
कई प्रत्याशियों से अधिक पड़ते हैं नोटा में वोट
2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में NOTA को 1000 से अधिक वोट मिले। 2015 में तीन विधानसभा क्षेत्रों में NOTA तीसरे स्थान पर था। यह दिखाता है कि कई लोग किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देकर अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं। नालंदा की हिलसा विधानसभा में NOTA के वोट विजेता के अंतर से 85 गुना अधिक थे।
2015 में 3 विधानसभा क्षेत्रों में तीसरे नंबर पर था नोटा 2020 में भी सभी विधानसभा क्षेत्रों में पड़े 1000 से अधिक वोट बिहारशरीफ, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। नोटा पर पड़े वोट कई बार कई प्रत्याशियों को पड़े मतों से अधिक होता है। 2015 में तो तीन विधानसभा क्षेत्रों में नोटा तीसरे नंबर पर था। विजेता और उपविजेता के बाद। बाकी सभी प्रत्याशी इसके पीछे थे। 2020 के विधानसभा चुनाव में भी सभी सात सीटों पर नोटा को 1000 से अधिक वोट मिले थे। यानि ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देकर अपना विरोध प्रकट करते हैं।
ईवीएम के सबसे अंतिम में होता है नोटा का बटन। इसका मतलब होता है ‘नन ऑफ द एवभ’ यानि उपरोक्त में से कोई नहीं। सीधे शब्दों में अगर आपको कोई भी प्रत्याशी पसंद नहीं है तो नोटा का बटन दबा सकते हैं। इसकी शुरुआत भारत में वर्ष 2013 में हुई। उसके बाद से सभी लोकसभा व विधानसभा चुनावों में इसका प्रयोग किया गया है। नालंदा की ही बात करें तो हिलसा विधानसभा में मात्र 12 वोट के अंतर से जीत-हार मिली थी। वहीं, नोटा में 1022 वोट पड़े थे। यानि की जीत के अंतर का 85 गुणा अधिक वोट नोटा में डाले गये थे। 2020 चुनाव का हाल : 2020 के चुनाव में राजगीर को छोड़कर सभी विधानसभा क्षेत्रों में नोटा को सबसे कम वोट मिले थे। राजगीर में एक प्रत्याशी नोटा में मिले वोटों से पीछे था। वहीं, 2015 में अस्थावां, नालंदा और हरनौत में नोटा तीसरे नंबर पर था। यानि विजेता और उपविजेता को छोड़कर सभी से अधिक वोट नोटा को मिले थे। अस्थावां में छह, नालंदा में तीन तो हरनौत में सात प्रत्याशी नोटा से पीछे थे। बिहारशरीफ में भी नोटा चौथे नंबर पर था। इसी तरह, राजगीर में एक, इस्लामपुर में एक तो हिलसा में चार प्रत्याशी को नोटा से कम वोट मिले थे।

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