
हटाया जाए अतिक्रमण, गाद की सफाई कराकर नदियों को बनाया जाए जीवनदायिनी
नदियों के सूखने और अतिक्रमण के कारण पर्यावरण और कृषि पर प्रतिकूल असर हो रहा है। किसानों और पर्यावरणविदों ने व्हाट्सएप संवाद में नदियों को जीवनदायिनी बनाने के उपाय सुझाए हैं। इन उपायों में अतिक्रमण हटाना, गाद की सफाई और जल प्रबंधन शामिल हैं। सभी ने नदियों की सफाई को प्राथमिकता देने की जरूरत जताई है।
आएं अपनी नदी बचाएं: व्हाट्सएप संवाद : हटाया जाए अतिक्रमण, गाद की सफाई कराकर नदियों को बनाया जाए जीवनदायिनी जगह-जगह पर बनाया जाए छिलका, ताकि पानी का ठहराव हो सके लम्बे समय तक नदियों में पानी की कमी से गहरा रहा संकट, पेड़-पौधे सूख रहे व हरियाली खत्म हो रही ये हो उपाय तो संकट होगा खत्म: 1. नदियों के किनारों पर किये गये अतिक्रमण को हटाया जाए। 2. गाद की सफाई करायी जाए, ताकि पानी का ठहराव हो सके। 3. नदियों से जुड़े आहर-पइन व नहरों का जीर्णोद्धार कराया जाए। 4. नदियों में हो रहे अवैध मिट्टी और बालू के खनन पर रोक लगे।
5. बड़ी नदियों से छोटी नदियों में पानी आसानी से आये, इसकी पहली करनी होगी। 6. मुहाने नदी के बंद मुंह को खुलवाया जाए, ताकि, 8 प्रखंडों में पटवन सहज हो सके। 7. जगह-जगह पर नदियों में छिलका बनाया जाए, ताकि पानी का ठहराव हो सके। 8. नदियों को एक दूसरे से जोड़ा जाए। इससे पानी का प्रबंधन बेहतर हो सकेगा। फोटो डा भावना उपेन्द्र प्रसाद सिंह डा उमेश नारायण उमेश, राहुल कुमार शंभु कुमार डा रमेश कुमार धनंजय कुमार पप्पू कुमार सुभाष कुमार सुधीर केवट दिनेश केवट राजेन्द्र केवट बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। अपर इंट्रो : नदियों के सूखने और सिकुड़ने के कारण जनजीवन के साथ ही खेती-किसान, मछलीपालन, पशुपालन और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर दिख रहा है। भू-जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। चापाकल व बोरिंग फेल हो रहे हैं। सिंचाई का संकट उत्पन्न हो रहा है। आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ के अभियान ‘आएं अपनी नदी बचाएं’ के तहत शुक्रवार को व्हाट्सएप संवाद में नालंदा के किसान, पर्यावरणविद, पंक्षी संरक्षक, मछुआरा, नाविक और नदियों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भविष्य के खतरे के प्रति आगाह करते हुए अतिक्रमण के कारण अस्तित्व खो रहीं नदियों को नया जीवन देने के कई उपाय व सुझाव भी दिये। सभी ने एक स्वर से कहा कि संकट में पड़ी नदियों की सफाई कराकर उसे जीवनदायिनी बनाया जाए। तभी, धरती के साथ जीवन की खुशहाली संभव है। नदियों के सूखने से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र खराब हो रहा है। नदियों में विकसित होने वाले जीव-जंतू और वनस्पतियों का अस्तित्व संकट में है। भू-जलस्तर में तेजी से गिरावट हो रही है। इसका प्रतिकूल असर मानव जीवन पर भी पड़ रहा है। इन संकटों से बचने के लिए नदियों को जीवनदायिनी बनाने की जरूरत है। डा भावना, विभागाध्यक्ष, भूगोल विभाग, नालंदा कॉलेज, बिहारशरीफ जहानाबाद से होकर गुजरने वाली फल्गु नदी से मुहाने में पानी आता है। इस्लामपुर के पास नदी का मुंह वर्षों से बंद है। मुहाने नदी में पानी नहीं आता है। आठ प्रखंडों में सिंचाई का संकट बना हुआ है। मुंह को खुलवा दिया जाए तो के लिए जिला से लेकर राज्य मुख्यालय पत्र लिखा है। फैसला आना बाकी है। उपेन्द्र प्रसाद सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता, चंडी नदियों के सूखने से भू-जलस्तर की गंभीर समस्या बन गयी