
चाय चौपाल : नेता भूल रहे अपनी गरिमा, धड़ल्ले से कर रहे अमर्यादित शब्दों के प्रयोग
चाय चौपाल : नेता भूल रहे अपनी गरिमा, धड़ल्ले से कर रहे अमर्यादित शब्दों के प्रयोगचाय चौपाल : नेता भूल रहे अपनी गरिमा, धड़ल्ले से कर रहे अमर्यादित शब्दों के प्रयोगचाय चौपाल : नेता भूल रहे अपनी गरिमा,...
चाय चौपाल : नेता भूल रहे अपनी गरिमा, धड़ल्ले से कर रहे अमर्यादित शब्दों के प्रयोग अब तो भाषणों व बैठकों में भी नेताओं की बोलियां हो रहीं बेलगाम नीति निर्धारक राजनीति के चकते सीतारे भी एक-दूसरे की टांग खींचने से नहीं आ रहे बाज जनसंपर्क के दौरान भी विरोधियों पर निशाना साधने के बहाने खुलकर करते हैं टीका-टिप्पणी चोर शब्द का भी खुलेआम हो रहा उपयोग सदन में अमर्यादित भाषा से शुरू हुआ विरोध पहुंच जाता है मारपीट तक फोटो : चौपाल : बिहारशरीफ श्रम कल्याण केंद्र के मैदान के पास चाय चौपाल में राजनीति पर चर्चा करते लोग। लोगों की तस्वीरें उनके नाम से।

बिहारशरीफ, निज संवाददाता। नेता न सिर्फ हमारे जनप्रतिनिधि होते हैं, बल्कि वे उच्च सदनों में पहुंचकर नीति निर्धारक के तौर पर देश प्रदेश के विकास में अपनी महती भूमिका भी निभाते हैं। इसमें पक्ष के साथ ही विपक्ष में बैठे नेताओं की भी काफी अहम भूमिका होती है। लेकिन, आज के समय में ये नेता अपनी गरिमा को ही भूलते जा रहे हैं। भाषण हो या प्रेस वार्ता, वे धड़ल्ले से अमर्यादित शब्दों के प्रयोग करने लगे हैं। राजनीति में भाषा की गरिमा में लगातार गिरावट आती जा रही है। हद तो यह कि अब भाषणों व बैठकों में भी नेताओं की बोलियां बेलगाम हो रही हैं। ये नीति निर्धारक राजनीति के चमकते सीतारे भी एक-दूसरे की टांग खींचने से बाज नहीं आते हैं। जनसंपर्क के दौरान भी विरोधियों पर निशाना साधने के बहाने खुलकर टीका टिप्पणी करते हैं। इसमें भी उनकी अमर्यादित भाषा खुब झलकती है। चोर जैसे शब्द का भी खुलेआम उपयोग हो रहा है। हद तो यह कि देश के उच्च पदों पर आसीन नेताओं पर भी इस तरह की अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया जाता है। वहीं सदन में अमर्यादित भाषा से शुरू हुआ विरोध कई बार मारपीट तक पहुंच जाता है। नालंदा के सात विधान सभा क्षेत्रों में चुनाव होने हैं। इसे लेकर चर्चा और संवाद का बाजार भी गर्म है। चाय की भाप के साथ उठते शब्द, धीरे-धीरे राजनीति की बदलती तासीर पर चर्चा का रूप ले लेते हैं। बिहारशरीफ के श्रम कल्याण केंद्र के पास जमी चाय चौपाल पर इन दिनों एक ही मुद्दा नेताओं की भाषा में गिरावट छाया हुआ है। जहां कभी भाषण विचारों की जंग होते थे, अब वहां शब्दों के बाण चलते हैं। अब भाषा, विचारों को नहीं बल्कि विरोधी को चोट पहुंचाने का जरिया बन चुकी है। नेता भूलते जा रहे अपनी गरिमा को : कभी राजनीति मर्यादा, संयम और सभ्यता की मिसाल मानी जाती थी। लेकिन अब स्थिति उलट गई है। मंच से लेकर सदन तक, हर जगह शब्दों का स्तर गिरता जा रहा है। चाय चौपाल पर बैठे रामाश्रय सिंह कहते हैं अब नेताजी भाषण में जनता से ज्यादा विरोधी पर निशाना साधते हैं। चोर, ठग, दलाल जैसे शब्द खुलेआम बोले जा रहे हैं। ये हमारे लोकतंत्र की मर्यादा के लिए खतरनाक है। अबधेश कुमार ने कहा पहले के नेता अपने विरोधी के विचारों का सम्मान करते थे। आज तो स्थिति यह है कि सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे की पारिवारिक जिंदगी तक पर कटाक्ष किए जाते हैं। उन्होंने कहा