
रिवाइज : बोले बिहारशरीफ: खादी को मिले आधुनिक बाजार, तभी आत्मनिर्भर बनेंगे बुनकर
संक्षेप: बिहारशरीफ में खादी की लोकप्रियता बढ़ रही है, लेकिन महंगाई और मार्केटिंग की कमी जैसे मुद्दे इसके विकास में बाधा डाल रहे हैं। युवाओं की मांग है कि खादी को आधुनिक डिजाइन और ऑनलाइन प्लेटफार्मों पर लाया...
बोले बिहारशरीफ: खादी को मिले आधुनिक बाजार, तभी आत्मनिर्भर बनेंगे बुनकर युवाओं में बढ़ रहा रुझान, पर महंगाई और मार्केटिंग की कमी बनी बड़ी चुनौती बिहारशरीफ। खादी, जो कभी स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक थी, आज फैशन और बाजार की प्रतिस्पर्धा में अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। खादी के प्रति लोगों का रुझान तो बढ़ा है, लेकिन इसकी राह में आज भी कई बाधाएं हैं। पिछले पांच सालों में कच्चे माल की कीमतों में 35% तक की बढ़ोतरी ने खादी वस्त्रों को महंगा कर दिया है, जिससे यह आम आदमी की पहुंच से कुछ दूर हुई है।

हालांकि, सरकारी अनुदान से कीमतों पर कुछ हद तक लगाम लगी है। खादी की सबसे बड़ी चुनौती इसकी मार्केटिंग और आधुनिक डिजाइन की कमी है। पटना में खादी मॉल खुलने से बिक्री तो बढ़ी है, लेकिन छोटे जिलों और कस्बों में आज भी खादी उत्पादों को सही बाजार नहीं मिल पाता। युवाओं की मांग है कि खादी को सिर्फ एक पारंपरिक वस्त्र न मानकर, उसे आधुनिक फैशन से जोड़ा जाए और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए वैश्विक बाजार तक पहुँचाया जाए, तभी यह आत्मनिर्भर भारत का सच्चा प्रतीक बन सकेगी। हमारी भी सुनिए: खादी सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि एक विचार है, स्वावलंबन का प्रतीक है। आज भी इसमें बहुत संभावनाएं हैं, लेकिन इसे युवाओं से जोड़ने के लिए नए और आकर्षक डिजाइन लाने होंगे। पुराने स्टाइल के कुर्ते-पायजामे से आगे बढ़कर हमें शर्ट, ड्रेस और जैकेट जैसे आधुनिक परिधान बनाने होंगे। राहुल कुमार खादी की सबसे बड़ी समस्या इसकी कीमत है। एक आम आदमी आज भी इसे खरीदने से पहले दो बार सोचता है। अगर सरकार बुनकरों को कच्चा माल सस्ती दरों पर उपलब्ध कराए और अनुदान को और बढ़ाए, तो इसकी कीमतें कम हो सकती हैं और यह फिर से जन-जन का वस्त्र बन सकता है। रविकांत कुमार पटना में खादी मॉल खुलना एक बहुत अच्छा कदम है, लेकिन ऐसे मॉल हर जिला मुख्यालय में खुलने चाहिए। इससे स्थानीय बुनकरों को अपने उत्पाद बेचने के लिए एक स्थायी मंच मिलेगा और उन्हें बिचौलियों के शोषण से भी मुक्ति मिलेगी। रूपक कुमार हम युवाओं में खादी के प्रति आकर्षण तो है, लेकिन हमें यह नहीं पता होता कि असली और अच्छी गुणवत्ता वाली खादी कहाँ मिलेगी। खादी की ब्रांडिंग करने और इसकी शुद्धता को प्रमाणित करने के लिए एक सिस्टम होना चाहिए, जैसे सिल्क के लिए सिल्क मार्क होता है। संजीव कुमार आजकल लोग ऑनलाइन खरीदारी करना पसंद करते हैं। खादी ग्रामोद्योग को भी अपने उत्पादों को प्रमुख ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर उपलब्ध कराना चाहिए। इससे खादी की पहुंच देश और दुनिया के कोने-कोने तक हो जाएगी और बिक्री में भारी इजाफा होगा। संतोष कुमार स्कूलों और कॉलेजों में खादी को लेकर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। अगर सप्ताह में एक दिन 'खादी दिवस' के रूप में मनाया जाए और छात्रों को खादी पहनने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो बचपन से ही उनके मन में खादी के प्रति सम्मान और लगाव पैदा होगा। सौरव कुमार खादी बनाने की प्रक्रिया बहुत मेहनत वाली