
चरित्र निर्माण व व्यक्तित्व के समग्र विकास से खुलेगी विकसित भारत की नई राह
नई शिक्षा नीति के तहत चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व विकास पर जोर दिया गया है। नालंदा कॉलेज के डॉ. मृत्युंजय कुमार ने सूरत में आयोजित कार्यशाला में कहा कि युवाओं को हुनरमंद बनाना आवश्यक है। यह शिक्षा समाज और राष्ट्र की समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। शिक्षकों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है।
चरित्र निर्माण व व्यक्तित्व के समग्र विकास से खुलेगी विकसित भारत की नई राह नई शिक्षा नीति से युवा बनेंगे हुनरमंद, निखरेगा व्यक्तित्व गुजरात में राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला में नालंदा कॉलेज के डॉ. मृत्युंजय शिक्षा नीति पर डाला प्रकाश फोटो : नालंदा कॉलेज : गुजरात के सूरत में आयोजित राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला में नालंदा कॉलेज के डॉ. मृत्युंजय कुमार। बिहारशरीफ, निज संवाददाता। चरित्र निर्माण व व्यक्तित्व के समग्र विकास से ही विकसीत भारत की नई राह खुलेगी। इसमें नई शिक्षा नीति से युवा हुनरमंद बनेंगे। इससे उनके व्यक्तित्व में भी निखार आएगा। गुजरात के सूरत में 25 से 28 दिसंबर तक आयोजित राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला में नालंदा कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के डॉ. मृत्युंजय कुमार ने कहा कि युवाओं को हुनरमंद बनाए बिना विकास को गति नहीं दी जा सकती है।
उनकी ऊर्जा व हुनर को सही तरीके से साधने व उसे योग्यता के अनुसार आगे बढ़ाने में नई शिक्षा नीति काफी कारगर साबित होग। उन्होंने कहा कि सूरत में यह आयोजन सरदार वल्लभ भाई राष्ट्रीय प्रद्यौगिकी संस्थान सूरत, वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय सूरत और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास नई दिल्ली की अगुआई में हुआ। इस कार्यशाला में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत भारतीय ज्ञान परम्परा, कौशल विकास, अनुसंधान, नवाचार तथा विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका विषयों पर चर्चा की गयी। समाज और राष्ट्र को समृद्ध बनाना है तो चरित्र निर्माण पर देना होगा जोर : डॉ. मृत्युंजय कुमार ने कहा कि भारतीय परम्परा में आदिकाल से ही मानव के चरित्र और व्यक्तित्व विकास पर जोर दिया गया है। वर्तमान समय में यह विद्यार्थियों के लिए और भी आवश्यक है। उपनिषदों में वर्णित पंचकोश सिद्धांत अन्नमय कोश, प्रणामय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश का पालन कर ही समाज और राष्ट्र को समृद्ध बनाया जा सकता है। इसके लिए चरित्र निर्माण के साथ ही व्यक्तित्व पर भी ध्यान देना होगा। इस समग्र विषय पर शिक्षकों का भी दायित्व है कि इस समय वे परामर्शदाता की भूमिका निभाएं। कार्यशाला में चिंतक डॉ. पंकज मित्तल, डॉ. अतुल कोठारी, डॉ. सुरेश गुप्ता, डॉ. ए विनोद, डॉ. संजय स्वामी, डॉ. राजेश्वर प्रसाद, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष प्रो.अरुण कुमार सिंह, डॉ. परमेंद्र वाजपेयी, डॉ. विजय कुमार सिंह, आचार्य डॉ. हरिश दास, डॉ. संदीप सागर, डॉ. सुशील कुमार सिंह व अन्य ने अपने विचार व्यक्त किए।

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