Biharsharif News: पहल : नालंदा में होगी मोती की खेती, स्थापित होंगी 3 इकाइयां
Biharsharif News: नालंदा में किसान अब मछली पालन के साथ-साथ मोती की खेती भी करेंगे। बिंद, बिहारशरीफ और रहुई के तीन किसानों का चयन किया गया है। प्रति यूनिट 60% अनुदान मिलेगा। मोती तैयार होने में 12 से 18 महीने लगते हैं। झींगापालन को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

Biharsharif News: पहल : नालंदा में होगी मोती की खेती, स्थापित होंगी 3 इकाइयां एक ही तालाब में मछली के साथ सीप पालकर दोहरी कमाई कर सकेंगे किसान बिंद, बिहारशरीफ व रहुई के 3 किसानों का चयन, 60 फीसद मिलेगा अनुदान फोटो: मोती की खेती: कुछ इसी तरह सीपों में तैयार होती है मोती (प्रतीकात्मक तस्वीर)। बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। नालंदा के किसान अब पारंपरिक मछली पालन के साथ-साथ तालाबों में मोती की खेती और झींगा पालनकर अपनी आमदनी बढ़ाएंगे। मत्स्य प्रजाति विविधीकरण योजना के तहत जिले में पहली बार मोती की खेती की शुरुआत होने जा रही है। इसके लिए बिंद प्रखंड के जमसारी, बिहारशरीफ के सरबहदी और रहुई के गरांय बिगहा गांव के तीन प्रगतिशील किसानों का चयन किया गया है। बाजार में मोती की अच्छी कीमत मिलती है। किसान एक ही तालाब में मछली के साथ मोती पालन कर दोहरी कमाई करेंगे।
लागत और अनुदान का गणित
योजना के तहत मोती पालन इकाई लगाने के लिए न्यूनतम आधा एकड़ (करीब 15 कट्ठा) का तालाब होना जरूरी है। प्रति यूनिट 02 लाख 24 हजार 600 रुपये की लागत तय की गई है। इसमें सरकार किसानों को 60 फीसद तक का अनुदान देगी। जबकि, शेष राशि किसान को अपनी जेब से लगानी होगी।
खेती करने के तरीके
मोती बनाने के लिए सबसे पहले सीपों को कुछ दिनों तक पानी में रखा जाता है, ताकि उनकी मांसपेशियां मुलायम हो जाएं। इसके बाद प्रशिक्षित विशेषज्ञ सीप की सर्जरी कर उसके अंदर एक विशेष सांचा फिट करते हैं। सर्जरी के बाद सीप को एंटीबायोटिक उपचार दिया जाता है और फिर उन्हें नायलॉन की छोटी-छोटी थैलियों में रखकर तालाब में करीब एक मीटर की गहराई पर रस्सी के सहारे लटका दिया जाता है।
इन बातों का रखें खास ध्यान
मोती पालन वाले तालाब में सिर्फ शाकाहारी मछलियां (रोहू, मृगल और कतला) ही पालनी चाहिए। भूलकर भी मांसाहारी मछलियां न डालें। क्योंकि वे सीपों को खाकर नुकसान पहुंचा सकती हैं। इससे उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इस दौरान तालाब के पानी की गुणवत्ता (पीएच लेवल), ऑक्सीजन की मात्रा और सीपों के प्राकृतिक भोजन (शैवाल/काई) का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
12 से 18 माह में मोती तैयार
सीप में मोती तैयार होने में आमतौर पर 12 से 18 महीने (का समय लगता है। मोती के आकार और गुणवत्ता के अनुसार समय में थोड़ा बदलाव भी हो सकता है। जब सीप की सर्जरी कर उसके अंदर सांचा डाला जाता है, तो सीप प्राकृतिक रूप से उस सांचे के चारों ओर ‘नेकर’ नामक चमकदार तरल पदार्थ छोड़ने लगती है। यही पदार्थ धीरे-धीरे परत-दर-परत जम कर मोती का रूप ले लेता है। समय पूरा होने के बाद सीपों को पानी से बाहर निकालकर चीरा लगाकर मोती को निकाला जाता है।
क्या कहते हैं अधिकारी
नालंदा में पहली बार मोती की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस साल तीन यूनिटें लगनी हैं, जिसके लिए किसानों का चयन कर लिया गया है। मोती और झींगा की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली तकनीक है। किसानों को इसके लिए लगातार प्रेरित किया जा रहा है। शंभु प्रसाद, जिला मत्स्य पदाधिकारी, नालंदा
बॉक्स झींगापालन को भी मिलेगा बढ़ावा
योजना के तहत जिले में दो झींगापालन यूनिटें भी लगाई जा रही हैं। शर्तों का पालन करने वाले दो किसानों का चयन कर लिया गया है। आधा एकड़ के तालाब में यूनिट लगाने पर एक लाख 10 हजार रुपये का खर्च आता है, जिस पर 60 फीसद की सब्सिडी मिलेगी। झींगापालन के लिए तालाब के पानी की गुणवत्ता और ऑक्सीजन का स्तर मेंटेन रखना पड़ता है। अच्छी नस्ल के बीज (जीरा) डालकर उन्हें प्रोटीन युक्त आहार दिया जाता है।