भाषा लोकतंत्र की आत्मा है। जब आत्मा ही घायल हो जाए, तो फिर व्यवस्था कितनी मजबूत रहेगी? नेताओं को भाषा के प्रति संयम बरतनी चाहिए। धड़ल्ले से भाषणों में हो रहा अमर्यादित भाषा का प्रयोग : राजनीतिक भाषणों और बैठकों का स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। पहले जहां नीति और जनता के मुद्दे केंद्र में होते थे, अब वहां व्यंग्य और अपशब्दों का बोलबाला है। सेवानिवृत शिक्षक देवकुमार सिंह कहते हैं आज राजनीति में मुद्दों की चर्चा कम और व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी ज्यादा हो रही है। यह प्रवृत्ति समाज को बांट रही है। बच्चों और युवाओं के बीच भी गलत संदेश जा रहा है। महिलाएं भी अब इन भाषणों से आहत होती हैं। जब मंच पर बैठे वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज करते हैं, तो समाज में सभ्यता की मर्यादा कैसे बचेगी? इसके प्रति उन्हें संवेदनशील होना होगा। नीति निर्धारक भी नहीं रहे इससे अछूते : राजनीति के ऊपरी स्तर पर बैठे नेता, जिनसे परिपक्वता और संयम की अपेक्षा की जाती है, वे भी इस भाषा की गिरावट में शामिल हैं। छुटभैया राजनीति विष्लेशक अबधेश कुमार कहते हैं जब संसद या विधानसभा में भाषा की मर्यादा टूटती है, तो जनता भी उसे देखती है। इसका असर समाज पर पड़ता है। जब शीर्ष पर बैठे लोग ही संयम नहीं रख पा रहे, तो नीचे के स्तर पर नेताओं से क्या अपेक्षा की जा सकती है। युवा मतदाता डब्लू सिंह बताते हैं आज राजनीतिक दलों में मर्यादा पर नहीं, तालियों पर ध्यान दिया जाता है। जितनी तीखी टिप्पणी, उतनी वाहवाही। यह परंपरा लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। इससे नेताओं को बचना चाहिए। अब भाषणों व बैठकों में भी बोलियां हो रहीं बेलगाम : पिछले कुछ सालों में मंचीय राजनीति पूरी तरह बदल गई है। नेताओं की जुबान से निकलने वाले शब्द अब तर्क से नहीं, तंज से भरे होते हैं। बिहारशरीफ की चौपाल पर बैठे युवाओं ने कहा कि अब नेताओं के भाषण शब्दों की लड़ाई बन चुके हैं। स्नातक छात्र बलबीर कुमार कहते हैं राजनीति अब वैचारिक बहस की जगह नहीं रही। नेता अपने विरोधियों पर ऐसे शब्द प्रयोग करते हैं, जो कभी समाज में अशोभनीय माने जाते थे। यह सब जनता के सामने हो रहा है और लोग तालियां बजा रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए ठीक संकेत नहीं हैं। जनसंपर्क के दौरान भी निशाने पर विरोधी : पहले चुनावी जनसंपर्क का मकसद जनता से जुड़ना और समस्याओं को समझना होता था। अब ये अभियान विरोधियों को नीचा दिखाने का माध्यम बन गए हैं। चौपाल में शामिल सरमेरा के ललन प्रसाद कहते हैं नेता जनता से हाथ मिलाने से ज्यादा कैमरे के सामने विरोधियों पर कटाक्ष करने में व्यस्त रहते हैं। जनसंपर्क अब जनसम्पर्क नहीं, जन-प्रदर्शन बन गया है। वे इस बहाने विरोध प्रदर्शन कर क्या जताना चाहते हैं। विरोधियों को नीचा दिखाने से वे थोड़े न ऊपर उठ जाएंगे। इसके लिए शालिन भाषा का प्रयोग, लोगों से सही से संवाद और व्यवहार ही चाहिए। तभी वे नेता की गरिमा को बचा पाएंगे। चाय चौपाल के दौरान वहां खड़े युवक दिनेश कुमार ने कहा चुनाव का मौसम आते ही नेता बदल जाते हैं। वही व्यक्ति जो सालभर गायब रहते हैं, अचानक जनसेवक बनकर भाषण देने लगते हैं। लेकिन भाषण में सेवा की भावना कम, विरोध का विष अधिक होता है। चोर और दलाल शब्द का भी खुलेआम हो रहा उपयोग : राजनीति में शब्दों