है। खेती-किसान पूरी तरह से समबर्सिबल मोटर पर निर्भर है। सिंचाई का संकट किसानों की दुश्वारियां बढ़ा रही हैं। नदियों की सफाई के साथ जगह-जगह पर छिलका बनाने की जरूरत है। ताकि, पानी का ठहराव हो सके। डा उमेश नारायण उमेश, कृषि वैज्ञानिक, केवीके, हरनौत नदियों में जलसंकट के कारण स्थानीय पंछियों का प्रजनन क्षेत्र घट रहा है। भोजन का अभाव के कारण कई परिंदो का जीवन संकट में है। आश्रय स्थलों की कमी के कारण अब पहले की अपेक्षा प्रवासी पंछियां नालंदा में बहुत कम दिखती हैं। जैव विधिता पर गहरा असर पड़ा है। इससे निजात के लिए सार्थक प्रयास की जरूरत है। राहुल कुमार, पंक्षी संरक्षक, नूरसराय नदियों में पानी की कमी और अविरल धार नहीं बहने के कारण जैव विधिता पर पहरा असर पड़ रहा है। देसी प्रजाति की कई मछलियों का अस्तित्व संकट में आ गया है। गरई, चेंगा, चेल्हा, पतसिया जैसी मछलियां नदियों में ही पलती व बढ़ती हैं। इनकी शरणस्थली खत्म होने के कारण इनका जीवन चक्र काफी प्रभावित हो रहा है। शंभु कुमार, जिला मत्स्य पदाधिकारी, नालंदा नदियां सूखी रहने के कारण किनारे में विकसित होने वाले हरा चारा की किल्लत हो गयी है। खासकर भैंस प्रजाति को जल क्रीड़ा करने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। इनका पसंसदीदा जल क्षेत्र खत्म हो गया है। इसका असर मवेशी के शारीरिक विकास पर पड़ रहा है। डा रमेश कुमार, जिला पशुपालन पदाधिकारी पहले पंचाने नदी से जुड़ी अघेर नहर से सरदारबिगहा, परिऔना, विशुनपुर, जमुनापुर आदि गांवों के खेतों की सिंचाई आसानी से होती थी। पिछले 20 वर्षों से इस नहर में पानी नहीं आता है। अतिक्रमण के कई जगहों पर नहर का अस्तित्व ही खत्म हो गया है। खेती पूरी तरह से सबमर्सिबल मोटर पर आश्रित है। धनंजय कुमार, किसान, सरदार बिगहा नदियों के किनारे भी अब जलसंकट गहरा रहा है। पानी की कमी से पेड़-पौधे सूख रहे, हरियाली खत्म हो रही है। जलीय जीवों के जीवन चक्र पर संकट गहरा रहा, अस्तित्व बचाना मुश्किल है। आहार श्रृंखला खत्म होने से देसी प्रजाति की मछलियों के सामने जीवन बचाने का संकट है। पप्पू कुमार, मछुआरा, नया टोला, बिहारशरीफ नदियों के किनारे की नमी से प्राकृतिक रूप से हरी घास उगती थी, जो पशुओं के लिए बेहतरीन चारा था। पहले नदी का बहता पानी मुफ्त था। अब मवेशियों को पानी पिलाने और नहलाने के लिए मोटर चलानी पड़ती है। इससे बिजली बिल का खर्च बढ़ गया है। सुभाष कुमार, पशुपालक, बिहारशरीफ एक दशक पहले तक पंचाने, मुहाने, लोकाइन, जिरायन, सकरी आदि नदियों से रोजाना मछलियां निकाल लेते थे। मंडियों में बेचकर जो कमाई होती थी, उससे पूरा परिवार पलता था। अब नदियों में पानी नहीं, सिर्फ कीचड़ है। बरसात के बाद वह धूल उड़ती है। मछलीपालकों धंधा खत्म हो गया है। सुधीर केवट, मछुआरा, नया टोला पहले नदियों में लबाबल पानी रहता था तो काफी मात्र में मछलियां मिल जाती थीं। ठीकठाक कमाई हो जाती थी। अब स्थिति ऐसी बन गयी है कि बरसात में भी जिले की छोटी नदियों में पानी की धार नहीं बहती है। नतीजा, मछलियां भी नहीं मिलती हैं। मछुआरों के सामने गंभीर संकट बन गया है। राजेन्द्र केवट, मछुआरा, तकिया कला, नदियों के सूखने से मछलियां खत्म हुईं तो जाल बुनने का रोजगार भी ठप हो गया। नौबत ऐसी कि जो कारीगर बांस और धागे से जाल बनाते थे, अब उनके पास कोई खरीदार नहीं आते हैं। लाचारी में पुश्तैनी कारोबार को छोड़कर दूसरे रोजगार से जुड़ना पड़ रहा है। दिनेश केवट, जाल विक्रेता, बिहारशरीफ

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