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पावापुरी मेडिकल कॉलेज : 11 साल पहले बनी कचरा इकाई, अब तक नहीं मिला एनओसी

पावापुरी मेडिकल कॉलेज : 11 साल पहले बनी कचरा इकाई, अब तक नहीं मिला एनओसीपावापुरी मेडिकल कॉलेज : 11 साल पहले बनी कचरा इकाई, अब तक नहीं मिला एनओसीपावापुरी मेडिकल कॉलेज : 11 साल पहले बनी कचरा इकाई, अब...

पावापुरी मेडिकल कॉलेज : 11 साल पहले बनी कचरा इकाई, अब तक नहीं मिला एनओसी
हिन्दुस्तान टीम,बिहारशरीफMon, 27 May 2024 10:15 PM
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पावापुरी मेडिकल कॉलेज : 11 साल पहले बनी कचरा इकाई, अब तक नहीं मिला एनओसी
अनदेखी ऐसी कि सूबे की पांचवीं भस्मीकरण इकाई नहीं हो सकी चालू

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी नहीं मिलने के कारण मशीनों में लग रहा जंग

शुरू होने से नालंदा के अलावा नवादा, शेखपुरा, लखीसराय के साथ ही पड़ोसी जिलों को होगा फायदा

फोटो :

पावापुरी मेडिकल : पावापुरी भगवान महावीर आयुर्विज्ञान संस्थान में लगी मेडिकल कचरा भस्मीकरण मशीन।

बिहारशरीफ, निज संवाददाता।

जहां-तहां फेंका जा रहा मेडिकल कचरा इंसानों के साथ ही पशुओं की जान के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। इससे हमारा पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है। हवा व पानी के साथ मिट्टी तक प्रदूषित हो रही है। लेकिन, इसके निस्तारण के प्रति सरकारी व निजी अस्पतालों के साथ ही स्वास्थ्य विभाग गहरी नींद में है। इसकी बानगी पावापुरी मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2013 में बनायी गयी मेडिकल कचरा इकाई है, जो 11 साल बाद भी चालू नहीं हुई है। जबकि, सूबे में पटना, मुजफ्फरपुर, गया व भागलपुर के बाद यहां सूबे की पांचवीं भस्मीकरण मशीन लगी हुई है।

इसे चालू करने के लिए मात्र पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मिलने का इंतजार है। स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी के कारण लाखों की मशीनों में 11 सालों से जंग लग रहा है। कोरोना संकट जैसी समस्या को झेल चुके इस कॉलेज सह अस्पताल में भी इसे चालू नहीं करवाया जा सका। इस मशीन की चालू होने की बात तो दूर, टेस्टिंग तक नहीं की गयी है। इसके कारण जिले से निकलने वाले मेडिकल कचरा को पटना भेजना पड़ रहा है। जबकि, इसके शुरू होने से नालंदा के अलावा नवादा, शेखपुरा, लखीसराय के साथ ही आसपास के अन्य जिलों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। कॉलेज व अस्पताल प्रशासन प्रदूषण बोर्ड, सरकार व मंत्रालय को कई बार एनओसी के लिए पत्र भेज चुका है। एनओसी के इंतजार में इसे चालू नहीं किया जा रहा है।

15 फीसद मेडिकल कचरा बेहद खतरनाक :

सेवानिवृत्त पैथोलॉजिस्ट रामाश्रय सिंह ने बताया कि मेडिकल कचरा का 15 फीसद अंश मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक हैं। निजी क्लीनिक भी इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। आजकल गांवों तक में अवैध तरीके से कई क्लीनिक चल रहे हैं, जहां ऑपरेशन तक किया जाता है। ऐसे में वहां से निकलने वाले खराब मानव अंगों का सही तरीके से निपटारा नहीं किया जाता है। डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान मेडिकल कचरा प्रबंधन का पाठ गंभीरता के साथ पढ़ाया जाता है। जहां-तहां मेडिकल कचरा फेंकने से स्वास्थ्य के साथ ही जल, वायु व मिट्टी भी प्रदूषित हो रही है। बावजूद सरकार व मंत्रालय इसे गंभीरता से नहीं ले रही है।

इन विभागों से रोजाना निकलता है मेडिकल कचरा :

अस्पताल, नर्सिंग होम, स्पेशलिटी अस्पताल, प्रयोगशाला, प्रतिरक्षण कार्य, ब्लड बैंक, कैंप, ओपीडी व अन्य जगहों से रोजाना मेडिकल कचरा निकलता है।

कहते हैं अधिकारी :

मेडिकल कचरा निपटान मशीन को चालू कराने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ ही पर्यावरण मंत्रालय से भी पत्राचार किया जा रहा है। पूर्व प्राचार्य डॉ. पीके चौधरी इसे चालू कराने के लए मंत्री, सांसद व डीएम तक से अनुरोध कर चुके हैं। एनओसी मिलते ही इसे चालू कर दिया जाएगा।

डॉ. सर्विल कुमारी, प्राचार्य, पावापुरी मेडिकल कॉलेज

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