की मर्यादा जिस गति से टूट रही है। यक काफी चिंताजनक स्थिति है। पहले ऐसे शब्द जो गली-मोहल्ले की भाषा माने जाते थे, अब मंच से खुलेआम बोले जा रहे हैं। चोर, लुटेरा, दलाल जैसे शब्द अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते जा रहे हैं। पहले नेता इन्हें बोलने से डरते थे, अब गर्व से कहते हैं। राजनीति में इस तरह का अपमान अब एक रणनीति बनता जा रहा है, जो शुभ संकेत नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। भाषा का पतन ही विचार का पतन है। जब विचार खत्म हो जाते हैं, तो व्यक्ति केवल अपशब्दों का सहारा लेता है। सदन में भी पहुंच जाता है टकराव : यह गिरावट सिर्फ मंच तक सीमित नहीं रही। विधानसभा और संसद जैसे उच्च सदनों में भी अब अमर्यादित भाषा आम हो चुकी है। पहले सदन की बहसों में तर्क और तथ्य होते थे। अब वहां भी शब्दों की मर्यादा टूटने लगी है। कई बार ये बहस मारपीट तक पहुंच जाती है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक है। जब नीति निर्धारण के मंदिर में भी अपशब्दों की गूंज सुनाई दे, तो यह हमारे लोकतांत्रिक संस्कारों की विफलता है। जनता ने उन्हें जनसेवक बनाकर भेजा है, लड़ाका नहीं। इसका उन्हें हमेशा ख्याल रखना चाहिए। इस तरह की अमर्यादित राजनीति ने युवाओं को भी निराश किया है। युवाओं के सामने राजनीति की छवि अब खराब हो चुकी है। वे अब इसे सेवा नहीं, स्वार्थ का माध्यम समझने लगे हैं। जब नेता खुद संयम नहीं रख पा रहे, तो युवा उन्हें आदर्श क्यों मानेंगे? मंगला स्थान के अभिनव रंजन कहते हैं नेताओं की भाषा देखकर लगता है जैसे यह कोई दंगल का जंगक्षेत्र हो, जहां बहस नहीं, बस आरोप-प्रत्यारोप की कुश्ती चलती है। युवाओं के लिए यह राजनीति नहीं, तमाशा बन गया है। भाषा में चाहिए शालीनता : राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, यह समाज को दिशा देने का माध्यम है। लेकिन, जब इस दिशा में शब्दों की शालीनता खो जाती है, तो जनमानस भी प्रभावित होता है। अगर नेता अपने शब्दों की मर्यादा नहीं रखेंगे, तो समाज में क्या संदेश जाएगा? बच्चों को हम क्या सिखाएंगे कि गाली देना भी राजनीति है? इससे नेताओं को बचना चाहिए। राजनीति को फिर से सम्मान की भाषा अपनानी होगी। तर्क से जीतिए, तंज से नहीं। यही लोकतंत्र की असली खूबसूरती है। दूसरे को बुरा कहने से हम खुद को अच्छा साबित नहीं कर सकते हैं। इसके लिए खुद को साबित करना होता है। नेताओं की भाषा में जो गिरावट आई है, वह लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक संकेत है। जनता उन पर भरोसा करती है, उन्हें सम्मान देती है, लेकिन जब वही नेता मंच से अपशब्द बोलते हैं तो यह जनता के विश्वास के साथ धोखा है। पहले के नेता विरोधियों से वैचारिक मतभेद रखते थे, व्यक्तिगत नहीं। अब तो हर भाषण में कटाक्ष और अपमान झलकता है। जनता को चाहिए कि ऐसे नेताओं को सबक सिखाए जो अपने शब्दों पर नियंत्रण नहीं रख पाते। धीरज कुमार भाषा लोकतंत्र की आत्मा है। अगर भाषा ही दूषित हो जाए तो राजनीति का स्वरूप कैसा रहेगा? आज नेताओं के बीच वैचारिक बहस नहीं, बल्कि अपमानजनक शब्दों की प्रतियोगिता चल रही है। वे भूल गए हैं कि संसद और विधानसभा सभ्यता के मंदिर हैं। ‘चोर और ‘लुटेरा जैसे शब्दों से जनता को गुमराह करने से बेहतर है कि वे नीतियों पर बात करें। उन्हें खुद के व्यवहार से लोकतंत्र को मजबूत बनाना चाहिए। दीपक कुमार आज