 50 सालों में होली मनाने के तरीके में जमीन-आसमान का बदलाव आया है। आधुनिकता की दौड़ में त्योहार का शोर तो बढ़ा है। लेकिन, इसकी आत्मीयता पीछे छूट गई है। शहर के भैंसासुर के रहने वाले इतिहासकार डा लक्ष्मीकांत सिंह बताते हैं कि आधी सदी पहले होली का मतलब सिर्फ रंग लगाना नहीं, बल्कि दिलों का जुड़ाव था। बसंत पंचमी के दिन से ही खलिहानों और दालानों में रात को चौपाल सजती थी। ग्रामीण एक सुर में ‘फगुआ’ गाते थे, जिसमें पौराणिक कथाओं और हास्य का पुट होता था। आज डीजे और फूहड़ गानों ने इन लोकगीतों की आत्मा मार दी है। ठंडाई की जगह कोल्ड-ड्रिंक ने ली: कवि राकेश बिहारी शर्मा बताते हैं कि पहले होली के दिन घरों में सिलबट्टे पर केसर, बादाम, पिस्ता और गुलाब की पंखुड़ियों के साथ ठंडाई और भांग घोंटने की खास परंपरा थी। यह शिव के प्रसाद और आपसी प्रेम के प्रतीक के रूप में परोसी जाती थी। अब सिलबट्टे की जगह मिक्सर और ठंडई की जगह कोल्ड-ड्रिंक्स या बोतलबंद जूस ने ले ली है।
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