है, लेकिन बुनकरों को उनकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता। सरकार को बुनकरों के लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसा तंत्र बनाना चाहिए, ताकि उनकी आजीविका सुरक्षित हो सके। शेखर कुमार जब चुनावी मौसम आता है तो खादी की मांग अचानक बढ़ जाती है। नेताओं को समझना चाहिए कि खादी सिर्फ चुनाव में पहनने की चीज नहीं है। अगर वे साल भर इसे अपनाएं तो यह आम लोगों के लिए भी एक प्रेरणा बनेगा। आशीष साव निफ्ट जैसे संस्थान जो बुनकरों को प्रशिक्षण दे रहे हैं, वह बहुत सराहनीय है। लेकिन सिर्फ प्रशिक्षण देना काफी नहीं है, सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रशिक्षण के बाद उन बुनकरों को अपना काम शुरू करने के लिए आसान शर्तों पर लोन और बाजार मिले। अजीत कुमार आज भी कई लोग खादी को सिर्फ बुजुर्गों का पहनावा मानते हैं। इस सोच को बदलने की जरूरत है। फैशन डिजाइनरों को खादी को लेकर और अधिक प्रयोग करने चाहिए और इसे एक फैशनेबल और स्टाइलिश फैब्रिक के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। अनिल कुमार खादी संस्थाओं में बहुत भ्रष्टाचार है, जिससे योजनाओं का लाभ असली बुनकरों तक नहीं पहुँच पाता। इन संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता लाने की जरूरत है और इनकी नियमित रूप से ऑडिट होनी चाहिए। बंटी कुमार खादी को सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। खादी से बैग, जूते, घरेलू सजावट के सामान और अन्य कई उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इससे इसके बाजार का और भी विस्तार होगा और कारीगरों को साल भर काम मिलेगा। धर्मपाल यादव जब हम खादी खरीदते हैं तो हम सिर्फ एक कपड़ा नहीं खरीदते, बल्कि हम एक बुनकर के परिवार की मदद करते हैं और एक पारंपरिक कला को जीवित रखने में अपना योगदान देते हैं। लोगों को इस भावना के साथ खादी को अपनाना चाहिए। गुड्डू प्रसाद गांधी जी ने खादी को स्वतंत्रता का हथियार बनाया था, आज हमें इसे आत्मनिर्भरता का हथियार बनाना होगा। हर गांव में छोटे-छोटे खादी उत्पादन केंद्र खुलने चाहिए, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा हो। जितेंद्र कुमार खादी की देखभाल करना थोड़ा मुश्किल होता है, इसलिए भी कई लोग इसे खरीदने से कतराते हैं। शोध के जरिए ऐसे खादी फैब्रिक को विकसित करने की जरूरत है जो आसानी से धोया जा सके और जिसमें सिकुड़न कम हो। मदन साव खादी मॉल में जो बिक्री बढ़ी है, वह यह दिखाती है कि अगर सही प्लेटफॉर्म मिले तो लोग खादी खरीदना चाहते हैं। सरकार को हर शहर में प्रमुख स्थानों पर खादी के आकर्षक शोरूम खोलने पर ध्यान देना चाहिए। मोनू कुमार बिहार की खादी, खासकर मधुबनी और भागलपुर की, अपनी एक अलग पहचान रखती है। इन क्षेत्रों के उत्पादों की विशेष ब्रांडिंग होनी चाहिए और उन्हें ‘मेड इन बिहार के टैग के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट किया जाना चाहिए। मुन्ना कुमार मैं एक बुनकर परिवार से हूँ। मैंने देखा है कि मेरे पिता दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती है। जब तक बुनकरों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरेगी, तब तक नई पीढ़ी इस काम में क्यों आएगी? नटवरराम खादी पर जो 30% की छूट मिलती है, वह बहुत बड़ी राहत है। इसे पूरे साल जारी रखना चाहिए, न कि सिर्फ कुछ खास मौकों पर। इससे खादी की बिक्री हमेशा बनी रहेगी और बुनकरों को लगातार काम मिलता रहेगा। पप्पू कुमार

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