राजनीति बच्चों के लिए प्रेरणा नहीं रही, बल्कि डर का कारण बन रही है। जब बच्चे टीवी पर नेताओं को अपशब्द बोलते सुनते हैं, तो उनमें भी वही संस्कृति पनपती है। नेताओं को यह समझना होगा कि वे सिर्फ जनता के प्रतिनिधि नहीं, समाज के मार्गदर्शक भी हैं। अगर वही मर्यादा तोड़ेंगे, तो समाज में संयम की भावना कैसे टिकेगी? हमें तंज नहीं, तर्क की राजनीति चाहिए। मौसम चौधरी नेताओं की लोकप्रियता अब उनकी मर्यादा से नहीं, तीखे शब्दों से मापी जा रही है। जितना तीखा बोलो, उतनी तालियां बजती हैं। यही प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक है। युवाओं के बीच राजनीति की छवि गिर रही है। लोग अब इसे सेवा नहीं, प्रदर्शन का माध्यम समझने लगे हैं। नेताओं को चाहिए कि जनता के सामने संयमित भाषा और व्यवहार से अपनी छवि सुधारें। मुनेश्वर चौधरी चुनावी जनसंपर्क अब जनसंवाद नहीं रह गया है। नेता जनता से मिलने की बजाय कैमरे के सामने भाषण देते हैं और विरोधियों पर तंज कसते हैं। यह दिखाता है कि उनके पास जनता के असली मुद्दों पर कुछ कहने को नहीं है। कटाक्ष से नहीं, काम से चुनाव जीता जाता है। जनता सब समझती है और समय आने पर ऐसे नेताओं को जवाब भी देगी। विजय कुमार वर्मा राजनीति अब बहस का मंच नहीं, आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बन गई है। जब नेता मंच से अपशब्द बोलते हैं, तो युवा वर्ग निराश होता है। हम चाहते हैं कि राजनीति में भाषा का स्तर सुधरे ताकि हम उसे प्रेरणा की तरह देखें, मनोरंजन की तरह नहीं। हमें संयम, तर्क और मर्यादा से भरी राजनीति चाहिए। तभी युवाओं का भरोसा फिर लौटेगा। उमेश रविदास नेताओं के भाषण देखकर लगता है जैसे यह कोई रेसलिंग शो हो। कोई किसी को चोर कहता है, तो कोई किसी को दलाल। ये शब्द जनता के बीच नफरत का माहौल बना रहे हैं। लोकतंत्र में विचारों की लड़ाई होनी चाहिए, शब्दों की नहीं। अगर नेता खुद पर संयम नहीं रख पाएंगे, तो आने वाली पीढ़ी उनसे क्या सीखेगी। उन्हें अपने शब्दों की गरिमा समझनी चाहिए। रामस्वरूप प्रसाद नेताओं की भाषा अब समाज में नकारात्मकता फैला रही है। महिलाएं जब ऐसे भाषण सुनती हैं तो उन्हें शर्म महसूस होती है। राजनीति में शालीनता का मतलब कमजोर होना नहीं है, बल्कि परिपक्वता का प्रतीक है। अगर नेता खुद को जनसेवक कहते हैं तो उन्हें सेवा जैसी भाषा का ही इस्तेमाल करना चाहिए। अपमानजनक भाषा से सम्मान नहीं, नफरत मिलती है। सुनील कुमार राजनीति की साख शब्दों से बनती है, और शब्दों से ही गिरती भी है। आज हमारे नेता अपनी जुबान पर नियंत्रण खो चुके हैं। यह केवल विपक्ष की आलोचना नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का अपमान है। नेताओं को याद रखना चाहिए कि वे जनता के प्रतिनिधि हैं, योद्धा नहीं। विचारों की मर्यादा ही राजनीति की पहचान है। अब समय है कि वे खुद से पूछें - क्या यही राजनीति की असली तस्वीर है? अरविंद प्रसाद राजनीति में भाषा का गिरना सबसे बड़ी नैतिक हार है। आज नेताओं की जुबान आग उगलती है, जबकि लोकतंत्र में शब्दों को शांति का माध्यम होना चाहिए। सदन में जब अपशब्द गूंजते हैं तो देश की साख दुनिया के सामने गिरती है। हमें संयम, मर्यादा और विवेक से भरी राजनीति चाहिए, न कि गाली-गलौज और तंज से भरी सभाएं। नेता अगर खुद को सुधारें, तो जनता भी उनका सम्मान करेगी। राजीव कुमार

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